भारतीय समाज व्यवस्था क्रमिक असमानता पर आधारित है जिसमे समाज को चार वर्णों क्रमश :ब्रह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र में बांटा गया है ,जिसमे ऊपर के तीन वर्ण अधिकार संपन्न है तथा शूद्र वर्ण अधिकार वंचित है .बाद में ब्राह्मणों ने ब्रह्मण वर्ण को ब्रह्मण जाति में ,क्षत्रिय वर्ण को क्षत्रिय जाति में ,वैश्य वर्ण को वैश्य जाति में बदल दिया .मगर शुद्र वर्ण को शूद्र जाति में न बदल कर ६७४३ जातियों में विभाजित कर दिया और वही क्रमिक असमानता जातियों में भी प्रस्थापित कर दिया .वर्तमान का OBC ही असली शूद्र हैजिसेSEBC(socially and educationally backward classes) कहते है .अंग्रेजो ने शूद्रों को अधिकार एवं शासन ,प्रशासन में प्रतिनिधित्व देने हेतु १८८१ से १९३१ जाति आधारित जनगणना करायी .परन्तु उच्च वर्गों के भारी विरोध एवं निम्न वर्गों की कोई मांग न होने के कारण वे प्रतिनिधित्व देने में असमर्थ रहे . पिछड़े वर्गों (SC ,ST ,OBC ) के सामाजिक न्याय हेतु जाति आधारित जनगणना कराया जाना अनिवार्य है .आजाद भारत में १९५१ से २०११ तक सरकार ने जाति आधारित जनगणना नहीं कराया . जब - जब भी जनगणना हुयी ,पिछड़े वर्गों के लोगो ने जाति आधारित जनगणना की मांग की तो उच्च वर्ग के लोगो ने इसका जबरदस्त विरोध किया .सरकार द्वारा जाति आधारित जनगणना न कराये जाने की धोखेबाजी को समझना अनिवार्य है .पिछड़े वर्गों (SC,ST ,OBC ) को सामाजिक न्याय न मिलने के पीछे कार्यपालिका के साथ न्यायपालिका की भूमिका भी संदिग्ध है जिसके लिए निम्न बिंदु विचारनीय है -
१- सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट के न्यायधिशो की नियुक्तिया संविधान के अनुच्छेद ७४,१२४, १६३ तथा २१७ के प्राविधानो के अनुसार होती थी .१९९३ से सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट advocate on record association बनाम भरत सरकार के वाद में यह प्रक्रिया समाप्त कर नियुक्ति का अधिकार अपने हाथ में ले लिया .क्या ऐसा कर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की खंडपीठ ने संविधान के प्राविधानो का उल्लंघन नहीं किया है ? वह क्या कारण है जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ को ऐसा करना पड़ा ?सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि नयायधिशो की नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका के हाथो में जाने से न्यायपालिका का राजनीतिकरण हो जायगा . क्या कार्य पालिका "WE THE PEOPLE OF INDIA "( हम भारत के लोग ) का प्रतिनिधित्व नहीं करती ? क्या " हम भारत के लोग " संसद और न्यायपालिका से ऊपर नहीं है ? ( फिर कैसा राजनीतिकरण ). क्या १९९३ से पहले राजनीतिकरण नहीं हो रहा था ,१९९३ से ही राजनीतिकरण की बात क्यों ? क्या संविधान के अनुच्छेदों का उल्लंघन आचार में आता है ?क्या सुप्रीम कोर्ट की जिस पीठ ने ऐसा किया ,वर्ण वाद ,वर्ग वाद ,जातिवाद नहीं किया ? सुप्रिमे कोर्ट तथा हाई कोर्ट में गिने चुने एकाध ही निम्न वर्ग के जज क्या इस वाद के उदहारण नहीं है ?
२-सुप्रिमे कोर्ट द्वारा आरक्षण में ५० प्रतिशत का अवरोध (बार ) तथा क्रिमिलयेर लगाना संविधान के अनुच्छेद १५(४),१६(४) तथा ३४० के प्राविधानो का उल्लंघन नहीं है ? सुप्रिमे कोर्ट का कथन है कि अनुच्छेद १६(४) OBC को पिछड़ा तथा अति पिछड़ा की अनुमति नहीं देता तो फिर क्रिमिलयेर की अनुमति उसमे कंहा है ?
३- क्या १९९१ में अपनाई गयी नयी आर्थिक नीति ( LIBERALIZATION ,PRIVATIZATION ,GLOBLIZATION ) मंडल आयोग की सिफ़ारिशो के का दुष्परिणाम नहीं है ? क्या इससे रोजगार के सरकारी श्रोतो को समाप्त कर १५(४),१६(४) तथा ३४० को प्रभावहीन बनाने का षड़यंत्रकारी अभियान नहीं है ? क्या इससे भारत आर्थिक मंदी की चपेट में नहीं आयेगा ?
४- क्या पिछड़ा वर्ग (SC ,ST ,OBC ) के प्रबुद्ध वर्ग को अपने संवर्ग के उन्ही प्रत्याशियों को तथा पार्टियों को अपना समर्थन देने का अभियान नहीं चलाना चाहिए ,जो लोक सभा, विधान सभा में इन बिन्दुओ को उठाकर इनपर रचनात्मक कार्यवाही करने का सार्थक प्रयास करे