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Sunday, 19 April 2020

सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य स्थापित करना ही बाबा साहेब का अधूरा मिशन है

डॉ जी सिंह कश्यप ,एसोसिएट प्रोफेसर पी जी कॉलेज गजीउर
लोग हर वर्ष बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर जी की जयंती मनाते है  इस वर्ष 2020 में 129  वी जयंती मनाई जा रही है  जयंती मनाने में कोई रोक नही है मगर उनके मिशन को जानना और समझना परम आवश्यक है ।बाबा साहब ने बौद्ध धम्म की दीक्षा लेने से पहले सभी धर्मों का सम्यक अध्ययन किया । जिस तरह बुद्ध ने अपने संदेश देने से पहले उन सभी मार्गों का परीक्षण किया जिन मार्गों पर चल कर ऋषियों मुनियों ने उस परम ब्रह्म का, जिसने वर्ण व्यवस्था बनाया था का,आमने सामने साक्षात्कार किया था । परन्तु बुद्ध को वह परम ब्रह्म नहीं मिले । उसी तरह बाबा साहब भी सम्यक अध्ययन के बाद ही इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि बुद्ध का धम्म मेरे लिये और मेरे समाज के लिये ही नहीं पूरी मानवता के लिये श्रेष्ठकर है । क्योंकि यह तर्क पर प्रतिबंध नहीं लगाता । बल्कि प्रग्यां और करूणा की बात करता है । बाबा साहब ने बुद्ध धम्म की दीक्षा लेने से पहले बुद्ध और उनका धम्म पुस्तक लिखा । जो अपने आप में एक खोजपरक पुस्तक है । उसमें उन्होंने बुद्ध धम्म की पुरानी मान्यताओं पर  ढेर सारे सवाल खड़े किये और उनके जबाब दिये और लोगों को भी सवाल खड़े करने के लिये और उनके जबाब ढूढ़ने के लिये प्रेरित किये । बाबा साहब की आखिरी चार पुस्तकों में पहली-बुद्ध एवं उनका धम्म,दूसरी- बुद्ध और कार्ल मार्क्स,तीसरी-क्रांति और प्रतक्राति,चौथी रिडल्स आफ हिन्दुइज्म हैं । तीसरी और चौथी अपनेे जीवन काल में प्रकाशित न करा सके । ये सभी एक दूसरे की पूरक या यों कहें कि एक दूसरे को समझने के लिये आवश्यक हैं ।  जैसे बुद्ध और उनका धम्म ठिक से समझना हो तो बुद्ध और कार्ल मार्क्स को पढ़ना जरूरी है । अन्यथा ग्यान अधूरा ही रहेगा । जैसे एक मित्र ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाला जिसमें दुख को विवाद बताया । यानी विवाद ही दुख है । अर्थात दो व्यक्ति या वर्ग के बीच विवाद ही दुख है । यदि विवाद ही दुख है तो विवाद मत करो । दुख नहीं होगा । कोई दूसरे वर्ण या जाति का पेशा न करे । भगवान ने जिस जाति वर्ण को जो काम आवंटित किया है । उसे करे । जो जिस जाति वर्ण में है, वहीं रहे । तो कोई विवाद नहीं होगा । इसी को समरसता कहा गया है । उच्च वर्ग इसी समरसता की बात करता है ।  बुद्ध ने दुख किसे कहा ? बुद्ध और कार्ल मार्क्स में बाबा साहब बताते हैं, कि संसार में दुख स्वार्थों के टकराव के कारण होता है । इसका निदान अस्टांगिक मार्ग का अनुसरण है और  संपत्ति के नीजी स्वमित्व से अधिकार और शक्ति एक वर्ग के हाथ में आ जाता है और दूसरा वर्ग दुख भोगता है । इस दुख का निदान उसके कारणों का निवारण करके किया जा सकता है ।" बुद्ध और बाबा साहब का पूरा मिशन भी इसी के इर्द गिर्द घूमता है कि सबको सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य मिले तो किसी को कोई दुख नहीं मिलेगा । संविधान की उद्देशिका भी यही कहती है । पर आज काम बुद्ध, बाबा साहब और संविधान की मूल भावनाओं के ठीक उल्टा हो रहा है । संविधान कहता है आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले कि अमीरी गरीबी की खाई पटे तो,काम इस खाई को और चौड़ी से चौड़ी करने का हो रहा है । बाबा साहब कहते हैं कि हमारे लोग सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य स्थापित करने के लिये सच्चा समाजवाद लायेंगे तो उनके लोग पूंजीवाद लाने का काम कर रहे हैं । समाजवाद की कोई बात ही नहीं कर रहा है । उसी तरह बुद्ध ने कहा की दरिद्रता दुख है । अकुशल कर्म दुख हैं तो उनके लोग कहते हैं- जन्म लेना और मरना दुख है । राग द्वेश और मोह दुख है । इसके लिये रात दिन विपश्यना में लगे हुये हैं । ताकि दूसरा जन्म न लेना पड़े और दुख भोगना पड़े । बुद्ध कहते हैं निर्दोष जीवन का दूसरा नाम निर्वाण है । निर्वाण अष्टांगिक मार्ग के अतिरिक्त कुछ नहीं तो उनके लोग जन्म मरण से मुक्ति को निर्वाण मानते हैं । अष्टांगिक मार्ग को मध्यम मार्ग मानते हैं । सम्यक दृष्टि में क्या माध्यम मार्ग ? बुद्ध ने सारनाथ में पांचों शिष्यों के प्रश्नों के उत्तर में मध्यम मार्ग पर चलने की बात कहा था जिसमें उन लोगों ने पूछा था कि क्या आपने तपस्या का मार्ग त्याग दिया है ? तब उन्होंने कहा कि जीवन को जिंदा रखने के लिये  जीवन की आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति भी मानव की एक जिम्मेदारी है । इसलिये उन्होंने कहा, न शरीर को अधिक सताओ न उसे विलासिता में रखो । मध्यम मार्ग पर चलो । यानी बीच का मार्ग अपनाओ । न अधिक सताओ न अधिक विलासिता में रखो । इसलिये बुद्ध और बाबा साहब को ठीक से समझना और लोगों को ठीक से समझाना भी बाबा साहब के लोगों की एक जिम्मेदारी है । तर्क वितर्क भी जरूरी है । यदि किसी को कहीं एतराज हो तो जरूर अपने कमेंट में लिखें । इसी के साथ बाबा साहब के इस 129 वें जयंती पर उन्हें शत शत नमन ।

Monday, 2 March 2020

कांशीराम महोत्सव भदौरा 23 फरवरी 2020


ऐसा लग रहा है इस देश मे लोक तंत्र लेशमात्र ही बचा है

डॉ जी सिंह कश्यप 
ऐसा लग  रहा है इस देश में लोकतंत्र अब केवल कहने मात्र के लिये रह गया  है । असल में केवल ब्राह्मण तंत्र ही रह गया है जो पहले भी था । मुगलिया सल्तनत में कानून की दो किताबें थी । एक कुरान और दूसरी मनुस्मृति । मुस्लिमों को न्याय कुरान के अनुसार और गैरमुस्लिमों यानी हिन्दुओं को न्याय मनुस्मृति के अनुसार दिया जाता था । मुस्लिमों का प्रधान न्यायाधीश काजी और हिन्दुओं का प्रधान न्यायाधीश ब्राह्मण होता था । वादशाह सर्वोच्च न्यायाधीश था । यदि 1857 की क्रांति सफल हो गयी होती और अंग्रेज भारत छोड़ दिये होते तो आज भी वही कानून और न्यायतंत्र लागू  रहता । हम जहां जिस स्थिति में तब थे उसी स्थिति में आज भी होते । अच्छा हुआ जो वैसा नहीं हुआ । भारत 1947 में आजाद हुआ और देश में नया संविधान लागू हुआ जिसके शिल्पी डा. भीमराव अंबेडकर थे । हालांकि यह संविधान उनके मन माफिक नहीं है फिर भी कामचलाऊ बना । यदि ईमानदारी से इसका पालन किया जाता । यदि ईमानदारी से पालन न किया जाय तो यह सिर्फ दिखाने मात्र के लिये हाथी का दिखाने वाला दांत है । इसके लिये भी हम ही जिम्मेदार हैं । भारत का संविधान इस तरह का है कि कोई भी संवैधानिक संस्था  निरंकुश या तानाशाह नहीं हो सकती । संविधान ने सबकी अपनी अपनी सीमाएं बांध रखी है । कोई भी अपनी सीमा लांघ नहीं सकता यदि भारत के संविधान का पालन करता है तो । नहीं करता है तो उसके लिये कोई सीमा नहीं । कोई कानून नहीं । भारत में लोकतंत्र है । इसलिये जनता सर्वोच्च है । इसके बाद संसद सर्वोच्च है । जब देश आजाद हुआ तो संविधान बनाने का काम भारत के सुप्रीम कोर्ट को नहीं दिया गया । जबकि सुप्रीम कोर्ट मौजूद था । संविधान बनाने का काम जनता के चुने हुये प्रतिनिधियों को दिया गया । संविधान में अगर कोई संशोधन भी हो तो इसका अधिकार भी जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को ही दिया गया । परंतु सुप्रीम कोर्ट को नहीं दिया गया । सुप्रीम कोर्ट को क्यों नहीं दिया गया ? क्योंकि भारत में लोकतंत्र है अर्थात जनता का राज,जनता के द्वारा,जनता के लिये । संविधान में जब न्यायाधीशों की नियुक्ति की बात आई कि कौन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति करेगा ? तो इसके लिये संविधान में अनुच्छेद 124 लाया गया और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये अनु. 217 लाया गया । ब्रिटिश हुकूमत में उच्च और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रांत के गवर्नरों के रिकमंडेशन से गवर्नर जनरल करते थे । जब देश आजाद हुआ तो 4 नवंबर 1947 को गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने भारत के चीफ जस्टिस की सहमति से प्रक्रिया के संशोधन का ग्यापन जारी किया । जिसमें गवर्नर और गवर्नर जनरल सब संवैधानिक प्रधान हो गये और प्रांतों में उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये रिकमंडेशन का अधिकार प्रांतों के मुख्यमंत्रियों को और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये केन्द्र में रिकमंडेशन का अधिकार केन्द्रीय मंत्री परिषद को सौंपा गया । उस समय सभी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने त्याग पत्र दे दिया था । यह कहते हुये कि इससे न्यायपालिका का राजनीतिकरण होगा । इनका कहना था कि उच्च और उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति में उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश की सहमति अनिवार्य होनी चाहिए । संविधान सभा ने इस तरह के सभी आरोपों एवं अनुरोधों को खारिज कर दिया था । सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये अनु. 124(2) और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये 217(2) का प्रावधान किया गया । इसमें कंसल्टेशन की जगह कंसेंट रखने के लिये बी पोखम्मा ने दो संशोधन लाये । संविधान सभा ने दोनों संशोधनों को खारिज कर दिया । अब जब दोनों संशोधनों को संविधान सभा ने खारिज कर दिया तो सुप्रीम कोर्ट कैसे उन संशोधनों को पुनः संविधान में स्थापित कर सकता है ? जबकि संविधान संशोधन का अधिकार संसद ने सुप्रीम कोर्ट को नहीं दिया है । सुप्रीम कोर्ट ने अनु. 124(2) और 217(1) दोनों को निरस्त कर कोलेजियम सिस्टम लागू किया है । जो पूरी तरह असंवैधानिक है । सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यों किया ? इसलिये कि यदि प्रांतों और केन्द्र में एससी एसटी और ओबीसी के लोगों की सरकारें बन जायेंगी तो ये सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में एससी एसटी तथा ओबीसी के न्यायाधीशों की नियुक्ति कर देंगे और इस तरह से न्यायपालिका मेंब्राह्मणों का वर्चस्व समाप्त हो जायेगा ।
 इस तरह आज जनता का शासन जनता के द्वारा जनता के लिये नहीं है बल्कि ब्राह्मणों का शासन  ब्राह्मणों के द्वारा ब्राह्मणों के लिये हो गया है । आखिर क्या कारण है कि सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में एससी एसटी ओबीसी के न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं हो रही है ? आरक्षण की मनमानी व्याख्या हो रही है ? संविधान के अनु. 335 में एससी एसटी के लिये नौकरियों में आरक्षण तथा अनु.340 में एसइबीसी (ओबीसी) के लिये नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था है । इस आरक्षण को मौलिक अधिकार वाले अनु. 15 और अनु. 16 रोक न दें इसलिये इन क्लाजों में उपक्लाज 15(4) 1951में और उपक्लाज 16(4) संविधान बनाते समय ही जोड़ा गया था । आरक्षण के  इन प्रावधानों को मौलिक अधिकार के साथ जोड़ने से ये दोनों अधिकार अब मौलिक अधिकार बन शगये हैं । अनु. 16(4) क्या कहता है ? Nothing in this article shall prevent the state for making any provision for the reservation of appointment and post for any backward class of citizens for which in the openion of state is not adequately represented in services under state. अब इसमें स्टेट के अंतर्गत संविधान के अनु.12 के अनुसार केंद्र भी आता है । अब सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है और राज्यों की राय पर है । चाहे वे जारी रखें या न रखें । सुप्रीम कोर्ट ने 1950 में शिक्षा में आरक्षण को लेकर तमिलनाडु सरकार के शासनादेश के खिलाफ एक वाद में जो चंपकम दोराइराजन के नाम से जाना जाता है,एससी एसटी ओबीसी के शिक्षा में आरक्षण के खिलाफ फैसला दे दिया जिसके कारण पहला संविधान संशोधन 1951 में कर अनु.15 में (4) जोड़ा गया । कर्नाटक सरकार के शासनादेश के खिलाफ एक वाद में जो बालाजी के वाद के नाम से जाना जाता है आरक्षण के खिलाफ फैसला देकर 50% का बार लगा दिया । आरक्षणकी गलत व्याख्या कर  हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति मे आरक्षण लागू नहीं होने दिया । मिनर्वामिल्स बनाम भारत संघ के वाद में संसद की कानून बनाने की शक्ति पर ही रोक लगा दिया । अब संसद  वही कानून बना सकती है जिसे सुप्रीम कोर्ट चाहेगा । अगर sc,st,obc के हित में कानून बना तो सुप्रीम कोर्ट उस कानून को ही रद्द कर देगा । इसीलिये उसने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में एक भी न्यायाधीश नियुक्त नहीं होने दिया । अगर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में एससी एसटी ओबीसी के न्यायाधीश होते तो निश्चित ही इस तरह के आरक्षण विरोधी फैसले न होते । सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है,यह कहकर पूरे आरक्षण को समाप्त करने के लिये हरी झंडी दे दिया है । अब राज्य सरकारें आरक्षण जारी रखती हैं कि नहीं रखती हैं । उनपर निर्भर है । एससी एसटी ओबीसी खुद अपना आरक्षण खत्म कराना चाहता है तो इसका क्या इलाज है ? कोई माया के पीछे है । कोई अखिलेश के पीछे है । कौई नीतीश कोई ,कोई लालू ,कोई पासवान कोई अठावले,कोई ठाकरे के पीछे है और इस तरह ये सारे आरक्षण विरोधियों के पीछे हैं । हमें तो ऐसी सरकार बनानी चाहिए जो आरक्षण विरोधियों के पिछे चलने वाली न हो । कैसे बनेगी ? इस समाज का प्रबुद्ध वर्ग विचार करे । सरकार जो भी बने वह वह पिछड़े समाज के नियंत्रण में चले। ऐसा प्रबुद्ध वर्ग तैयार करना हमारा कर्तव्य है । क्योंकि पिछड़े समाज का देश में प्रचंड बहुमत है और वही पिछड़ा हुआ है । जब पिछड़ा समाज आगे बढ़ेगा तभी देश आगे बढ़ेगा अन्यथा देश भी पिछड़ा ही रह जायेगा ।
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Friday, 28 February 2020

बाबा साहेब का मिशन

डॉ जी सिंह कश्यप , एसोसिएट प्रोफेसर ,
पी जी कॉलेज गाजीपुर
बाबा तेरा मिशन अधूरा हम करेंगे पूरा कहने मात्र से काम नही चल सकता उसे जानना भी जरूरी होगा समझना भी होगा
बाबा साहब का मिशन वही है जो बुद्ध का मिशन है । 25 नवंबर 1949 को बाबा साहब ने अपने भाषण में कहा था । हमने राजनीति के क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य का लक्ष्य तो पा लिया है पर सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य का लक्ष्य पाना बाकी है । जो बाकी रह गया है वही बाबा साहब का मिशन है । तो जब यही बाबा साहब का मिशन है तो सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य का लक्ष्य हासिल कैसे  होगा ? उन्हें जब भारत का संविधान बनाने का मौका मिला तो क्यों नहीं उन्होंने ऐसे कानून बनाये जिससे न कोई लैंड लार्ड हो न कोई लैंड लेस हो न कोई टेनेंट हो । मित्रो, बाबा साहब ने संविधान जरूर बनाये पर उन्हें अपनी मन मरजी से सब बनाने की छूट नहीं थी । बहुत कुछ अपनी इच्छा के विरूद्ध भी संविधान में व्यवस्था बनाना पड़ा । इसी लिये 1951 में मनमाड की एक सभा में शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था । हमारे लोग सच्चा समाजवाद लायेंगे । आज जो अंबेडकरवादी हैं क्या किसी के मुंह से कभी ऐसा कोई नारा सुना है कि जमीन ऊद्योग का राष्ट्रीयकरण करो ? उनको पता ही नहीं कि बाबा साहब ने कभी ऐसा कहा भी होगा । बस वे इतना ही जानते हैं कि हमें बाबा साहब के विचारों को लागू कराना है । बुद्ध के विचारों को लागू कराना है । जय भीम और नमो बुद्धाय । बाबा साहब और बुद्ध के क्या विचार हैं पता नहीं । सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य तभी लागू हो सकता है जब अर्थव्यवस्था समाजवादी हो और समाजवाद की ऐसी परिभाषा संविधान में परिभाषित हो । एक गांधीजी का भी समाजवाद है जिसे संविधान सभा में गांधीवादी लाना चाहते थे । उसके लिये हाय तौबा मचाये थे । वह समाजवाद क्या है ? वह समाजवाद है वर्ण व्यवस्था । गांधीजी का आदर्श समाजवाद वर्ण व्यवस्था पर आधारित था जो गीता में है । हर वर्ण हर जाति अपने जातिगत पेशे करे । इस तरह देश में हर व्यक्ति को काम और उसका दाम मिलता रहेगा और सब सुखी रहेंगे । समाज में समरसता बनी रहेगी । अटल बिहारी वाजपेयी ने जब उन्हें भारत रत्न का सम्मान मिला तब भारत के संविधान में जो समाजवादी शब्द है उसकी परिभाषा करते हुए कहा था,"समाजवाद एक अधूरा शब्द है । जब गांधीवाद से मिला तब जाकर पूर्ण हुआ "। तो बाबा साहब के समाजवाद और गांधीजी के समाजवाद में जमीन आसमान का अंतर है । जहां तक साम्यवाद की बात है तो भारत के कम्युनिस्टों का तो संविधान सभा में कहीं अता पता भी नहीं लगता । जो समाजवादी थे वे गांधीजी के समाजवाद के समाजवादी थे । समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण और लोहिया का भी संविधान सभा में कहीं अता पता नहीं लगता । कोई भेजता तो जाते । न किसी ने भेजा न जाने का ये प्रयास किये । बाबा साहब का भी संविधान सभा में अतापता नहीं लगता यदि वो इन्हीं समाजवादियों और कम्यूनिस्टों की तरह चुपचाप बैठे रहते । पर बाबा साहब सारे बंद  खिड़की दरवाजे रोशनदान तोड़वाकर घुसे । जब घूसे तो संविधान का सारा भार इन्हीं पर डाल दिया गया पर हाथ बांध दिये गये । बाबा साहब भी जरूरत भर काम कर लेना चाहते थे और आधार बना देना चाहते थे जिसपर खड़े होकर भारत की प्रजा अपना हक अधिकार  ले सके और आधार बना भी दिया । हम न ले सकें तो बाबा साहब क्या कर सकते हैं । जितना बन सकता था किया ।  बाबा साहब बिना परिभाषित किये समाजवाद संविधान में रखते भी तो उसका क्या अर्थ लगाया जाता ? समझ सकते हैं । अंबेडकरवादियों को बस एक काम करना है । ओबीसी को बताना है कि उनके हितैषी कैसे अंबेडकर हैं और कैसे गांधी जी नहीं हैं । क्योंकि उच्चवर्ग ने ओबीसी के दिमाग में अंबेडकर के खिलाफ जहर भर दिया है कि अंबेडकर ने जो कुछ भी किया है अछूतों के लिये किया है । तुम्हारे लिये कुछ नहीं किया है । ताकि ओबीसी अंबेडकर के पंजरे न जा पाये । न  जायेगा न जान पायेगा कि अंबेडकर ने उनके लिये क्या किया है । एससी भी उन्हें समझाने का प्रयास नहीं करता । ओबीसी गांधीजी को अपना रहनुमा मानता है । अगर गांधीजी का और कांग्रेस का बस चलता तो वयस्क मताधिकार का स्वरूप क्या होता ? संविधान सभा में कामथ ने बताया था । कामथ ने बताया कि गांधीजी ने अमेरिकी लेखक लुई फिशर से कहा था । अभी सत्तर लाख गांव हैं तो सत्तर लाख वोट होंगे । प्रत्येक गांव का एक वोट होगा । गांव में प्रत्येक व्यक्ति अपने वयस्क मताधिकार से गांव का मुखिया चुनेगा । जैसे एक गांव की आबादी दो हजार है तो गांव के लोग मुखिया को चुनेंगे । उसके बाद उनका काम समाप्त । गांव का मुखिया जिला मुखिया चुनेगा । जिला का मुखिया प्रदेश का मुखिया चुनेगा । प्रदेश का मुखिया देश का मुखिया चुनेगा । वोट की ऐसी प्रणाली रहती तो उस समय तो जमीदारी प्रथा थी । कोई साधारण आदमी चुनाव जीत पाता ? जीतना तो दूर खड़ा भी नहीं हो पाता । हम आज भी उसी अवस्था में होते जिस अवस्था में तब थे । आज भी  गाय भैंस बकरी ही चराना पड़ता । याद है ? एकबार जब राम नरेश यादव सीएम बने थे तो क्या नारा लगाया था । राम नरेश वापस जाओ । लाठी लेकर भैंस चराओ । बिहार में कर्पूरी ठाकुर के लिये भी ऐसा ही कुछ नारा दिया था । कर्पूरी कर्पूरा वर्ना .....। 2017 की बात है अखिलेश जब सीएम आवास छोड़े तो उस आवास को गंगाजल से धोकर सुद्ध किया गया । आज आपकी ये दशा है जब आप सीएम रह चुके हैं । इनके पिता धरती पुत्र मुलायम सिंह धरती में ही रहते यदि डा. अंबेडकर संविधान सभा में न जाते । मुलायम डा. अंबेडकर को कहते हैं वह तो सिर्फ एक क्लर्क थे । यही मुलायम सिंह हैं जब गाजीपुर में चंद्रशेखर की मूर्ति का अनावरण किये तो उस मूर्ति को गंगाजल से धोकर शुद्ध किया गया । अंबेडकर के संविधान सभा में जाने से अब हम अपने मन माफिक सरकार बना सकते हैं तो उस पर दबाव भी बना सकते हैं कि ऐसा करो । वैसा करो । केजरीवाल ने दिल्ली की जनता की सेवा की तो जनता ने भी भरपूर उसको इनाम दिया । भाजपा के लोग हिन्दू मुस्लिम,भारत पाकिस्तान कहते रह गये और कहते कहते ठंडे हो गये । जनता को बता दें कि यदि जमीन उद्योग का राष्ट्रीयकरण हो जायेगा तो अमीर गरीब की खाई पट जायेगी । सब बराबर हो जायेंगे । देश के लिये काम करेंगे । मगर सवाल तो यह है कि कौन जमीन के राष्ट्रीयकरण की बात करे ? जिसे कहना चाहिए वह अमीर हो गया । तो अमीर तो जमीन के राष्ट्रीयकरण की बात तो करेगा नहीं । वही हाल अब इन अंबेडकरवादियों का हो गया है । जो अंबेडकरवादी अमीर हो गये हैं वो केवल जयभीम और नमोबुद्धाय कहकर अपने को पक्के अंबेडकरवादी का प्रमाण दे रहे हैं ।  कुछ बाबा साहब का जन्मदिन मनाकर और कुछ बाबा साहब का अपने टेबल पर फोटो रखकर अपने को पक्का अंबेडकरवादी होने का प्रमाण दे रहे हैं । पक्के अंबेडकरवादी हो तो जय भीम नमोबुद्धाय बोलो साथ में यह भी बोलो । जमीन उद्योग का राष्ट्रीयकरण करो और तब आरक्षण समाप्त करो । ताकि न कोई पूजीपति हो न कोई गरीब हो । न कोई लैंडलार्ड हो न कोई भूमहीन हो । तब देखो सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य लागू हो जाता है कि नहीं । तब बुद्ध और बाबा साहब दोनों का सपना साकार हो जायेगा ।

Friday, 3 January 2020

सावित्रीबाई फुले:भारत की प्रथम अध्यापिका और प्रिंसिपल डॉ जी सिंह कश्यप


आज देश की पहली महिला अध्यापिका व नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेत्री सावित्रीबाई फुले का जन्म दिन है.इसे लेकर विगत एक सप्ताह से सोशल मीडिया में उस बहुजन समाज के जागरूक लोगों के मध्य भारी उन्माद है जो उन्हें अब राष्ट्रमाता के ख़िताब से नवाज रहा है.सोशल मीडिया से पता चलता है कि आज के दिन देश के कोने-कोने में भारी उत्साह के साथ बहुजनों की राष्ट्रमाता की जयंती मनाई जाएगी.इसके लिए निश्चय ही हमें मान्यवर कांशीराम का शुक्रगुजार होना चाहिए जिन्होंने इतिहास की कब्र में दफ़न किये गए बहुजन नायक/नायिकाओं के व्यक्तित्व और कृतित्व को सामने ला कर समाज परिवर्तनकामी लोगों को प्रेरणा का सामान मुहैया कराया,जिनमें सावित्रीबाई फुले भी एक हैं, जिन्होंने अपने पति ज्योतिबा फुले के सहयोग से देश में महिला शिक्षा की नींव रखी। 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के नायगांव नमक छोटे से गांव में जन्मीं व 10 मार्च 1897 को पुणे में परिनिवृत हुईं सावित्रीबाई फुले ने उन्नीसवीं सदी में महिला शिक्षा की शुरुआत के रूप में घोर ब्राह्मणवाद के वर्चस्व को सीधी चुनौती देने का काम किया था। उन्नीसवीं सदी में यह काम उन्होंने तब किया जब छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह, तथा विधवा-विवाह व शुद्रतिशुद्रों व महिलाओं की शिक्षा निषेध जैसी सामाजिक बुराइयां किसी प्रदेश विशेष में ही सीमित न होकर संपूर्ण भारत में फैली हुई थीं। महाराष्ट्र के महान समाज सुधारक, विधवा पुनर्विवाह आंदोलन के तथा स्त्री शिक्षा समानता के अगुआ महात्मा ज्योतिबा फुले की धर्मपत्नी सावित्रीबाई ने अपने पति के सामाजिक कार्यों में न केवल हाथ बंटाया बल्कि अनेक बार उनका मार्ग-दर्शन भी किया।

दरअसल अशिक्षा को दलित,पिछड़ों और महिलाओं की गुलामी के प्रधान कारण के रूप में उपलब्धि करनेवाले जोतोराव फुले ने वंचितों में शिक्षा प्रसार एवं शिक्षा को ‘ऊपर’ से ‘नीचे’के विपरीत नीचे से ऊपर ले जाने की जो परिकल्पना की उसी क्रम में भारत की पहली अध्यापिका का उदय हुआ.स्मरण रहे अंग्रेजों अपनी सार्वजनीन शिक्षा नीति के शुद्रतिशूद्रों के लिए भी शिक्षा के दरवाजे जरुर मुक्त किये ,पर उसमे एक दोष था जिसके लिए जिम्मेवार लार्ड मैकाले जैसे शिक्षा-मसीहा भी रहे .मैकाले ने ने जो शिक्षा सम्बन्धी अपना ऐतिहासिक सिद्धांत प्रस्तुत किया था उसमे व्यवस्था यह थी कि शिक्षा पहले समाज के उच्च वर्ग को दी जानी चाहिए .समाज के उच्च वर्ग को शिक्षा मिलने के पश्चात्,वहां से झरते हुए निम्न वर्ग की ओर जाएगी.निम्न वर्ग को शिक्षा देने की आवश्यकता नहीं..समाज के उच्च वर्ग को शिक्षा देने के पश्चात् अपने आप शिक्षा का प्रसार निम्न वर्ग की ओर हो जायेगा.पहाड़ से नीचे की ओर आते पानी की तरह शिक्षा का प्रसार होगा.’फुले ने ऊपर से नीचे की शिक्षा के इस सिद्धांत को ख़ारिज करते हुए शिक्षा प्रसार का अभियान अपने घर ही शुरू किया .

पहले प्रयास के रूप में महात्मा फुले ने अपने खेत में आम के वृक्ष के नीचे विद्यालय शुरु किया। यही स्त्री शिक्षा की सबसे पहली प्रयोगशाला भी थी, जिसमें उनके दूर के रिश्ते की विधवा बुआ सगुणाबाई क्षीरसागर व सावित्रीबाई विद्यार्थी थीं। उन्होंने खेत की मिटटी में टहनियों की कलम बनाकर शिक्षा लेना प्रारंभ किया।दोनों ने मराठी उत्तम ज्ञान प्राप्त कर लिया .उन दिनों पुणे में मिशेल नामक एक ब्रिटिश मिशनरी महिला नार्मल स्कुल चलती थीं. जोतीराव ने वहीं सावित्रीबाई और सगुणा को तीसरी कक्षा में दाखिल करवा दिया जहाँ से दोनों ने अध्यापन कार्य का भी प्रशिक्षण लिया.फिर तो शुरू हुआ हिन्दू-धर्म-संस्कृति के खिलाफ अभूतपूर्व विद्रोह.
जिस हिन्दू धर्म –संस्कृति का गौरव गान कर हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया चलाई जा रही है उसका एक अन्यतम वैशिष्ट्य ज्ञान-संकोचन रहा है ,जिसका शिकार शुद्रातिशूद्र और नारी बने.इन्हें ज्ञान क्षेत्र से इसलिए दूर रखा गया था की ज्ञान हासिल करने के बाद ये दैविक-दासत्व (डिवाइन-स्लेवरी) से मुक्त हो जाते .और डिवाइन-स्लेवरी से मुक्त होने का मतलब उन मुट्ठी भर शोषकों के चंगुल से मुक्ति होना था जिन्होंने धार्मिक शिक्षा के जरिये सदियों से शक्ति के तमाम स्रोतों (आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक) पर एकाधिकार कायम कर रखा था.जोतीराव इस एकाधिकार को तोडना चाहते थे इसलिए उन्होंने 1 जनवरी,1848 को पुणे में एक बालिका विद्यालय की स्थापना की,जो बौद्धोत्तर भारत में किसी भारतीय द्वारा स्थापित पहला विद्यालय था .सावित्रीबाई फुले इसी विद्यालय में शिक्षिका बन कर आधुनिक भारत की पहली अध्यापिका बनने का गौरव हासिल किया.इस विद्यालय की सफलता से उत्साहित हो कर फुले दंपत्ति ने 15 मई ,1848 को पुणे की अछूत बस्ती में अस्पृश्य लडके-लड़कियों के लिए भारत के इतिहास में पहली बार विद्यालय की स्थापना की.थोड़े ही अन्तराल में इन्होने पुणे उसके निकटवर्ती गाँव में 18 स्कूल स्थापित कर दिए.चूंकि शिक्षा के एकाधिकारी ब्राह्मणोंने शुद्रतिशूद्रों और महिलाओं शिक्षा ग्रहण व दान धर्मविरोधी आचरण घोषित कर रखा था इसलिए इस शिक्षा रूपी धर्मविरोधी कार्य से फुले दंपति को दूर करने के लिए धर्म के ठेकेदारों ने जोरदार अभियान शुरू किया.
जब सावित्रीबाई फुले स्कूल के लिए निकलतीं ,वे लोग उनपर गोबर-पत्थर फेंकते और भद्दी-भद्दी गालियाँ देते.लेकिन लम्बे समय तक यह कार्य करके भी जब वे सफल नहीं हुए तो शिकायत फुले के के पिता तक पहुंचाए.पुणे के धर्माधिकारियों का विरोध इतना प्रबल था कि उनके पिता को कहना पड़ा ,या तो अपना स्कूल चलाओ या मेरा घर छोडो.फुले दंपति ने गृह-निष्कासन वरण किया.इस निराश्रित दंपति को पनाह दिया उस्मान उस्मान शेख ने.फुले ने अपने कारवां में शेष साहब की पत्नी बीबी फातिमा शेख को भी शामिल कर अध्यापन का प्रशिक्षण दिलाया.फिर अछूतों के एक स्कूल में अध्यापन का दायित्व सौंप कर फातिमा शेख को उन्नीसवीं सदी की पहली मुस्लिम शिक्षिका बनने का अवसर मुहैया कराया.

भारत में जोतीराव तथा सावि़त्री बाई ने शुद्र एवं स्त्री शिक्षा का आंरभ करके नये युग की नींव रखी। इसलिये ये दोनों युगपुरुष और युगस्त्री का गौरव पाने के अधिकारी हुये । दोनों ने मिलकर 24 सितम्बर ,1873 को ‘सत्यशोधक समाज‘ की स्थापना की. उनकी बनाई हुई संस्था ‘सत्यशोधक समाज‘ ने शुद्रातिशूद्रों और महिलाओं में शिक्षा प्रसार सहित समाज सुधार के अन्य कामों में ऐतिहासिक योगदान किया.सत्यशोधक समाज की ‘तीसरे वार्षिक समारोह ‘की रपट 24 सितम्बर ,1876 को पेश की गयी जिसमे कहा गया था-‘शुद्रातिशूद्रों में शिक्षा के प्रति रूचि नहीं है.उनमे शिक्षा के प्रति रूचि होनी चाहिए.उनके बच्चे बुरे बच्चों की संगत में पड़कर रास्तों पर तमाशा आदि देखने और खेलने में में अपना समय गंवाते हैं.उन्हें इस तरह की बुरी आदत से न लगे और वे प्रत्येक दिन समय पर पाठशाला में जांय तथा उनको समय पर घर वापस लाने के लिए सत्यशोधक समाज ने एक पट्टेवाला पांच रूपये प्रतिमाह पर 11 जनवरी से 11 मई तक रखा.

शूद्रों के जो बच्चे इंजीनियरिंग कालेज में जाते थे ,उनमें गरीब बच्चों को मुफ्त प्रवेश मिले ,इसके लिए वहां के प्रिंसिपल के समक्ष समाज की ओर से निवेदन प्रस्तुत किया गया था .परिणामस्वरूप कॉलेज के प्रिंसिपल साहब ने दो-तीन बच्चों को नि:शुल्क प्रवेश दिया था.जो गरीब मा-बाप अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते थे ,उनके लिए प्रतिमाह पांच रूपये सत्यशोधक समाज ने खर्च करने का प्रस्ताव पास किया था. देहात के बच्चों को भी शिक्षा मिलनी चाहिए,इसके लिए समाज की ओर से पाठशालाओं की स्थापना की गयी.’
महात्मा जोतीराव फुले की मृत्यु सन् 1890 में हुई। तब सावित्रीबाई ने सत्यशोधक समाज के जरिये उनके अधूरे कार्यों को आगे बढाया । सावित्रीबाई की मृत्यु 10 मार्च 1897 को प्लेग के मरीजों की देखभाल करने के दौरान हुयी।उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से धन्य बहुजन भारत उन्हें अब राष्ट्रमाता के रूप में याद करता है.