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Saturday, 14 December 2019

राजनीतिक विश्लेषक श्री प्रदीप सिंह एवं स्तंभकार श्री विकास सारस्वत जी का दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख पर टिप्पणी

नीचे राजनीतिक विश्लेषक श्री प्रदीप सिंह एवं स्तंभकार श्री विकास सारस्वत जी का दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख है ।
           राजनीतिक विश्लेषक श्री प्रदीप सिंह जी ने सीएबी और एनआरसी मुद्दे पर अपने दैनिक जागरण वाराणसी के दिनांक 12.12.2019 के "नया इतिहास रचते मोदी- शाह" शीर्षक से प्रकाशित अंक में कहा है कि, " वास्तव में यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि वह (भाजपा) भारतीय समाज को उसकी जड़ों की ओर वापस ले जा रही है । जो काम आजादी के बाद ही शुरू हो जाना चाहिए था वो अब हो रहा है । इस देश की आत्मा भारतीय संस्कृति में बसती है ।" आगे वह कहते हैं, " भाजपा का मानना है कि देश का धर्म के आधार पर बटवारे का एजेंडा पूरा नहीं हुआ है ।" इसी बात को विकास सारस्वत अपने उसी दिन के दैनिक जागरण में," भूल सुधार है नागरिकता विधेयक " शीर्षक से प्रकाशित अपने निबंध में इस प्रकार कहते हैं, "राष्ट्र- राज्य वह अवधारणा है जिसमें राज्य पुरातन सभ्यता और सांस्कृतिक पहचान का उत्तराधिकारी होता है । और उसके ऊपर पूरातन पहचान को बनाये रखने का उत्तरदायित्व होता है ।" इन स्तंभ लेखकों के लेखों से प्रतीत होता है कि भाजपा सीएबी और एनआरसी को भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने के प्रथम पायदान के रूप में ला  रही है । अयोध्या मुद्दे के समाप्त हो जाने के बाद हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण के लिये मथुरा काशी मुद्दे को अभी छेड़ना नहीं चाह रही थी इसलिये सीएबी और एनआरसी को ही एक नया हथियार के रूप में गढ़ा गया है । ताकि मुस्लिमों के खिलाफ हिन्दू ध्रुवीकरण को जारी रखा जाय और  इसी ध्रुवीकरण के बल पर एससी एसटी ओबीसी के आपसी ध्रुवीकरण को रोका जा सके और उन्हें उनकी पुरानी जगह पहुंचाई जा सके । जहां से अंग्रेज़ी हुकूमत लाये गये थे । भारत के ब्राह्मणों से अच्छे तो अंग्रेज ही थे जिन्होंने इस समाज को मानवीय जीवन जीने का अवसर प्रदान किया । ये पुनः उसे छिनना चाहते हैं । एससी एसटी को कहते हैं तुम्हारे लिये आरक्षण ठीक नहीं है और ओबीसी से कहते हैं आरक्षण बैसाखी है । इस तरह पूरी आरक्षण व्यवस्था को ही ध्वस्त कर दिया है । भाजपा आरएसएस का एजेंडा क्या है ? पूरा देश जानता है । पर देश के कुछ राजनीतिक घरानों को इससे मतलब नहीं । उन्हें अपना राजनीतिक कद ऊंचा करना है । देश,समाज जाये भाड़ में । यदि ये सब एक जूट होकर रहते तो भाजपा कभी सत्ता में आती ही नहीं । यही कारण है कि देश के न चाहते हुए भी भाजपा भारी बहुमत से सत्ता में आई । जब देश आजाद हुआ था तभी भाजपा के आदर्श पुरूष विनायक दामोदर सावरकर ने आरएसएस के मुखपत्र पंचजन्य मे कहा था कि भारत के पास जब मनुस्मृति है तो अलग से संविधान बनाने की क्या जरूरत ? राजस्थान हाईकोर्ट के सामने मनु की मूर्ति इसका जीता जागता प्रमाण है । इलाहाबाद हाईकोर्ट के माननीय जज द्वारा गीता को "राष्ट्रीय पुस्तक" घोषित करने का निर्देश भारत सरकार को देना इसी का एक हिस्सा है । गीता को डा. अंबेडकर शरारत पूर्ण पुस्तक बता ही चुके हैं ।  महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामः धर्मराज युधिष्ठिर को राजकाज समझाते हुये कहते हैं ,शूद्र को इतनी ही मजदूरी मिलनी चाहिए और वह भी ऐसे फटे वस्त्र में कि घर जाते जाते आधा रह जाये जिससे उसका और उसके परिवार का पेट न भर सके । पेट भरेगा तो वह तुम्हारे लिये खतरा बन जायेगा । आज भाजपा द्वारा सरकारी क्षेत्र को प्राइवेट सेक्टर में डालकर बेरोजगारी पैदा करना इसी एजेंडा का एक हिस्सा है । गुप्तकाल को इसलिये स्वर्ण युग कहा जाता है क्योंकि इसी काल में किसी समय अछूतपन पैदा हुआ । डा. अंबेडकर ने अपनी पुस्तक " the untachables" में लिखा है । इसी काल में किसी समय भारत में अछूतपन पैदा हुआ और बौद्ध अनुयायियों को अछूत घोषित किया गया । यही भारतीय सभ्यता और संस्कृति की जड़ें हैं जिसकी ओर भाजपा और आरएसएस देश को ले जा रहे हैं । विकास सारस्वत का मरीच झापी के दलित हिंदुओं पर उमड़ता प्रेम सीएबी और एनआरसी को जस्टीफाई करने का एक उपक्रम मात्र है । कितना इस समाज का उत्पीड़न ब्राह्मण धर्म के नाम पर किया गया है । यह पूरे हिन्दू धर्म शास्त्रों (स्मृतियां,कल्प सूत्र,पुराण,महाभारत, रामायण, गीता) में भरा पड़ा है । आज उसे किन्हीं लोगों द्वारा प्रक्षेपित अंश बताया जा रहा है । यह नहीं बताया जा रहा है वे कौन लोग हैं जिन्होंने इनकी धर्म पुस्तकों में छेड़छाड़ की और ये प्रक्षेपण किया और ये तमाशा देखते रहे । आज उसे प्रक्षेपित अंश बता रहे हैं । पहले इस देश में हिन्दू धर्म नामका कोई धर्म नहीं था । यह ब्राह्मण धर्म के नाम से जाना जाता था । इतिहास की पुस्तकों में तो यही पढ़ाया जाता है । न यह वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता था न सनातन धर्म के नाम से । आज जरूर सनातन और वैदिक धर्म  का नाम लिया जा रहा है । भाजपा आरएसएस इस पूरे इतिहास को बदलना चाहते हैं । वेदों में वर्ण व्यवस्था है । सनातन का भी यही मतलब है । एक सृष्टि के समाप्त होते ही चारों वेद ब्रह्मा के मुंह में समा जाते हैं । और दूसरी सृष्टि के प्रारम्भ के बाद पुनः उसी रूप में ब्रह्मा के मुंह से निकल आते हैं । इसी ब्राह्मण धर्म को सनातन धर्म अर्थात सदा से पूर्ववत धर्म कहा जाता है । आज ये लोग जिस सभ्यता और संस्कृति की ओर देश को ले जाने की बात कह रहे हैं,उसी सभ्यता और संस्कृति का बखान करते हुए राहुल सांकृत्यायन ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है । "भारतीय सभ्यता संस्कृति ने किस तरह हिन्दुओं में से एक तिहाइ को अछूत बनाके छोड़ा । किस तरह जातिभेद को ब्रह्मा के मुख से निकली व्यवस्था पर आधारित कर जातीय एकता को कभी बनने नहीं दिया । किस तरह पाप दूर करने के नाम पर गोबर और गोमुत्र पिलाया । किस तरह पेशाब और पैखाने तक को भक्ष्य बना स्वर्ग सिद्ध करने का रास्ता साफ किया । किस तरह स्त्रियों को उनके प्ररंभिक अधिकारों से भी बंचित कर पुरूषों के पैरों की जूती बनाया । किस तरह यह सब देखते हुए भी मानव को टुक टुक दीदम दम न कसीदम के मोहनी मंत्र में फंसाये रखा "। यह हम नहीं एक ब्राह्मण ही कह रहा है । हमारे पुरूखों और हमने तो इसे  झेला है आज भी झेल रहे हैं । क्रीमीलेयर लगाकर सैकड़ों आईएएस में सेलेक्टेड अभ्यर्थियों को आईएएस बनने से रोक दिया गया । जबकि भारत का पीएम भी ओबीसी है । उसके शासन काल में । यह देखकर अनायास ही हमें शूद्र राजाओं के गुप्त काल की याद आ जा रही है जिसे इतिहासकार स्वर्ण काल कहते हैं और उसी काल में एक बड़ी आबादी को अछूत बनाया जाता है । भाजपा और आरएसएस भारत को इसी संस्कृति की ओर ले जा रहे हैं । एनआरसी और सीएबी के पीछे भाजपा आरएसएस का ऐसा एजेंडा है,मुझे भी नहीं लगता था । पर प्रदीप सिंह का लेख पढ़ने के बाद और उसी तारीख के अंक में विकास सारस्वत का लेख पढ़ने के बाद इसका एहसास हुआ । कितना खतरनाक खेल ये दोनों मिलकर खेल रहे हैं जब हम जैसे लोगों को नहीं पता चल रहा है तो आम जनता को क्या पता ? कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना ।


Friday, 13 December 2019

बाबा साहेब के परिनिर्वाण दिवस पर विशेष लेख

 
डॉ जी सिंह कश्यप पी जी कॉलेज गाजीपुर
   6 दिसम्बर    :बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस! यूं तो आज के खास दिन बाबा साहेब को पूरा देश ही नहीं, जन्मगत कारणों से शोषण-वंचना की शिकार बने पूरे विश्व के लोग ही कमोबेश याद करेंगे : श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे, किन्तु दलितों की बात और होगी. आज उनके हजारों संगठन बाबा साहब के अवदानों को याद करने और अपनी मुक्ति का नया संकल्प लेने के लिए जगह-जगह संगोष्ठियाँ – सभाएं आयोजित करेंगे : मार्च निकालेंगे. लेकिन सबकुछ के बावजूद ऐसा लगता है जिन अधिकारों से बाबा साहेब ने उन्हें लैस किया, उसे भविष्य में वे शायद बरक़रार नहीं रख पायेंगे. ऐसा क्यों और कैसे हो सकता है , इसे जानने के लिए दलित समुदाय के दर्दनाक इतिहास का एक बार सिंहावलोकन जरुरी है.

      ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्रों की भांति ही दलित, जिन्हें भारत में सामाजिक क्रांति के प्रणेता ज्योतिबा फुले अतिशूद्र कहा करते थे एवं संविधान में अनुसूचित जाति के रूप चिन्हित किया गया है, हिंदू-धर्म की प्राणाधार उस वर्ण-व्यवस्था की उपज हैं जो मुख्यतः शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक-शैक्षिक) की वितरण-व्यवस्था रही. वैदिक आर्यों द्वारा प्रवर्तित वर्ण-व्यवस्था में दलितों के लिए अध्ययन-अध्यापन,शासन –प्रशासन, सैन्य वृत्ति, भूस्वामित्व, व्यवसाय-वाणिज्य और आध्यात्मानुशीलन इत्यादि का कोई अधिकार नहीं रहा. यही नहीं हिंदू समाज द्वारा अस्पृश्य रूप में धिक्कृत व बहिष्कृत दलितों को अच्छा नाम रखने या देवालयों में घुसकर ईश्वर की कृपालाभ पाने तक के अधिकार से भी पूरी तरह वंचित रखा गया.  दलितों को शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत कर मानव जाति के समग्र इतिहास  का सबसे अधिकार-विहीन मानव-समुदाय में तब्दील करने वाली वर्ण-व्यवस्था को सर्वप्रथम चुनौती गौतम बुद्ध की तरफ से मिली. उनके प्रयत्नों से वर्ण-व्यवस्था में शिथिलता आई. वर्ण-व्यवस्था में शैथिल्य का मतलब शक्ति के जिन स्रोतों से दलितों को वंचित किया गया था, उनमें उनको अवसर मिलने लगा. किन्तु यह स्थिति चिरस्थाई न बन सकी. अंतिम बौद्ध सम्राट बृहद्रथ की पुष्यमित्र शुंग द्वारा हत्या के बाद के हिन्दुराज में वर्ण-व्यवस्था नए सिरे से सुदृढ़ हो गयी. इसके सुदृढ़ होने के फलस्वरूप दलितों को आगामी दो हज़ार सालों तक शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह बहिष्कृत हो कर रह जाना पड़ा.

शुंगोत्तर काल में  मानवेतर बने दलितों को थोड़ी राहत मध्यकाल में ही मिल पाई. उक्त काल में सवर्णों और शूद्रातिशूद्रों में कई ऐसे संतों का उदय हुआ जिन्होंने अपनी भक्तिमूलक रचनाओं के जरिये जातिभेद का विरोध करने सबल प्रयास किया. इनमें उत्तर भारत में रामानंद, रैदास, कबीर, नानकदेव ;पूरब में चैतन्य और चंडीदास; पश्चिम में चोखामेला, नामदेव, तुकाराम और दक्षिण में निबारका और बसव का नाम प्रमुख है. किन्तु इन संतो के प्रयासों से दलितों को भावनात्मक रूप से राहत भले ही मिली, शक्ति के स्रोतों में कुछ नहीं मिला.बहरहाल जिन दिनों भारत के क्रान्तिकारी कहे जानेवाले संत ईश्वर की नज़रों में सबको एक बताने का उपदेश करने में निमग्न थे, उन्ही दिनों यूरोप के संत मार्टिन लूथर के सौजन्य से वहां वैचारिक क्रांति कि शुरुआत हुई जिसे रेनेसां (पुनर्जागरण) कहते हैं.

परवर्तीकाल में अंग्रेजों के सौजन्य से 19 वीं सदी के में मानव सभ्यता का कलंक बने भारत में भी नवजागरण की शुरुआत हुई. राष्ट्रीयता और सामाजिक परिवर्तन का बीजारोपड़ इसी काल में हुआ, इसी काल में अंग्रेजी पढ़े -लिखे आभिजात्य वर्ग में स्त्री-सुधार के साथ अन्य सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों से जूझने की भावना पैदा हुई.बंगाल के राजा राममोहन से शुरू हुई समाज सुधार की यह धारा पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण दिशाओं में प्रवाहित हुई. राजा राममोहन राय द्वारा प्रारम्भ किये गए समाज सुधार कार्य को केशव चन्द्र सेन, प्रिंस द्वारकानाथ ठाकुर, महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद-विवेकानंद-रामलिंगम, रानाडे, आरजी भंडारकर, जी.जी अगरकर, एनजी चंदावरकर, गोखले-गाँधी इत्यादि जैसे सवर्ण समाज में पैदा हुए महान लोगों ने आगे बढ़ाया. पर, ये लोग बुद्धि, तर्क , सत्य , स्वतंत्रता, समानता जैसे योरोपीय दर्शन अपना कर सती-विधवा- बालिका विवाह- बहुविवाह-प्रथा और अन्य कई सामाजिक बुराइयों के खिलाफ तो अभियान चलाये किन्तु ‘अछूत-प्रथा‘ पर लगभग निर्लिप्त रहे. अस्पृश्यता के खिलाफ सीधा संघर्ष फुले ने ही शुरू किया, उन्होंने जहाँ अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले के साथ मिलकर दलितों को शिक्षित करने का ऐतिहासिक कार्य किया, वहीँ सत्यशोधक समाज के माध्यम से उन्हें अंध-विश्वास से मुक्त करने में महती योगदान दिया. उनके अतिरिक्त शुद्रातिशूद्र समाज में जन्मे नारायण गुरु, अयांकाली, संत गाडगे, सयाजी राव गायकवाड, शाहूजी महाराज, पेरियार जैसे और कई लोगों ने दलितों की दशा में बदलाव लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया. किन्तु उपरोक्त महामानवों के प्रयासों के बावजूद सदियों से सभी मानवीय अधिकारों से शून्य अस्पृश्यों की स्थिति लगभग अपरिवर्तित रही.

ऐसी विषम परिस्थितियों में डॉ आंबेडकर का उदय हुआ. उनके समक्ष दलितों को वर्ण-व्यवस्था के उस अभिशाप से मुक्ति दिलाने की चुनौती थी जिसके तहत वे हजारों साल से शक्ति के सभी स्रोतों से वंचित रहे. कहना न होगा उन्होंने इस चुनौती का नायकोचित अंदाज़ में सामना करते हुए दलितों को शक्ति से लैस करने का असंभव सा कार्य कर दिखाया. उन के ऐतिहासिक प्रयासों का परिणाम है कि आज दलित शक्ति के सभी स्रोतों में तो नहीं पर, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में अपनी कुछ उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराने में सफल हुए हैं. विगत वर्षों में हमने एक दलित को राष्ट्रपति; कुछेक को मुख्यमंत्री और ढेरों  को कबीना मंत्री बनते एवं कईयों को महान चिन्तक - साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित होते देखा गया. हाल के वर्षों में कुछ को बसपा-भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के अध्यक्ष और विश्वविद्यालयों का उप कुलपति भी बनते देखा गया है. इसके अतिरिक्त उन्हीं के विचारों पर चलकर  बसपा के रूप  में दलितों की पहली राष्ट्रीय पार्टी के उदय का हम साक्षी बने.
 जैसा कि शुरुआती पंक्तियों में कहा गया है कि वर्ण-व्यवस्था मुख्यतः शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की व्यवस्था रही और बौद्ध काल को छोड़कर हजारों वर्षों से नर-पशुओं के लिए शिक्षक, पुरोहित, भू-स्वामी, राजा, व्यवसायी इत्यादि बनने के सारे रास्ते पूरी तरह बंद रहे. यदि वर्ण-व्यवस्था के वितरणात्मक चरित्र पर ध्यान दिया जाय तो पता चलेगा भारी प्रतिकूलताओं के मध्य बाबा साहेब शक्ति के स्रोतों में दलितों को जितना शेयर दिला पाए, बात उससे बहुत आगे नहीं बढ़ी. संविधान निर्माण के समय बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर दुनिया के सबसे असहाय स्टेट्समैन रहे. आज की तरह न तो दलितों की कोई राष्ट्रीय पार्टी थी और न हीं इनका आज जैसा कोई बौद्धिक वर्ग ही तैयार हुआ था. जो विशुद्ध हिन्दू अर्थात सवर्ण दलितों के अधिकारों के विरुद्ध सब समय प्रायः शत्रु की भूमिका में अवतरित रहे ,  उन्हीं सवर्णों की उस दौर की चैम्पियन पार्टी के सौजन्य से वह संविधान निर्मात्री सभा के अंग बने. अतः उनके हाथ बंधे थे. अगर ऐसा नहीं होता जिस बाबा साहेब ने अपनी महानतम रचना जाति का उच्छेद में ब्राह्मणशाही के खात्मे के लिए पौरोहित्य के पेशे के प्रजातान्त्रिकरण का सुझाव दिया, पूँजीवाद के साथ ‘ब्राह्मणवाद’ को सबसे बड़ा शत्रु करार देने वाले आंबेडकर क्या पौरोहित्य के पेशे के प्रजातंत्रीकरण का प्रावधान करने में कोई कमी करते? इसी तरह जिस बाबा साहेब ने 1942 में अंग्रेजी सरकार के समक्ष गोपनीय ज्ञापन के जरिये ठेकों में आरक्षण की मांग उठाये थे, क्या वे संविधान में इसकी व्यवस्था करने में कमी करते? सच्ची बात तो यह है कि  जिस बाबा साहेब ने कभी यह कहा था कि यदि दलितों को मुक्ति न दिला सका तो खुद को गोली से उड़ा लूँगा, वह आंबेडकर दलितों को वर्ण-व्यवस्था के अभिशाप से निजात दिलाने के लिए शक्ति के समस्त स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी दिलाने  की समस्त व्यवस्था कर देते, इसमें शायद किसी को संदेह हो. किन्तु न कर सके तो इसलिए कि वह संविधान निर्माण के समय बेहद लाचार व्यक्ति थे. बहरहाल बाबा साहेब की विवशता को ध्यान में रखते हुए उनके अनुसरणकारियों का फर्ज बनता था कि उनके अधूरे काम को पूरा करने के लिए वे शक्ति के समस्त स्रोतों में दलित ही नहीं, वर्ण-व्यवस्था के समस्त वंचितों को शक्ति के स्रोतों में उनकी वाजिब हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई लड़ते. लेकिन वे ऐसा न कर सके.
निर्दश
आंबेडकर उत्तरकाल के इतिहास का सिंहावलोकन करने पर साफ़ विदित होता है कि दलित संगठनों, बुद्धिजीवियों, नेताओं ने अपनी अधिकतम उर्जा धर्मान्तरण ,जाति उन्मूलन, ब्राह्मणवाद विरोध जैसे अमूर्त मुद्दों में लगाया. ऐसा लगता है बाबा साहेब ने उन्हें जितने अधिकार दिलाये थे, उसे ही पर्याप्त मानते हुए  शक्ति के बाकी बंचे स्रोतों में हिस्सेदारी के लिए संघर्ष ही नहीं चलाये. आज इक्कीसवीं सदी में जबकि शासक दलों द्वारा संविधान को लगभग व्यर्थ  और 24 जुलाई , 1991 को गृहित नव उदारवादी अर्थनीति के जरिये आरक्षण को लगभग कागजों की शोभा बना उन्हें गुलामों की स्थिति में पहुंचा दिया गया है : वे आर्थिक मुक्ति के बजाय ज्यादातर भावनात्मक मुद्दों पर उद्वेलित होते हैं. जब कहीं आंबेडकर की किसी मूर्ती को आघात पहुचाया जाता है, जब कोई रामदेव बहुजन महापुरुषों का अनादर करता है; जब कभी रैदास मंदिर तोडा जाता है, दलित सडकों पर उतरने में देर नहीं लगाते . किन्तु जब सरकारी उपक्रमों को बेचा जाता है: हास्पिटल, रेल , हवाई अड्डों को निजी हाथों में देने की हरी झंडी दिखाई जाती है, दलित समुदाय नहीं के बराबर उद्वेलित होता है. इसकी ताजी मिसाल 1 दिसंबर, 2019  को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित रैली है जो निजीक्षेत्र में आरक्षण, न्यायपालिका में आरक्षण दिलाने के साथ केंद्र सरकार के लाभ में चल रहे बड़े-बड़े उपक्रमों के विनिवेश के खिलाफ आयोजित हुई थी, जिसमें दलितों के तमाम संगठनों के स्वतः-स्फूर्त शामिल होने की उम्मीद जताई गयी थी. किन्तु वैसा न हो सका. ले दे कर मुख्यतः उसी संगठन के लोग शामिल हुए थे, जिस संगठन ने इसे आयोजित किया था. 1 दिसंबर, 2019  को रामलीला मैदान में दलित संगठनों और एक्टिविस्टों की सीमित उपस्थिति बताती है कि आंबेडकर के लोग निकट भविष्य में उनके द्वारा प्रदान किये गए तमाम संवैधानिक अधिकारों को खोने जा रहे हैं!

लहरीपुर गाँव लहरीं सिंह कश्यप जी ने बसाया था

लहरीपुर गाँव लहरी सिंह कश्यप जी ने 1968 में बसाया था

लअहारी

Wednesday, 11 December 2019

Demonstration of hybridization technique

Hybridization demonstration 




पिछड़ा वर्ग कौन

पिछड़ा वर्ग की आबादी ८५ % है जिसमे अनुसूचित जाति (Scheduled cast) जिनकी आबादी १५% है , अनुसूचित जान जाति ( Schedule tribes) जिनकी आबादी ७.५ % है तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३४० में वर्णित सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े ( socially and educationally backward class) जिन्हे मंडल कमीशन ने अन्य पिछड़ा वर्ग (other backward class= OBC) कहा जिनकी आबादी ५२. % है और NT,DNT,VJNT जिनकी आबादी १०% है। प्रकार पिछड़ा वर्ग की कुल आबादी ८५% हुई ( SC=15% +ST=7.5% + OBC=52% +NT,DNT,VJNT=10%) Total 85% जो ब्राह्मण साहित्य में शूद्र तथा अतिशूद्र ( अछूत) के नाम से जाना जाता है जो आज भी सामाजिक गैर बराबरी का शिकार है , जिनका शासन प्रसाशन
में प्रतिनिधित्व बहुत ही काम है। उच्च वर्ग के लोग इनके प्रतिनिधित्व को समाप्त करवाने के लिए विभिन्न प्रकार के हथकण्डे अपना रहे है। विभिन्न प्रकार से गुमराह कर रहे है। पिछड़ा वर्ग को जागरूक एवं ज्ञानवान बनाने के लिए हमारा राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चल रहा है जिसका नेतृत्व अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन कर रहा है