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Sunday, 19 April 2020

सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य स्थापित करना ही बाबा साहेब का अधूरा मिशन है

डॉ जी सिंह कश्यप ,एसोसिएट प्रोफेसर पी जी कॉलेज गजीउर
लोग हर वर्ष बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर जी की जयंती मनाते है  इस वर्ष 2020 में 129  वी जयंती मनाई जा रही है  जयंती मनाने में कोई रोक नही है मगर उनके मिशन को जानना और समझना परम आवश्यक है ।बाबा साहब ने बौद्ध धम्म की दीक्षा लेने से पहले सभी धर्मों का सम्यक अध्ययन किया । जिस तरह बुद्ध ने अपने संदेश देने से पहले उन सभी मार्गों का परीक्षण किया जिन मार्गों पर चल कर ऋषियों मुनियों ने उस परम ब्रह्म का, जिसने वर्ण व्यवस्था बनाया था का,आमने सामने साक्षात्कार किया था । परन्तु बुद्ध को वह परम ब्रह्म नहीं मिले । उसी तरह बाबा साहब भी सम्यक अध्ययन के बाद ही इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि बुद्ध का धम्म मेरे लिये और मेरे समाज के लिये ही नहीं पूरी मानवता के लिये श्रेष्ठकर है । क्योंकि यह तर्क पर प्रतिबंध नहीं लगाता । बल्कि प्रग्यां और करूणा की बात करता है । बाबा साहब ने बुद्ध धम्म की दीक्षा लेने से पहले बुद्ध और उनका धम्म पुस्तक लिखा । जो अपने आप में एक खोजपरक पुस्तक है । उसमें उन्होंने बुद्ध धम्म की पुरानी मान्यताओं पर  ढेर सारे सवाल खड़े किये और उनके जबाब दिये और लोगों को भी सवाल खड़े करने के लिये और उनके जबाब ढूढ़ने के लिये प्रेरित किये । बाबा साहब की आखिरी चार पुस्तकों में पहली-बुद्ध एवं उनका धम्म,दूसरी- बुद्ध और कार्ल मार्क्स,तीसरी-क्रांति और प्रतक्राति,चौथी रिडल्स आफ हिन्दुइज्म हैं । तीसरी और चौथी अपनेे जीवन काल में प्रकाशित न करा सके । ये सभी एक दूसरे की पूरक या यों कहें कि एक दूसरे को समझने के लिये आवश्यक हैं ।  जैसे बुद्ध और उनका धम्म ठिक से समझना हो तो बुद्ध और कार्ल मार्क्स को पढ़ना जरूरी है । अन्यथा ग्यान अधूरा ही रहेगा । जैसे एक मित्र ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाला जिसमें दुख को विवाद बताया । यानी विवाद ही दुख है । अर्थात दो व्यक्ति या वर्ग के बीच विवाद ही दुख है । यदि विवाद ही दुख है तो विवाद मत करो । दुख नहीं होगा । कोई दूसरे वर्ण या जाति का पेशा न करे । भगवान ने जिस जाति वर्ण को जो काम आवंटित किया है । उसे करे । जो जिस जाति वर्ण में है, वहीं रहे । तो कोई विवाद नहीं होगा । इसी को समरसता कहा गया है । उच्च वर्ग इसी समरसता की बात करता है ।  बुद्ध ने दुख किसे कहा ? बुद्ध और कार्ल मार्क्स में बाबा साहब बताते हैं, कि संसार में दुख स्वार्थों के टकराव के कारण होता है । इसका निदान अस्टांगिक मार्ग का अनुसरण है और  संपत्ति के नीजी स्वमित्व से अधिकार और शक्ति एक वर्ग के हाथ में आ जाता है और दूसरा वर्ग दुख भोगता है । इस दुख का निदान उसके कारणों का निवारण करके किया जा सकता है ।" बुद्ध और बाबा साहब का पूरा मिशन भी इसी के इर्द गिर्द घूमता है कि सबको सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य मिले तो किसी को कोई दुख नहीं मिलेगा । संविधान की उद्देशिका भी यही कहती है । पर आज काम बुद्ध, बाबा साहब और संविधान की मूल भावनाओं के ठीक उल्टा हो रहा है । संविधान कहता है आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले कि अमीरी गरीबी की खाई पटे तो,काम इस खाई को और चौड़ी से चौड़ी करने का हो रहा है । बाबा साहब कहते हैं कि हमारे लोग सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य स्थापित करने के लिये सच्चा समाजवाद लायेंगे तो उनके लोग पूंजीवाद लाने का काम कर रहे हैं । समाजवाद की कोई बात ही नहीं कर रहा है । उसी तरह बुद्ध ने कहा की दरिद्रता दुख है । अकुशल कर्म दुख हैं तो उनके लोग कहते हैं- जन्म लेना और मरना दुख है । राग द्वेश और मोह दुख है । इसके लिये रात दिन विपश्यना में लगे हुये हैं । ताकि दूसरा जन्म न लेना पड़े और दुख भोगना पड़े । बुद्ध कहते हैं निर्दोष जीवन का दूसरा नाम निर्वाण है । निर्वाण अष्टांगिक मार्ग के अतिरिक्त कुछ नहीं तो उनके लोग जन्म मरण से मुक्ति को निर्वाण मानते हैं । अष्टांगिक मार्ग को मध्यम मार्ग मानते हैं । सम्यक दृष्टि में क्या माध्यम मार्ग ? बुद्ध ने सारनाथ में पांचों शिष्यों के प्रश्नों के उत्तर में मध्यम मार्ग पर चलने की बात कहा था जिसमें उन लोगों ने पूछा था कि क्या आपने तपस्या का मार्ग त्याग दिया है ? तब उन्होंने कहा कि जीवन को जिंदा रखने के लिये  जीवन की आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति भी मानव की एक जिम्मेदारी है । इसलिये उन्होंने कहा, न शरीर को अधिक सताओ न उसे विलासिता में रखो । मध्यम मार्ग पर चलो । यानी बीच का मार्ग अपनाओ । न अधिक सताओ न अधिक विलासिता में रखो । इसलिये बुद्ध और बाबा साहब को ठीक से समझना और लोगों को ठीक से समझाना भी बाबा साहब के लोगों की एक जिम्मेदारी है । तर्क वितर्क भी जरूरी है । यदि किसी को कहीं एतराज हो तो जरूर अपने कमेंट में लिखें । इसी के साथ बाबा साहब के इस 129 वें जयंती पर उन्हें शत शत नमन ।