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Friday, 26 September 2025

पदोन्नति में आरक्षण के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट का निर्णय असंवैधानिक :प्रोफे०(डॉ०) जी०सिंह कश्यप

पदोन्नति में आरक्षण के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट का निर्णय असंवैधानिक :प्रोफे०(डॉ०) जी०सिंह कश्यप


      पदोन्नति में आरक्षण पर पूरे देश भर में बहस छिड़ी हुई है। आजाद भारत में आरक्षण की आवश्यकता क्यों पड़ीं? यह एक ऐसा विचारणीय प्रश्न है जिस पर प्रत्येक नागरिक को विचार करना होगा। 13 दिसम्बर 1946 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू ने संविधान निर्माण के लिए आठ सूत्रीय उद्देश्य संकल्प संविधान सभा के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत किया। इस संकल्प में प्रत्येक नागरिक को सामाजिक, आर्थिक न्याय देने के लिए देश की अर्थ व्यवस्था क्या होगी तथा देश के उद्योग एवं जमीन का क्या होगा, कोई उल्लेख नहीं था। इस महत्वपूर्ण बिन्दू को उद्देश्य संकल्प में क्यों नहीं शामिल किया गया? यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। उस समय 565 राजाओं ने राष्ट्रहित में अपनी रियासत का परित्याग किया और साधारण मनुष्य बनकर रहना स्वीकार किया। इस देश के उद्योगपतियों और जमींदारों को भी राष्ट्रहित में अपने उद्योग और जमीन का परित्याग करना और साधारण आदमी बनकर रहना स्वीकार करना चाहिए था, परन्तु इन्होंने ऐसा नहीं किया और इन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य भी नहीं किया गया। उद्देश्य संकल्प में इस महत्वपूर्ण बिन्दू को शामिल न करके इन उद्योगपतियों के उद्योग और जमींदारों की जमीन की सुरक्षा की गयी। यहीं से आजाद भारत में आरक्षण की संकल्पना का सूत्रपात होता है। क्योंकि इस देश की 95 प्रतिशत भूमि, शत-प्रतिशत उद्योग और नौकरियाँ उच्च वर्ग के पास हैं। पिछड़ा वर्ग (SC, ST, OBC, CM) के पास मात्र 5 प्रतिशत जमीन है। उद्योग व नौकरियाँ न के बराबर हैं। यदि आरक्षण की संकल्पना न होती तो शत-प्रतिशत नौकरियों भी उच्च वर्ग के ही पास होती। जमीन अयोग्यता के आधार पर और नौकरियों योग्यता के आधार पर। आज आरक्षण के बावजूद भी उच्च वर्ग के पास 80 प्रतिशत नौकरियों है।

         आठ सूत्रीय उद्देश्य संकल्प पत्र पर चर्चा के दौरान 18 दिसम्बर 1946 को बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने खेद व्यक्त करते हुए कहा था " इस प्रस्ताव में यह बात होनी चाहिए थी कि इस देश की जमीन व उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया जायेगा। मैं नहीं समझता कि कोई देश जो सामाजिक और आर्थिक न्याय पर विश्वास करता है, उस देश की अर्थव्यवस्था बिना समाजवादी बनाये कैसे कर सकता है।" इससे स्पष्ट है कि बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर स्वतंत्र भारत के संविधान में भारत के प्रत्येक नागरिक को नौकरी एवं रोजगार की गारण्टी देने के लिए तथा इस देश की ऊँच-नीच की जातियों, समूहों और सम्प्रदायों में बंटे हुए समस्त लोगों के लिए बिना भेदभाव के सामाजिक और आर्थिक न्याय देने के लिए जमीन और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कराना चाहते थे। अगर ऐसा हो गया होता तो पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की आवश्यकता ही समाप्त हो गयी होती। भारत के सभी लोग राजा हों या जमींदार सभी भूमिहीन होते। सामाजिक और अर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य की स्थापना हो जाती। पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप ऊँच-नीच, अमीर-गरीब में जन्म लेने का सिलसिला ही समाप्त हो जाता। विधि के विधान में अमीरी-गरीबी, ऊँच-नीच सुनिश्चित करने वाली भाग्य की सभी रेखायें सदा के लिए समाप्त हो जाती। भाग्य से ज्यादा समय से पहले कुछ भी न मिलने की कहावत पर भी सदा के लिए विराम लग जाता। मंहगे कोचिंग और डोनेशन से योग्यता हासिल करके निम्न वर्ग की योग्यता का उपहास करने की प्रवृत्ति जन्म ही नहीं लेती। उच्च वर्ग का अपने को उच्च साबित करने के सारे आधार और अपने को जबरदस्ती उच्च मनवाने की सारी शक्तियाँ सदा के लिए समाप्त हो जाती। मगर बाबा साहब अम्बेडकर ऐसा नहीं करवा सके। क्योंकि संविधान सभा में ऐसे विचार रखने वाले वे अकेले व्यक्ति थे। इसलिए देश की तरक्की के लिए और समाज के पिछड़े हुए लोगों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए आरक्षण का प्रस्ताव किया। इस प्रस्ताव के विरोध में कुछ समाजवादियों ने संविधान की उद्देशिका में समाजवादी शब्द रखने पर जोर दिया, मगर जमीन और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करने पर जोर नहीं दिया। आज भी इस बिन्दु पर मौन हैं और नकली समाजवादी बने हुए है। साम्यवादी और समाजवादी संगठन उच्च वर्ग के प्रगतिशील विचारकों से नियंत्रित संगठन हैं और उच्च वर्ग के सामाजिक एवं आर्थिक हितों की रक्षा के लिए कार्य करते हैं। इन्होंने सन् 1925 में कम्युनिस्ट पार्टी का और सन् 1934 में समाजवाद के नाम पर कांग्रेस समाजवादी दल का गठन किया ताकि अंग्रेजों द्वारा विधान मण्डल कायम करने के लिए पिछड़ा वर्ग को देने वाले मताधिकार से उपजी समस्या से निपटा जा सके और इनके स्वतन्त्र आन्दोलन खड़ा करने के सभी रास्ते बन्द किये जा सकें। उनकी सोच थी कि यदि संविधान की उद्देशिका में समाजवादी शब्द जुड़ जाये तो अम्बेडकर के द्वारा पिछड़ा वर्ग के लिए सेवाओं में रखे जाने वाले आरक्षण की आवश्यकता ही समाप्त हो जायेगी और एक बार संविधान में इस तरह का कोई प्राविधान नहीं रहेगा तो फिर कभी भी प्राविधान बनाने की नौबत ही नहीं आयेगी। ठीक वैसे ही जैसे सन् 1976 में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने संविधान की उद्देशिका में "समाजवादी" शब्द जोड़ा और आज सारी अर्थव्यवस्था समाजवादी अर्थ व्यवस्था के विपरीत चल रही है। उच्च वर्ग के समाजवादियों और साम्यवादियों की यही नीति उन्हें शोषक और शोषित दोनों के मध्य पूज्यनीय बनाये हुए है और भारत में साम्यवाद और समाजवाद दिवास्वप्न बना हुआ है। बाबा साहब डॉ० अम्बेडकर उनकी चालाकी को भली भाँति जानते थे इसलिए उन्हानें नौकरियों में अनुच्छेद 16(4), 335 तथा 340 का प्रस्ताव किया और इनको संविधान में रखे जाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दिया। यहाँ तक कि उन्होंने प्रारूप समिति के सदस्य के०एम० मुन्शी से यह तक कह दिया कि यदि मेरी ये बातें संविधान में नहीं रखी जायेगी तो मैं संविधान निर्माण से छुट्टी लेता हूँ। जो बनाना चाहते है वे बनाये परन्तु मैं ऐसे संविधान को स्वीकार नहीं करूँगा जिसमें पिछड़ा वर्ग के लिए प्रस्तावित प्राविधान न हो। अन्ततः बाबा साहब की बात माननी पड़ी और संविधान में पिछड़ा वर्ग के लिए प्राविधान बनाना पड़ा। संविधान सभा सदस्य डॉ० पट्टाभिसीता रमैया ने दुःख व्यक्त करते हुए कहा "अन्त में हमें एकाएक संविधान, इस संविधान सभा को अनेक वर्गों एवं समूहों के साथ अपनाना पड़ा। बहुत मूल्य चुकाकर हमने इन वर्गों एवं समूहों से पीछा छुड़ाया था।" प्रमुख समाजवादी दामोदर स्वरूप सेठ ने कहा "उम्र भर गांधी जी हमको डीसेन्ट्रलाइजेशन का सबक सिखाते रहे और उनके बिदा होने के बाद उनको इतनी जल्दी भूल गये। हमारे स्पीकर साहब कहते हैं कि जो यह विधान तैयार हुआ है उसमें हिन्दुस्तान की प्रतिभा का नाम व निशान बिल्कुल नहीं है और उसके वह सर्वथा प्रतिकूल है।" देश की प्रतिभा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी है और उनकी प्रतिभा का समाज दर्शन यह है कि " जो शूद्र तीन वर्णों की सेवा करना अपना धार्मिक कर्तव्य समझते हैं, उनकी अपनी सम्पत्ति कभी नहीं होती। ऐसे शूद्र पूजा करने योग्य है और ऐसे शूद्रों पर देवता भी पुष्प वर्षा किये बिना नहीं रहते" (गांधी जी की पुस्तक 'वर्ण व्यवस्था', पृ० 51)। समाजवादी और साम्यवादी जो भारत की अर्थ व्यवस्था को समाजवादी बनाना चाहते हैं और गांधी को अपना आदर्श मानते हैं, दोनों एक दूसरे के विपरीत। इसके पीछे रहस्य क्या है?

        माननीय सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि एस०सी० एस०टी० का पदोन्नति में आरक्षण असंवैधानिक है। यह कैसे असंवैधानिक कहा जायेगा? संविधान के अनुच्छेद 16(4) में लिखा है कि इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को नागरिकों के किसी पिछड़े वर्ग के पक्ष में जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है। नियुक्तियों और पदों के आरक्षण के लिए उपबन्ध करने से निवारित नहीं करेगी। इसमें यह कहीं नहीं लिखा है कि केवल भर्ती के लिए, खाली पदों को भरने के लिए जो प्रक्रिया अनायी जाती है उसमें कुछ पद सीधी भर्ती से भरे जाते हैं। कुछ पद पदोन्नति से भरे जाते हैं और कुछ पद परामर्श की प्रक्रिया से भरे जाते हैं। जहाँ-जहाँ सेवाओं में पद एवं नियुक्तियाँ होंगी। वहाँ पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के लिए अनुच्छेद 16 (4) प्रभावी हो जायेगा। इसका आशय है कि अगर 100 पद पदोन्नति से भरे जाने है तो उसमें 23 पद एस०सी०/ एस०टी० से, 52 पद ओ०बी०सी० से भरे जाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुच्छेद की गलत व्याख्या करते हुए इन्दिरा साहनी बनाम भारत संघ के वाद में सन् 1992 में अनुसूचित जातियों, जनजातियों के पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगा दिया जिसे संसद ने 77 वां संविधान संसोधन पारित कर अधिनियम 1995 की धारा 2 द्वारा संविधान में 16(4) ए जोड़कर सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को निष्प्रभावी कर दिया जबकि सन् 1962 में जनरल मैनेजर सर्दन रेलवे बनाम सी० रंगाचारी के बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण को बैध माना था। इसके बाद एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि आरक्षण के आधार पर पदोन्नति मिल जाने के बाद भी लाभार्थी को परिणामी वरीयता प्राप्त नहीं होगी, और जब सामान्य वर्ग का उससे वरिष्ठ कर्मचारी बाद में पदोन्नति पाकर उस पद पर आयेगा तो उसकी पुरानी वरीयता बनी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को पुनः निष्प्रभावी करने के लिए 85वां संविधान संशोधन द्वारा 16 (4) ए को पुनः संशोधित कर स्पष्ट किया गया कि पदोन्नति पाने वाले को परिणामी वरीयता भी दी जायेगी। इस संशोधन को एम० नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने संसोधन को संविधान सम्मत ठहराया किन्तु ये शर्ते जोड़ दी कि पिछड़ापन को साबित करने के लिए विश्वसनीय आँकड़े हों। प्रतिनिधित्व पर्याप्त न हो और सेवा की कार्य कुशलता पर विपरीत प्रभाव न हो। पिछड़ापन के प्रामाणिक आधार पर ही नियुक्ति हुई है फिर अलग से पिछड़ापन का कैसा प्रमाण? पर्याप्त प्रतिनिधित्व के न रहने पर ही पदोन्नति हुई है, फिर अलग से प्रतिनिधित्व पर्याप्त न हो जैसी आपत्ति क्यों? शासन ने कार्यकुशलता पर विपरीत प्रभाव न पड़े उसको ध्यान में रखकर ही पदोन्नत दिया है। फिर कार्यकुशलता पर विपरीत प्रभाव न पड़े की आपत्ति क्यों? इस निर्णय के बाद पदोन्नति में आरक्षण देने के अनेक मामलों को विभिन्न उच्च न्यायालयों में चुनौती दी गयी और कई आरक्षण देने वाले प्राविधान निरस्त भी किये गये। यू० पी० पावर कार्पोरेशन बनाम राजेश कुमार के वाद के निर्णय से पहले 2011 में भी सूरजभान मीणा बनाम राजस्थान सरकार के वाद में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा ही फैसला सुनाया था। क्या देश की सर्वोच्च न्यायपालिका का यह फैसला संविधान निर्माताओं की भावनाओं के अनुरूप है? जिसके लिए उन्होंने संविधान में अनुच्छेद 16 (4) का प्राविधान किया था। क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसी कोई स्वतंत्र न्यायिक इकाई है जो संविधान के अनुच्छेदों के विपरीत भी फैसला दे सकती है? देश की पिछड़ा वर्ग की आवाज हर संवैधानिक संस्था चाहे विधायिका हो, चाहे कार्यपालिका या न्यायपालिका हो सबको संविधान के दायरे में ही रहकर कार्य करने की स्वतंत्रता है। मगर सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक हदों को पार कर पदोन्नति में आरक्षण के विरुद्ध अन्यायपूर्ण फैसला दिया है। इसका अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट में एक वर्ग विशेष के न्यायाधीश जातीय दुर्भावना से ग्रसित होकर पिछड़ा वर्ग के खिलाफ अन्यायपूर्ण एवं असंवैधानिक निर्णय दे रहे हैं तथा संविधान की अवहेलना कर रहे हैं जिसे यह पिछड़ा वर्ग अब सहन नहीं करेगा। ओबीसी के लिए भी पदोन्नति में आरक्षण संविधान के 16 (4) में उपबन्धित है जो उन्हें उनकी आबादी के अनुसार 52 प्रतिशत मिलना चाहिए। इस समय उसका लाभ सामान्य वर्ग के लोग ले रहे हैं। हम पिछड़ा वर्ग की आवाज के माध्यम से न्यायालयों, संसदीय शक्तियों तथा कार्यपालिका से यह कहना चाहते हैं कि पिछड़ा वर्ग के संवैधानिक अधिकारों की अवहेलना न की जाय, अन्यथा भारत में जापान की क्रान्ति की पुनरावृत्ति होगी। जिसके सम्बन्ध में चेतावनी इस देश के उच्च वर्ग को बड़ौदा रियासत के महाराजा सायाजी राव गायकवाड़ ने साउथबरो मताधिकार आयोग के आगमन पर सन् 1918 में एक जनसभा में भाषण के दौरान दी थी, जिसकी स्वर्ण जयन्ती आने वाली है। पिछड़ा वर्ग के नेता पिछड़ा वर्ग के लिए नौकरियों में भर्ती एवं पदोन्नति में आरक्षण तथा हाईकोर्ट एवं सुप्रीमकोर्ट में पिछड़ा वर्ग की आबादी के अनुसार समुचित प्रतिनिधित्व 85 प्रतिशत लागू करायें। यदि उच्च वर्ग के गरीबों से ज्यादा हमदर्दी हो तो उच्च वर्ग के 15 प्रतिशत में क्रीमीलेयर लागू करायें अथवा देश की जमीन व उद्योग का राष्ट्रीयकरण करायें अथवा भारत के प्रत्येक नागरिक को योग्यता के आधार पर नौकरी एवं रोजगार, समान कार्यों के लिए समान वेतन, असंगठित क्षेत्र के मजूदरों (मनरेगा आदि) को चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के वेतन के बराबर मजदूरी और असहायों के लिए जीवन निर्वाह भत्ता दिलाने के लिए आवश्यक कानून बनवाये और उसे लागू करवायें। उच्च वर्ग के आरक्षण विरोधी लोग यदि आरक्षण को समाप्त कराना चाहते हैं तो वे अपनी जमीन और उद्योगों का परित्याग करके राष्ट्र की सम्पत्ति घोषित करा दें। तो पिछड़ा वर्ग भी आरक्षण का परित्याग कर देगा। यदि उच्च वर्ग के अमीर और पिछड़ा वर्ग के अमीर इसका विरोध करते हैं तो पिछड़ा वर्ग के गरीब और उच्च वर्ग के गरीब अपने-अपने सम्वर्ग में इसके लिए जनमत तैयार करें।

       पिछड़ा वर्ग के अधिकारी, कर्मचारी जो नौकरियों में समुचित प्रतिनिधित्व का लाभ ले रहे हैं वे अपने समाज में प्रत्येक व्यक्ति को नौकरी व रोजगार उपलब्ध कराने के लिए तन-मन-धन से सहयोग कर जनमत तैयार करने का कार्य करें ताकि बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने जिस उद्देश्य से नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व का उपबन्ध करवाया था उसका उद्देश्य पूरा हो सके, जिसे बाबा साहब संविधान निर्माण में अकेले होने के कारण पूरा नहीं करा सके थे।

पिछड़ा वर्ग सम्मेलन:जातिगत जनगणना, संवैधानिक अधिकार, दशा एवं दिशा


यह पोस्टर "पिछड़ा वर्ग सम्मेलन" से जुड़ा हुआ है, जिसमें "जातिगत जनगणना, संवैधानिक अधिकार, दशा एवं दिशा" पर संगोष्ठी आयोजित की गई थी।

📌 मुख्य जानकारी

  • कार्यक्रम का नाम: पिछड़ा वर्ग सम्मेलन

  • विषय: जातिगत जनगणना, संवैधानिक अधिकार, दशा एवं दिशा

  • तारीख: 02-01-2022

  • समय: प्रातः 11 बजे

  • स्थान: लार्ड कृष्णा पब्लिक स्कूल, भगीपुर, बोरसिया, कठवा मोड़, गाज़ीपुर

👥 मुख्य अतिथि / वक्ता

  • प्रो. धर्मेंद्र यादव (राष्ट्रीय प्रवक्ता, समाजवादी पार्टी)

  • प्रो. जी.सिंह  कश्यप (राष्ट्रीय अध्यक्ष, पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन)

  • इं. विनोद यादव (प्रदेश अध्यक्ष अखिल भारतीय यादव महासभा, शिक्षक प्रकोष्ठ उत्तर प्रदेश  लखनऊ)

🎤 विशिष्ट वक्ता

  • सुरेंद्र सिंह यादव

  • काशीनाथ  यादव

  • इं. लवकुश  सोनकर

  • जनार्दन सिंह

📖 प्रमुख वक्ता

  1. श्री चन्द्रश मोर्ची (चंदौली)

  2. डॉ. रमाशंकर राजभर (पूर्व मंत्री, उ.प्र.)

  3. डॉ. नंदलाल बिन्द (जिला अध्यक्ष, उ.प्र. सपा.)

  4. श्री धीरेंद्र विश्वकर्मा ( अध्यापक गाजीपुर)

  5. श्री प्रदीप प्रजापति (अध्यापक, गाजीपुर)

  6. डॉ. आर.के. बिंद्रा 

👤 निवेदक:
मथुरा सिंह यादव
(जिला अध्यक्ष, अखिल भारतीय यादव महासभा, शिक्षक प्रकोष्ठ, गाजीपुर)

📢 आयोजक:
अखिल भारतीय यादव महासभा, शिक्षक प्रकोष्ठ


जातिगत जनगणना, संवैधानिक अधिकार, दशा एवं दिशा

भारत का संविधान हर नागरिक को समान अधिकार, अवसर और न्याय की गारंटी देता है। लेकिन व्यावहारिक स्तर पर आज भी सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ मौजूद हैं। इन असमानताओं को दूर करने और वंचित वर्गों को बराबरी दिलाने के लिए जातिगत जनगणना एक बेहद जरूरी कदम है। यह केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की सटीक तस्वीर सामने लाने का माध्यम है।

पिछड़े वर्गों और दलितों को आरक्षण, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे संवैधानिक अधिकार तो मिले हैं, लेकिन सवाल यह है कि इन अधिकारों का वास्तविक लाभ उन्हें कितनी मात्रा में मिल रहा है? जातिगत जनगणना से यह साफ होगा कि समाज में किस वर्ग की आबादी कितनी है और उन्हें शासन व संसाधनों में कितना हिस्सा मिला है। यह आँकड़े नीतियों को अधिक प्रभावी और न्यायसंगत बनाने में मदद करेंगे।

संवैधानिक अधिकारों की बात करें तो बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने यह स्पष्ट किया था कि बिना सामाजिक और आर्थिक न्याय के राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा है। अधिकारों का वास्तविक लाभ तभी संभव है जब पिछड़े वर्गों और वंचित समाज की सही पहचान हो और उन्हें उनकी संख्या के अनुपात में अवसर मिलें। जातिगत जनगणना इस दिशा में ठोस आधार प्रदान कर सकती है।

दशा और दिशा दोनों ही आज के परिप्रेक्ष्य में गंभीर प्रश्न हैं। दशा यह है कि समाज का बड़ा हिस्सा अभी भी गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और भेदभाव का सामना कर रहा है। यह वर्ग आज भी निर्णय लेने वाली संस्थाओं और शक्ति-संरचना से दूर है। दिशा यह होनी चाहिए कि देश में ऐसा तंत्र विकसित किया जाए जहाँ सामाजिक न्याय और समानता केवल नारे न रहकर हकीकत बनें। इसके लिए सबसे पहली शर्त है कि राज्य और केंद्र सरकारें जातिगत जनगणना कराएँ और उसके आधार पर योजनाएँ बनाएँ।

जातिगत जनगणना से यह भी स्पष्ट होगा कि समाज के कौन-से हिस्से अब भी हाशिए पर हैं और किन्हें सशक्तिकरण की अधिक जरूरत है। यह नीति निर्माण में पारदर्शिता लाएगा और संसाधनों के समान वितरण को सुनिश्चित करेगा। साथ ही, इससे समाज में व्याप्त भ्रांतियाँ और आंकड़ों की कमी से उपजी असमानताएँ भी दूर होंगी।

यह कहना गलत नहीं होगा कि जातिगत जनगणना, संवैधानिक अधिकारों को वास्तविक धरातल पर लागू करने की सबसे अहम कड़ी है। जब तक हर वर्ग की सही स्थिति सामने नहीं आएगी, तब तक न तो अधिकार पूरी तरह मिल पाएंगे और न ही सामाजिक न्याय की दिशा में सही कदम उठ पाएंगे।

आज आवश्यकता है कि समाज के सभी वर्ग, विशेषकर बुद्धिजीवी, शिक्षक, छात्र और राजनीतिक कार्यकर्ता, इस विषय पर जागरूकता फैलाएँ और सरकारों पर दबाव डालें कि जातिगत जनगणना को तुरंत लागू किया जाए। तभी संविधान में दिए गए समानता और न्याय के आदर्श को साकार किया जा सकेगा।



Saturday, 20 September 2025

जाति आधारित परिवार-केंद्रित पार्टियाँ: बहुजनों के साथ विश्वासघात


भारतीय राजनीति में जाति हमेशा से निर्णायक तत्व रही है। दलित-पिछड़े, आदिवासी और अन्य मूलनिवासी समुदाय जब-जब अपने अधिकारों के लिए जागरूक हुए, तब-तब विभिन्न नेता और परिवार उनके नाम पर राजनीति में उभरे। उन्होंने बहुजन समाज को यह सपना दिखाया कि उनकी पार्टी ही उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी दिलाएगी। लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि ऐसी जाति-जाति की व्यक्ति या परिवार केंद्रित पार्टियाँ बहुजन समाज को शासक जमात बनाने का आंदोलन खड़ा नहीं करतीं, बल्कि उन्हें ब्राह्मणवादी ताक़तों के लिए “रेडिमेड चमचे” बनाकर तैयार कर देती हैं।

1. परिवारवाद की राजनीति का संकट

बहुजन समाज के नाम पर बनी अधिकांश पार्टियों का नियंत्रण कुछ गिने-चुने व्यक्तियों या उनके परिवारों के हाथों में सिमट गया है। यहाँ जनता की भागीदारी केवल वोट तक सीमित रहती है। आंदोलन चाहे लाखों का हो, लेकिन उसका राजनीतिक और आर्थिक लाभ सिर्फ एक परिवार को मिलता है। यह लोकतांत्रिक राजनीति का नहीं, बल्कि सामंती सत्ता का रूप है, जिसमें बहुजन जनता केवल सीढ़ी बनकर रह जाती है।

2. बहुजन आंदोलन का मूल उद्देश्य

फुले, पेरियार, आंबेडकर और कांशीराम ने बहुजन आंदोलन का असली मकसद साफ़ किया था—

  • जाति व्यवस्था का उन्मूलन,
  • शिक्षा और जागरूकता के ज़रिए सामाजिक बदलाव,
  • और बहुजन समाज को शासक जमात में बदलना।

लेकिन परिवार-केंद्रित दल इस उद्देश्य को आगे बढ़ाने की बजाय, केवल जातीय वोट बैंक इकट्ठा कर सत्ता की भागीदारी में अपने परिवार को सुरक्षित करने का काम करते हैं। इस प्रक्रिया में बहुजन जनता का सामूहिक लक्ष्य पीछे छूट जाता है।

3. ब्राह्मणवादी ताक़तों से समझौता

आजादी के बाद से अब तक उच्च जातीय दलों—चाहे वे खुद को राष्ट्रवादी कहें या धर्मनिरपेक्ष—का असली उद्देश्य सामाजिक वर्चस्व बनाए रखना ही रहा है। परिवारवादी बहुजन पार्टियाँ चुनाव के समय इन्हीं दलों से समझौता कर लेती हैं। नतीजा यह होता है कि बहुजन समाज अपने ही नेताओं के पीछे चलते हुए उन्हीं ताक़तों की सेवा करने लगता है, जिनके खिलाफ आंदोलन खड़ा किया गया था। यही वह बिंदु है जहाँ बहुजन राजनीति ब्राह्मणवादी राजनीति की “सप्लायर” बन जाती है।

4. जनता का मोहभंग और आंदोलन की कमजोरी

जब जनता बार-बार देखती है कि जिन नेताओं को उसने अपना उद्धारक समझा था, वे सिर्फ अपने परिवार को सत्ता तक पहुँचाने में लगे हैं, तो उसमें गहरा मोहभंग पैदा होता है। शिक्षा, रोजगार, आरक्षण, सामाजिक न्याय और सत्ता में वास्तविक भागीदारी जैसे मुद्दे पीछे धकेल दिए जाते हैं। इस कारण बहुजन आंदोलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ता है और जनता दोबारा वही पुराने शोषक ढांचे के अधीन चली जाती है।

5. आगे का रास्ता

बहुजन समाज को अब यह समझना होगा कि व्यक्ति-पूजा और परिवारवाद आंदोलन को कमजोर करते हैं। असली लड़ाई जाति प्रथा के उन्मूलन और सत्ता में बहुजन बहुसंख्यक की साझेदारी सुनिश्चित करने की है। इसके लिए आवश्यक है—

  • सामूहिक नेतृत्व,
  • वैचारिक एकजुटता,
  • और सत्ता के विकेन्द्रीकरण की राजनीति।

बहुजन आंदोलन को केवल वोट जुटाने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाना होगा।


निष्कर्ष

जाति-जाति की परिवार केंद्रित पार्टियाँ बहुजनों को शासक जमात बनाने का आंदोलन नहीं चलातीं, बल्कि वे ब्राह्मणवादी राजनीति के लिए रेडिमेड चमचे तैयार करने का षड्यंत्र करती हैं। बहुजन समाज को अब यह तय करना होगा कि वह जाति और परिवारवाद की राजनीति का हिस्सा बनेगा या आंबेडकर–फुले–पेरियार की वैचारिक धारा पर चलकर असली सत्ता-भागीदारी हा

सदियों से मनुवादी जुल्म के खिलाफ खड़े हो जाने का नाम है डॉ० भीमराव अम्बेडकर


सदियों से मनुवादी जुल्म के खिलाफ खड़े हो जाने का नाम है डॉ० भीमराव अम्बेडकर

     भारतीय समाज हजारों वर्षों से जाति-व्यवस्था, छुआछूत और भेदभाव की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। मनुवादी व्यवस्था ने समाज को ऊँच-नीच में बाँटकर बहुजन समाज को शिक्षा, सम्मान, अवसर और अधिकार से वंचित कर दिया था। इस अमानवीय ढांचे के खिलाफ जो सबसे सशक्त आवाज उठी, वह थी डॉ० भीमराव रामजी अम्बेडकर की।

           अम्बेडकर ने स्वयं अपने जीवन में जातिगत भेदभाव का गहरा अनुभव किया। बाल्यावस्था में उन्हें स्कूल में प्यास लगने पर पानी तक पीने नहीं दिया गया। शिक्षा प्राप्त करने के दौरान, नौकरी और सामाजिक जीवन में हर कदम पर अपमान का सामना करना पड़ा। लेकिन इन कठिनाइयों ने उनके हौसले को तोड़ा नहीं, बल्कि उन्हें और दृढ़ बनाया। उन्होंने तय किया कि वे सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि उन करोड़ों पीड़ित, शोषित और वंचित लोगों के लिए संघर्ष करेंगे जिनकी आवाज कभी सुनी ही नहीं गई थी। 

        डॉ० अम्बेडकर का मानना था कि असली आज़ादी राजनीतिक स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि सामाजिक समानता से मिलती है। उन्होंने शिक्षा को शोषित समाज का सबसे बड़ा हथियार बताया। वे कहते थे – “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।” यही वह मार्ग था, जिससे बहुजन समाज को मनुवादी जुल्म से मुक्ति मिल सकती थी। अम्बेडकर ने मनुवादी शास्त्रों और परंपराओं को खुलकर चुनौती दी। उन्होंने तर्क और विवेक के आधार पर यह प्रश्न उठाया कि क्या कोई भी व्यवस्था इंसान को इंसान से छोटा या बड़ा बना सकती है? उनका उत्तर था – नहीं। इसी सोच के कारण वे ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना के सबसे बड़े आलोचक और बहुजन समाज के सच्चे नेता बन गए।। संविधान सभा में उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद रखी। संविधान में उन्होंने समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय को सर्वोच्च स्थान दिया। यह उनकी दूरदृष्टि का ही परिणाम है कि आज भारत में हर नागरिक को कानून के सामने बराबरी का अधिकार प्राप्त है। अम्बेडकर का जीवन केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सामाजिक क्रांति का नेतृत्व किया। उन्होंने स्त्रियों के अधिकारों की पैरवी की, मजदूरों और किसानों के हितों के लिए संघर्ष किया और अंततः 1956 में बौद्ध धर्म स्वीकार कर करोड़ों अनुयायियों को आत्म-सम्मान और बराबरी का रास्ता दिखाया।  

           आज अगर भारत में दलित, पिछड़े, महिलाएँ और वंचित तबके अपने अधिकारों की बात कर पा रहे हैं, तो इसके पीछे अम्बेडकर का ही संघर्ष है। वे सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वह प्रतीक हैं जो सदियों से चले आ रहे मनुवादी जुल्म के खिलाफ खड़े हो गए और पूरे समाज को उठ खड़े होने की प्रेरणा दी। इसलिए सही मायनों में कहा जाए तो –  “सदियों से मनुवादी जुल्म के खिलाफ खड़े हो जाने का नाम है डॉ० भीमराव अम्बेडकर।”

Thursday, 18 September 2025

यदि शपथ को आचरण में उतारा जाए, तो वह समाज के उत्थान और क्रांति का आधार बन सकती है: संत लहरी सिंह कश्यप के संदर्भ में

यदि शपथ को आचरण में उतारा जाए, तो वह समाज के उत्थान और क्रांति का आधार बन सकती है: संत लहरी सिंह कश्यप के संदर्भ में, वे एक समाज सुधारक, संत और जनजागरण के प्रेरक थे। उन्होंने हमेशा सत्य, समानता और न्याय पर बल दिया। उनके जीवन में शपथ (Oath/Resolution) की विशेष भूमिका रही, क्योंकि शपथ व्यक्ति को अपने लक्ष्य और मूल्यों से जोड़े रखती है।

शपथ की उपयोगिता :

  1. संकल्प की दृढ़ता – शपथ लेने से व्यक्ति अपने विचारों और कार्यों के प्रति दृढ़ निश्चयी हो जाता है। संत लहरी सिंह कश्यप ने समाज को शोषण, अन्याय और भेदभाव से मुक्त करने का जो संकल्प लिया था, वह उनके जीवन की शपथ थी।

  2. सामूहिक जागृति – शपथ केवल व्यक्तिगत नहीं होती, यह समाज में जागरूकता और सामूहिक शक्ति जगाने का माध्यम बनती है। संत जी अपने अनुयायियों से भी समानता, शिक्षा और संघर्ष की शपथ दिलवाते थे।

  3. अनुशासन और नैतिक बल – शपथ व्यक्ति के जीवन को अनुशासित और नैतिक बनाती है। यह उसे प्रलोभनों और भय से बचाती है।

  4. न्याय और समानता का मार्ग – शपथ समाज में न्याय और समानता स्थापित करने के लिए संघर्ष की प्रेरणा देती है। संत लहरी सिंह कश्यप ने अपने जीवनभर इस मार्ग पर डटे रहकर समाज को प्रेरित किया।

  5. समाज परिवर्तन का साधन – शपथ एक आंदोलन या क्रांति का आधार बन सकती है। जैसे – जब लोग सामूहिक रूप से शपथ लेते हैं कि वे अन्याय और असमानता को स्वीकार नहीं करेंगे, तो परिवर्तन निश्चित होता है।


इतना ही नही जब कभी दो पक्षों में किसी बात को लेकर विवाद की स्थिति बनती है और यह साबित नहीं हो पाता कि कौन सही और कौन गलत है तो फिर 'शपथ' ली जाती है, जिसे कसम और सौगंध भी कहा जाता है। शपथ लेने के कई तरीके हैं। पहला तो दोनों पक्षों से कहा जाता है कि वे अपने सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति का नाम लेकर शपथ लें। सरकारी स्तर पर जब कोई पद प्राप्त होता है, तो पदासीन होने वाला शख्स संविधान की शपथ लेता है। इसमें मंत्री, सांसद, विधायक और अधिकारीगण भी शामिल हैं। भारतीय संस्कृति में शपथ का बहुत महत्व है। माना जाता है कि झूठी शपथ लेने वाले का अनिष्ट होता है। इसलिए शपथ तभी लेनी चाहिए, जब अंदर से यह लगे कि जो सही है, वही कहा जा रहा है। सत्य शपथ में बड़ी शक्ति बताई जाती है। जबकि झूठी शपथ साम्राज्यों से लेकर कुल के पतन का कारण भी बन सकती है।. स्मरण रहे कि महाभारत युद्ध तो पांडवों की पत्नी द्रौपदी की शपथ का परिणाम रहा। युधिष्ठिर द्वारा द्रौपदी को जुए में हारने के बाद जब दुर्योधन, के भाई दुशासन ने द्रौपदी के बाल खींचते हुए भरी, 'सभा में निर्वस्त्र करना चाहा तो उन्होंने शपथ ली कि जब तक दुर्योधन का विनाश नहीं हो जाएगा, तब तक वह बाल नहीं बांधेंगी। द्रौपदी की शपथ 4 को पांडवों ने सच साबित किया। इसके बाद ही द्रौपदी ने बाल बांधे। इसी तरह की शपथ आचार्य चाणक्य ने भी ली थी। नंद वंश के राजा घनानंद ने चाणक्य का अपमान किया। अपमानित होने पर चाणक्य ने अपनी शिखा खोल दी और तय किया कि वह नंद वंश के विनाश के बाद ही पुनः शिखा बांधेंगे। अपनी शपथ को पूरा करने के लिए उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य का सहयोग लिया। इसलिए शपथ बहुत सोच-समझ कर लेनी चाहिए। झूठी शपथ से पुण्य नष्ट होता है। निष्कर्षतः संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन स्वयं एक शपथ था – "समानता, न्याय और मानवीय गरिमा की स्थापना"। उन्होंने दिखाया कि यदि शपथ को आचरण में उतारा जाए, तो वह समाज के उत्थान और क्रांति का आधार बन सकती है


राष्ट्र निर्माण में महापुरुषों का योगदान : पेरियार और ललई सिंह यादव की जयंती


19 सितम्बर 2021 को गाजीपुर जिले के रुक्कापुर में “राष्ट्र निर्माण में महापुरुषों का योगदान” विषयक एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह अवसर दो महान समाज सुधारकों—पेरियार ई. वी. रामास्वामी नायकर और समाज चेतना के प्रतीक ललई सिंह यादव—की जयंती का था। कार्यक्रम में अनेक सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद् और छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।

इस अवसर पर मुख्य वक्ता डॉ. जी. सिंह कश्यप ने अपने विचार रखते हुए कहा कि पेरियार की शिक्षाएँ केवल धार्मिक आलोचना तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वे सामाजिक और राजनीतिक जीवन की वास्तविकताओं से जुड़ी थीं। उन्होंने तर्क के आधार पर यह प्रश्न उठाया था—“क्या कोई देवी-देवता आपकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं का समाधान करते हैं? बिल्कुल नहीं!”

डॉ. कश्यप ने स्पष्ट किया कि यदि वास्तव में देवी-देवता समाज के दुखों का समाधान करते, तो हजारों वर्षों पहले ही अछूतपन, गैरबराबरी और शोषण की व्यवस्था समाप्त हो गई होती। लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी जातिगत भेदभाव, असमानता और अन्याय समाज में मौजूद है। इसलिए पेरियार ने तर्क, विज्ञान और शिक्षा पर आधारित समाज निर्माण की राह दिखाई।

पेरियार की शिक्षाएँ और उनका संदेश

पेरियार का जीवन इस विचार का प्रतीक था कि “तर्क ही सत्य तक पहुँचने का मार्ग है।” वे अंधविश्वासों के कट्टर विरोधी थे और समाज से प्रश्न पूछने की हिम्मत पैदा करते थे। उनका कहना था कि—

  • पूजा और आस्था से नहीं, बल्कि शिक्षा और आत्मसम्मान से मुक्ति संभव है।

  • समाज को बराबरी और न्याय की नींव पर खड़ा करना ही असली धर्म है।

  • महिलाएँ, दलित और वंचित वर्ग यदि संगठित होकर अपने अधिकार की माँग करेंगे, तभी राष्ट्र मजबूत होगा।

पेरियार ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह सभी को समान अवसर और सम्मान प्रदान करे।

ललई सिंह यादव का योगदान

इस आयोजन में वक्ताओं ने ललई सिंह यादव के योगदान को भी विस्तार से याद किया। उन्हें प्रायः “यादवों का पेरियार” कहा जाता है क्योंकि उन्होंने भी अंधविश्वास, शोषण और गैरबराबरी के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना।

ग्रामीण समाज में शिक्षा का अलख जगाना, पिछड़े और शोषित वर्ग को संगठित करना, तथा अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना ललई सिंह यादव की पहचान थी। उन्होंने दिखाया कि समाज परिवर्तन केवल विचारों से नहीं बल्कि संघर्ष और संगठन से संभव है।

उनका जीवन यह सिखाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों के प्रयास से नहीं, बल्कि जनता की जागरूकता और साहसिक कदमों से होता है।

डॉ. जी. सिंह कश्यप के विचार

डॉ. कश्यप ने कहा कि आज के समय में जब धार्मिक आडंबर और जातिगत भेदभाव फिर से सिर उठाने लगे हैं, तब पेरियार और ललई सिंह यादव की शिक्षाएँ और भी प्रासंगिक हो जाती हैं।

उन्होंने कहा—

  • “सामाजिक परिवर्तन का मार्ग तर्क और विज्ञान से होकर जाता है, न कि अंधविश्वास और आस्था से।”

  • यदि हम समाज से शोषण और गैरबराबरी मिटाना चाहते हैं, तो हमें शिक्षा को हथियार बनाना होगा।

  • लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक समान अवसर और न्याय पहुँचेगा।

राष्ट्र निर्माण की दिशा

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में राष्ट्र निर्माण का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है। असली राष्ट्र निर्माण तब होगा जब—

  • हर व्यक्ति को समान अवसर और सम्मान मिले।

  • महिलाओं और दलितों को बराबरी के अधिकार प्राप्त हों।

  • आर्थिक और सामाजिक असमानताओं को दूर किया जाए।

  • विज्ञान, शिक्षा और तर्क पर आधारित सामाजिक व्यवस्था बने।

पेरियार और ललई सिंह यादव ने अपने जीवन से इन मूल्यों को जीवंत किया।

आज की प्रासंगिकता

आज जब भारत आर्थिक प्रगति और तकनीकी विकास की ओर बढ़ रहा है, तब भी सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव और धार्मिक आडंबर हमारे सामने चुनौतियाँ बने हुए हैं।

इन परिस्थितियों में पेरियार का यह सवाल और भी गूंजता है—
“क्या कोई देवी-देवता आपकी समस्याओं का समाधान करते हैं?”
इसका उत्तर आज भी वही है—“बिल्कुल नहीं।”
समाधान केवल शिक्षा, संगठन, संघर्ष और संवैधानिक अधिकारों के प्रयोग से ही संभव है।

निष्कर्ष

रुक्कापुर, गाजीपुर में आयोजित यह जयंती समारोह केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं था, बल्कि आत्ममंथन का क्षण था। इसने हमें याद दिलाया कि महापुरुषों का मार्गदर्शन आज भी उतना ही जरूरी है जितना उनके जीवनकाल में था।

पेरियार और ललई सिंह यादव ने हमें सिखाया कि सच्चा राष्ट्र निर्माण तभी संभव है जब समाज से भेदभाव और शोषण की जड़ें उखाड़ी जाएँ और तर्क, समानता तथा न्याय पर आधारित नई व्यवस्था स्थापित की जाए।

उनकी शिक्षाओं को आत्मसात करना ही उनकी सबसे बड़ी स्मृति है और यही भारत को एक सशक्त, न्यायपूर्ण और समतामूलक राष्ट्र बनाने की राह है।

Wednesday, 17 September 2025

पिछड़ा वर्ग के लोगो उठो, जागो और संघर्ष करो : डॉ० जी० सिंह कश्यप


18 सितंबर 2022 को गाजीपुर के स्टार पैलेश में वीर एकलव्य फाउंडेशन ट्रस्ट द्वारा आयोजित युवा बौद्धिक शैक्षिक एवं सामाजिक चिंतन शिविर में  पी जी कॉलेज गाजीपुर के आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के प्रोफेसर एवं  अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ० जी० सिंह कश्यप ने एक ऐतिहासिक और मार्गदर्शक विचार प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि – “देश के प्रत्येक साधन-संसाधन यानी शक्ति के सभी स्रोतों – आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक क्षेत्र में आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी सुनिश्चित करने हेतु संघर्ष करना होगा। समाज को एकजुट होकर मानसिक स्तर से लेकर सड़क, संसद और विधानसभा तक आंदोलन छेड़ना होगा।”यह कथन सिर्फ़ भाषण नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के दबे-कुचले और वंचित तबकों के लिए एक आह्वान था।

1. शिक्षा : समानता की पहली सीढ़ी

डॉ० कश्यप ने शिक्षा को सबसे महत्वपूर्ण साधन बताया। सदियों से वंचित तबकों को शिक्षा से दूर रखा गया ताकि ज्ञान और विवेक विकसित न हो सके। आज भी शिक्षा की गुणवत्ता और पहुंच में असमानता साफ दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि अगर समाज शिक्षा में मजबूत होगा, तो बाकी सभी क्षेत्रों में अपनी हिस्सेदारी खुद हासिल कर सकेगा। इसलिए बच्चों से लेकर युवाओं तक को शिक्षित करना सबसे बड़ा आंदोलन है।

2. आर्थिक संसाधनों में भागीदारी

देश की संपत्ति और साधन कुछ गिने-चुने हाथों में केंद्रित हैं। गरीब, मजदूर, किसान और वंचित वर्ग आज भी आर्थिक असुरक्षा में जी रहे हैं। डॉ० कश्यप का मानना है कि आबादी के अनुपात में आर्थिक अवसर और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। जब तक गरीब वर्ग आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होगा, तब तक वह अपने हक की लड़ाई मजबूती से नहीं लड़ पाएगा।

3. राजनीतिक शक्ति और प्रतिनिधित्व

राजनीति ही वह साधन है, जो समाज के हर क्षेत्र को प्रभावित करता है। अगर सत्ता में हिस्सेदारी नहीं होगी तो नीति-निर्माण भी पक्षपाती रहेगा। उन्होंने कहा कि वंचित समाज को केवल वोट बैंक बनने की बजाय खुद सत्ता का हिस्सा बनना होगा। पंचायत से लेकर संसद तक अपनी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होगा।

4. धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता

धर्म और संस्कृति भी समाज पर गहरा प्रभाव डालते हैं। अक्सर धार्मिक सत्ता का इस्तेमाल वंचित समाज को दबाने के लिए किया गया। डॉ० कश्यप ने लोगों से आह्वान किया कि धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी समानता और स्वतंत्रता का वातावरण बने। किसी भी जाति या वर्ग को पूजा-पद्धति, मंदिर, या धार्मिक संसाधनों से वंचित न किया जाए।

5. संघर्ष की दिशा

डॉ० कश्यप ने स्पष्ट किया कि यह संघर्ष केवल सड़क पर नारेबाज़ी तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह मानसिक स्तर से शुरू होकर संसद और विधानसभा तक पहुंचना चाहिए। मतलब – विचार, शिक्षा, लेखन, बहस, सोशल मीडिया और जन-जागरण से लेकर धरना-प्रदर्शन और विधायी संस्थाओं में बहस तक हर स्तर पर यह लड़ाई जारी रहनी चाहिए।

6. समाज के दबे-कुचले लोगों का आह्वान

आज भी लाखों लोग गरीबी, भेदभाव और उत्पीड़न की मार झेल रहे हैं। उन्हें अपने हक की पहचान करानी होगी। डॉ० कश्यप ने कहा – “उठो, जागो और जब तक हक न मिल जाए, तब तक रुको मत।” यह संदेश खासकर उन वर्गों के लिए है जिन्हें जानबूझकर सत्ता, संसाधन और शिक्षा से वंचित रखा गया।

निष्कर्ष

डॉ० जी० सिंह कश्यप का यह संदेश समाज के लिए चेतावनी भी है और प्रेरणा भी। अगर आबादी के हिसाब से शिक्षा, संपत्ति और सत्ता में हिस्सेदारी सुनिश्चित नहीं हुई तो लोकतंत्र का असली उद्देश्य अधूरा रहेगा। इसलिए अब समय है कि दबे-कुचले और वंचित समाज के लोग एकजुट होकर शिक्षा, सड़क और संसद—हर जगह अपनी हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ें। यही संघर्ष असली आज़ादी और सामाजिक न्याय का मार्ग है।