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Thursday, 29 December 2011

राष्ट्रनिर्माता सावित्री बाई फुले

राष्ट्रनिर्माता सावित्री बाई फुले  
जनवरी, १८३१ को सावित्रीबाई फुले का जन्म हुआ था। भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक को नमन।  

 
एक महिला प्रिंसिपल के लिये सन १८४८ में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद हम २०११ में नहीं कर सकेंगे । लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी । सावित्री बाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया, वह भी पुणे जैसे कूढ़मगज शहर में । 
 
वे स्कूल जाती थीं, तो लोग पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंक देते थे । आज से १६० साल पहले बालिकाओ के लिये जब स्कूल खोलना पाप का काम मन जाता था कितना सामाजिक अपमान झेलकर खोला गया होगा देश में एक अकेला बालिका विद्यालय । 
 
 इतिहास लिखने वालों ने इस असली राष्ट्रनायिका के साथ न्याय नहीं किया। इतिहास का पुनर्लेखन एक अनिवार्य कार्यभार है । स्कूल तो क्या कॉलेज तक में विद्यार्थियों को बताते ही नहीं है कि कोई सावित्रीबाई फुले भी थीं, जिन्होंने देश का पहला बालिका विद्यालय खोला था । सावित्रीबाई फुले के स्कूल में हर धर्म और जातियों की बालिकाएँ  पढ़ती थीं । उन्होंने ब्राह्मण विधवा काशीबाई के बच्चे को गोद लिया था । 
 
सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं । हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया । जब सावित्री बाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उनपर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फैंका करते थे। सावित्री बाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं । अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती हैं। 
 
 साभार:फ़ेसबुक पर अमित जी

Friday, 2 December 2011

भारतीय समाज व्यवस्था क्रमिक असमानता पर आधारित है

 भारतीय समाज व्यवस्था  क्रमिक असमानता पर आधारित है जिसमे समाज को चार वर्णों क्रमश  :ब्रह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र में बांटा गया है ,जिसमे ऊपर के तीन वर्ण अधिकार संपन्न है तथा शूद्र वर्ण अधिकार वंचित है .बाद में ब्राह्मणों ने ब्रह्मण वर्ण को ब्रह्मण जाति में ,क्षत्रिय वर्ण  को क्षत्रिय जाति में ,वैश्य वर्ण  को वैश्य जाति में बदल दिया .मगर शुद्र वर्ण को शूद्र जाति में न बदल कर ६७४३ जातियों में विभाजित कर दिया और वही क्रमिक असमानता जातियों में भी प्रस्थापित कर दिया .वर्तमान का OBC ही असली शूद्र हैजिसेSEBC(socially and educationally backward classes) कहते है .अंग्रेजो ने शूद्रों को अधिकार एवं शासन ,प्रशासन में प्रतिनिधित्व देने हेतु १८८१ से १९३१ जाति आधारित जनगणना करायी .परन्तु उच्च वर्गों के भारी विरोध एवं निम्न वर्गों की कोई मांग न होने के कारण वे प्रतिनिधित्व देने में असमर्थ रहे . पिछड़े वर्गों (SC ,ST ,OBC ) के सामाजिक न्याय हेतु जाति आधारित जनगणना कराया जाना अनिवार्य है .आजाद भारत में १९५१ से २०११ तक सरकार ने जाति आधारित जनगणना नहीं कराया . जब - जब भी जनगणना हुयी ,पिछड़े वर्गों के लोगो ने जाति आधारित जनगणना की मांग की तो उच्च वर्ग के लोगो ने  इसका जबरदस्त विरोध किया .सरकार द्वारा जाति आधारित जनगणना न कराये जाने की धोखेबाजी को समझना अनिवार्य है .पिछड़े वर्गों  (SC,ST ,OBC ) को सामाजिक न्याय न मिलने के पीछे कार्यपालिका के साथ न्यायपालिका की भूमिका भी संदिग्ध  है जिसके लिए निम्न बिंदु विचारनीय है -
१- सुप्रीम कोर्ट एवं  हाईकोर्ट के न्यायधिशो  की नियुक्तिया संविधान के अनुच्छेद ७४,१२४, १६३ तथा २१७ के प्राविधानो के अनुसार होती थी .१९९३ से सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट advocate  on record association बनाम भरत सरकार के वाद में यह प्रक्रिया समाप्त कर नियुक्ति का अधिकार अपने हाथ में ले लिया .क्या ऐसा कर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की खंडपीठ ने संविधान के प्राविधानो का उल्लंघन नहीं किया है ? वह क्या कारण है जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ को ऐसा करना पड़ा ?सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि नयायधिशो की नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका के हाथो में जाने से न्यायपालिका का  राजनीतिकरण हो जायगा . क्या कार्य पालिका "WE THE PEOPLE OF INDIA  "( हम भारत के लोग ) का प्रतिनिधित्व नहीं करती ? क्या " हम भारत के लोग " संसद और न्यायपालिका से ऊपर नहीं है ? ( फिर कैसा राजनीतिकरण ). क्या १९९३ से पहले राजनीतिकरण नहीं हो रहा था ,१९९३ से ही राजनीतिकरण की बात क्यों ? क्या संविधान के अनुच्छेदों का उल्लंघन आचार में आता है ?क्या सुप्रीम कोर्ट की जिस पीठ ने ऐसा किया ,वर्ण वाद ,वर्ग वाद ,जातिवाद नहीं किया ? सुप्रिमे कोर्ट तथा हाई कोर्ट में गिने चुने एकाध ही निम्न वर्ग के जज क्या इस वाद के उदहारण नहीं है ?
२-सुप्रिमे कोर्ट द्वारा आरक्षण में ५० प्रतिशत का अवरोध (बार ) तथा क्रिमिलयेर लगाना संविधान के अनुच्छेद १५(४),१६(४) तथा ३४० के प्राविधानो का उल्लंघन नहीं है ? सुप्रिमे कोर्ट का कथन है कि  अनुच्छेद
१६(४) OBC  को पिछड़ा तथा अति पिछड़ा की अनुमति नहीं देता तो फिर क्रिमिलयेर की अनुमति उसमे कंहा है ?
३- क्या १९९१ में अपनाई गयी नयी आर्थिक नीति ( LIBERALIZATION ,PRIVATIZATION ,GLOBLIZATION )  मंडल आयोग की सिफ़ारिशो के का दुष्परिणाम नहीं है ? क्या इससे रोजगार के सरकारी श्रोतो को समाप्त कर
१५(४),१६(४) तथा ३४० को प्रभावहीन बनाने का षड़यंत्रकारी अभियान नहीं है ? क्या इससे भारत आर्थिक मंदी  की चपेट  में नहीं आयेगा ?
४- क्या पिछड़ा वर्ग
(SC ,ST ,OBC ) के प्रबुद्ध वर्ग को अपने संवर्ग के उन्ही प्रत्याशियों को  तथा पार्टियों को अपना समर्थन देने का अभियान नहीं चलाना चाहिए ,जो लोक सभा,  विधान सभा  में इन बिन्दुओ को उठाकर इनपर रचनात्मक कार्यवाही  करने का सार्थक प्रयास करे

Sunday, 13 November 2011

ANTI RESERVATION PERSONALITY

with the courtesy  of  wwww.obcreservation.net

Image "Kawwa kabhi sher nahin ban sakta"  Navjot Singh Sidhu, BJP MP
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"Quota will kill quality" NR Narayan Murthy, Infosys Chairman and Chief Mentor
"No society that has shunned merit has succeeded in solving its problems and it is ironical that people here see sustenance of backwardness as an instrument of progress than turning to hard work.We have become, perhaps, the only nation in he world where people fight to be called backward rather than forward.''
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"The proposal to provide reservations in private sector would "take the country backward" Rahul Bajaj Industrialist
Mr. Bajaj termed it unfortunate that the country was faced with a situation where the issue of reservations had again been raised by politicians and certain vested interests. The proposal to provide reservations in private sector would "take the country backward" and "we cannot be part of such a retrograde step."
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"Reservation will divide the country" Ratan Tata, Tata Group Chairman
"Though I do not want to comment on it, it (reservation) is bad. In some way, it will tend to divide the country into different groups."Even as the demand for reservations in private sector is being hotly debated, Mr Ratan Tata, Chairman of Tata Sons Ltd, and Mr Rahul Bajaj, CMD, Bajaj Auto Ltd, on Saturday opposed such a proposal stating that it would further divide the society.

Tuesday, 18 October 2011

मनुस्मुर्ति में क्या कहा हैं ?


मनुस्मुर्ति में क्या कहा हैं ? 



भारत के संविधान में समानता का अधिकार मिला है जिसमे लिंग भेद की कोई बात ही नहीं है मनुस्मुर्ती  ब्राह्मणों का संविधान है जो सदियों से इस देश में लागू है मानसिक रूप से आज भी देखने को मिलता है हमारा कर्तव्य है की हमें उसका जानकर होना चाहिए ,भारत के संविधान में शिक्षा ,शास्त्र और सम्पति रखने का अधिकार सभी लोगो को दिया हुआ वही मनुस्मुर्ती के संविधान में शुद्रो के लिए शिक्षा सम्पति और शास्त्र की मनाही थी आईये जाने उसमे क्या लिखा है
१- पुत्री,पत्नी,माता या कन्या,युवा,व्रुद्धा किसी भी स्वरुप में नारी स्वतंत्र नही होनी चाहिए.     -मनुस्मुर्तिःअध्याय-९  श्लोक-२ से ६ तक.

...२- पति पत्नी को छोड सकता हैं, सुद(गिरवी) पर रख सकता हैं, बेच सकता हैं, लेकिन स्त्री को इस प्रकार के अधिकार नही हैं. किसी भी स्थिती में, विवाह के बाद, पत्नी सदैव पत्नी ही रहती हैं. - मनुस्मुर्तिःअध्याय-९ श्लोक-४५

३- संपति और मिलकियत के अधिकार और दावो के लिए, शूद्र की स्त्रिया भी "दास" हैं, स्त्री को संपति रखने का अधिकार नही हैं, स्त्री की संपति का मलिक उसका पति,पूत्र, या पिता हैं. - मनुस्मुर्तिःअध्याय-९ श्लोक-४१६.

४- ढोर, गंवार, शूद्र और नारी, ये सब ताडन के अधिकारी हैं, यानी नारी को ढोर की तरह मार सकते हैं....तुलसी दास पर भी इसका प्रभाव दिखने को मिलता हैं, वह लिखते हैं-"ढोर,चमार और नारी, ताडन के अधिकारी."
- मनुस्मुर्तिःअध्याय-८ श्लोक-२९९

५- असत्य जिस तरह अपवित्र हैं, उसी भांति स्त्रियां भी अपवित्र हैं, यानी पढने का, पढाने का, वेद-मंत्र बोलने का या उपनयन का स्त्रियो को अधिकार नही हैं.- मनुस्मुर्तिःअध्याय-२ श्लोक-६६ और अध्याय-९ श्लोक-१८.

६- स्त्रियां नर्कगामीनी होने के कारण वह यग्यकार्य या दैनिक अग्निहोत्र भी नही कर सकती.(इसी लिए कहा जाता है-"नारी नर्क का द्वार") - मनुस्मुर्तिःअध्याय-११ श्लोक-३६ और ३७ .

७- यग्यकार्य करने वाली या वेद मंत्र बोलने वाली स्त्रियो से किसी ब्राह्मण भी ने भोजन नही लेना चाहिए, स्त्रियो ने किए हुए सभी यग्य कार्य अशुभ होने से देवो को स्वीकार्य नही हैं. - मनुस्मुर्तिःअध्याय-४ श्लोक-२०५ और २०६ .

८- - मनुस्मुर्ति के मुताबिक तो , स्त्री पुरुष को मोहित करने वाली - अध्याय-२ श्लोक-२१४ .

९ - स्त्री पुरुष को दास बनाकर पदभ्रष्ट करने वाली हैं. अध्याय-२ श्लोक-२१४

१० - स्त्री एकांत का दुरुप्योग करने वाली. अध्याय-२ श्लोक-२१५.

११. - स्त्री संभोग के लिए उमर या कुरुपताको नही देखती. अध्याय-९ श्लोक-११४.

१२- स्त्री चंचल और हदयहीन,पति की ओर निष्ठारहित होती हैं. अध्याय-२ श्लोक-११५.

१३.- केवल शैया, आभुषण और वस्त्रो को ही प्रेम करने वाली, वासनायुक्त, बेईमान, इर्षाखोर,दुराचारी हैं . अध्याय-९ श्लोक-१७.

१४.- सुखी संसार के लिए स्त्रीओ को कैसे रहना चाहिए? इस प्रश्न के उतर में मनु कहते हैं-
(१). स्त्रीओ को जीवन भर पति की आग्या का पालन करना चाहिए. - मनुस्मुर्तिःअध्याय-५ श्लोक-११५.

(२). पति सदाचारहीन हो,अन्य स्त्रीओ में आसक्त हो, दुर्गुणो से भरा हुआ हो, नंपुसंक हो, जैसा भी हो फ़िर भी स्त्री को पतिव्रता बनकर उसे देव की तरह पूजना चाहिए.- मनुस्मुर्तिःअध्याय-५ श्लोक-१५४.

जो इस प्रकार के उपर के ये प्रावधान वाले पाशविक रीति-नीति के विधान वाले पोस्टर क्यो नही छपवाये?

(१) वर्णानुसार करने के कार्यः -

- महातेजस्वी ब्रह्मा ने स्रुष्टी की रचना के लिए ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र को भिन्न-भिन्न कर्म करने को तै किया हैं -

- पढ्ना,पढाना,यग्य करना-कराना,दान लेना यह सब ब्राह्मण को कर्म करना हैं. अध्यायः१:श्लोक:८७

- प्रजा रक्षण , दान देना, यग्य करना, पढ्ना...यह सब क्षत्रिय को करने के कर्म हैं. - अध्यायः१:श्लोक:८९

- पशु-पालन , दान देना,यग्य करना, पढ्ना,सुद(ब्याज) लेना यह वैश्य को करने का कर्म हैं. - अध्यायः१:श्लोक:९०.

- द्वेष-भावना रहित, आंनदित होकर उपर्युक्त तीनो-वर्गो की नि:स्वार्थ सेवा करना, यह शूद्र का कर्म हैं. - अध्यायः१:श्लोक:९१.

(२) प्रत्येक वर्ण की व्यक्तिओके नाम कैसे हो?:-

- ब्राह्मण का नाम मंगलसूचक - उदा. शर्मा या शंकर
- क्षत्रिय का नाम शक्ति सूचक - उदा. सिंह
- वैश्य का नाम धनवाचक पुष्टियुक्त - उदा. शाह
- शूद्र का नाम निंदित या दास शब्द युक्त - उदा. मणिदास,देवीदास
- अध्यायः२:श्लोक:३१-३२.

(३) आचमन के लिए लेनेवाला जल:-

- ब्राह्मण को ह्रदय तक पहुचे उतना.
- क्षत्रिय को कंठ तक पहुचे उतना.
- वैश्य को मुहं में फ़ैले उतना.
- शूद्र को होठ भीग जाये उतना, आचमन लेना चाहिए.
- अध्यायः२:श्लोक:६२.

(४) व्यक्ति सामने मिले तो क्या पूछे?:-
- ब्राह्मण को कुशल विषयक पूछे.
- क्षत्रिय को स्वाश्थ्य विषयक पूछे.
- वैश्य को क्षेम विषयक पूछे.
- शूद्र को आरोग्य विषयक पूछे.
- अध्यायः२:श्लोक:१२७.
(५) वर्ण की श्रेष्ठा का अंकन :-
- ब्राह्मण को विद्या से.
- क्षत्रिय को बल से.
- वैश्य को धन से.
- शूद्र को जन्म से ही श्रेष्ठ मानना.(यानी वह जन्म से ही शूद्र हैं)
- अध्यायः२:श्लोक:१५५.
(६) विवाह के लिए कन्या का चयन:-
- ब्राह्मण सभी चार वर्ण की कन्याये पंसद कर सकता हैं.
- क्षत्रिय - ब्राह्मण कन्या को छोडकर सभी तीनो वर्ण की कन्याये पंसद कर सकता हैं.
- वैश्य - वैश्य की और शूद्र की ऎसे दो वर्ण की कन्याये पंसद कर सकता हैं.
- शूद्र को शूद्र वर्ण की ही कन्याये विवाह के लिए पंसद कर सकता हैं.- (अध्यायः३:श्लोक:१३) यानी शूद्र को ही वर्ण से बाहर अन्य वर्ण की कन्या से विवाह नही कर सकता.

(७) अतिथि विषयक:-
- ब्राह्मण के घर केवल ब्राह्मण ही अतिथि गीना जाता हैं,(और वर्ण की व्यक्ति नही)
- क्षत्रिय के घर ब्राह्मण और क्षत्रिय ही ऎसे दो ही अतिथि गीने जाते थे.
- वैश्य के घर ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य तीनो द्विज अतिथि हो सकते हैं, लेकिन ...

- शूद्र के घर केवल शूद्र ही अतिथि कहेलवाता हैं - (अध्यायः३:श्लोक:११०) और कोइ वर्ण का आ नही सकता...

(८) पके हुए अन्न का स्वरुप:-

- ब्राह्मण के घर का अन्न अम्रुतमय.
- क्षत्रिय के घर का अन्न पय(दुग्ध) रुप.
- वैश्य के घर का अन्न जो है यानी अन्नरुप में.
- शूद्र के घर का अन्न रक्तस्वरुप हैं यानी वह खाने योग्य ही नही हैं.
(अध्यायः४:श्लोक:१४)

(९) शब को कौन से द्वार से ले जाए? :-
- ब्राह्मण के शव को नगर के पूर्व द्वार से ले जाए.
- क्षत्रिय के शव को नगर के उतर द्वार से ले जाए.
- वैश्य के शव को पश्र्चिम द्वार से ले जाए.
- शूद्र के शव को दक्षिण द्वार से ले जाए.
(अध्यायः५:श्लोक:९२)

(१०) किस के सौगंध लेने चाहिए?:-
- ब्राह्मण को सत्य के.
- क्षत्रिय वाहन के.
- वैश्य को गाय, व्यापार या सुवर्ण के.
- शूद्र को अपने पापो के सोगन्ध दिलवाने चाहिए.
(अध्यायः८:श्लोक:११३)

(११) महिलाओ के साथ गैरकानूनी संभोग करने हेतू:-
- ब्राह्मण अगर अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो सिर पे मुंडन करे.
- क्षत्रिय अगर अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो १००० भी दंड करे.
- वैश्य अगर अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो उसकी सभी संपति को छीन ली जाये और १ साल के लिए कैद और बाद में देश निष्कासित.
- शूद्र अगर अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो उसकी सभी संपति को छीन ली जाये , उसका लिंग काट लिआ जाये.
- शूद्र अगर द्विज-जाती के साथ अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो उसका एक अंग काटके उसकी हत्या कर दे.
(अध्यायः८:श्लोक:३७४,३७५,३७९)
(१२) हत्या के अपराध में कोन सी कार्यवाही हो?:-
- ब्राह्मण की हत्या यानी ब्रह्महत्या महापाप.(ब्रह्महत्या करने वालो को उसके पाप से कभी मुक्ति नही मिलती)
- क्षत्रिय की हत्या करने से ब्रह्महत्या का चौथे हिस्से का पाप लगता हैं.
- वैश्य की हत्या करने से ब्रह्महत्या का आठ्वे हिस्से का पाप लगता हैं.

- शूद्र की हत्या करने से ब्रह्महत्या का सोलह्वे हिस्से का पाप लगता हैं.(यानी शूद्र की जिन्द्गी बहोत सस्ती हैं)
- (अध्यायः११:श्लोक:१२६)



Thursday, 6 October 2011

MULNIVASI BAHUJAN’S ( I.E. NATIVE INDIAN’S ) “VIJAYA DASHAMI” Vs EURESIAN BRAHMINS “DUSHARA

Euresian brahmins invaded india in around 2500 B.C. and made all Indians their slaves i.e. SHUDRAS. Lord Buddha made 1st revoultion against cunning brahmins in 6th B.C. and given freedom to all Indians from brahmins. Emperor Ashoka continued this Buddha’s revolutionary work and gained victory all over the world. He now wanted to gain another victory on the world with the help of the Buddha’s Dhamma…it is called as the CONQUEST OF THE DHAMMA. To gain this conquest, Emperor Ashoka converted himself to Buddhism. The day on which he converted is called as VIJAYA DASHAMI i.e. THE DAY OF VICTORY!!
To do counter-revolution against Buddhism and Emperor Ashoka. Cunning brahmins written mythical stories like RAMAYANA, GEETA, MAHABHARATA, etc. In Ramayana, brahmins shown cunning brahmin king Pushyamitra Shunga as RAM and they shown Mauryan empires as RAVANA. The last Mauryan king, BRIDHRATHA was killed by Pushyamitra. Since, total 10 kings of Mauryas were shown in Ramayana in the form of 10 headed RAVANA.
Brahmins given name RAVANA to Mauryan kings so as to defame RAVANA. Actually, Ravana was an ADIVASI GOND king in Middle India during the time of the Buddha and he was the great follower of the BUDDHA. He had gained 10 BALA’S i.e. 10 PARIMITAS of Buddhism. So, he was called as 10 BALI RAVANA.
Brahmins had destroyed Buddhsim and Mauryan empire. So, to defame Buddhist kings and to present Mauryan kings, they choose RAVANA as a VILLAINE in ramayana. If brahmins will present directly RAM against MAURYANS, then peoples wont accept him. So, brahmins written this original story in mythical form.
To counter VIJAYA DASHAMI of great ASHOKA, brahmins shown in Ramayana that, Ram had killed Ravana on this day and stated calling it as DUSHARA i.e. DUS ( 10 ) and HARA means DEFEATED.
So, DUSHARA is counter festival of invader brahmins against mulnivasi Indians favourite festival VIJAYA DASHAMI. All Indians should follow VIJAYA DASHAMI only and not DUSHARA !! JAI मूलनिवासी!!!!!!!

Wednesday, 5 October 2011

क्रमिक असमानता पर आधारित है भारत की सामाजिक व्यवस्था !

भारत की सामाजिक व्यवस्था में क्रमशा : वर्ण व्यवस्था , जाति व्यवस्था , आदिवासियों का प्रथ्करण ,महिलाओ की दासता का mai  jikar करूँगा सबसे पहले वर्ण व्यवस्था के  बारे में चर्चा करूँगा ऋग्वेद के दशवे मंडल के ९० वे सूक्त के वर्ण व्यवस्था का जिकर है जिसमे चार वर्ण है चारो वर्णों का विवरण इस प्रकार है पहला वर्ण ब्रह्मण २ क्षत्रिय ३ वैश्य  ४ शुद्र चारो वर्ण क्रमिक असमानता पर आधारित है वर्ण व्यवस्था में
१ ब्राह्मण : ब्रह्मं के मुख से उत्पन्न हुआ है २: क्षत्रिय - भुजाओ से उत्पन्न  हुआ है ३: वैश्य -जांघो से उत्पन्न हुआ है ४: शुद्र -पैरो से उत्पन्न हुआ है
वर्ण व्यवस्था की विशेषताए
१- वर्ण व्यवस्था अपोरुष्य  है ईशवर की बनायीं  हुयी है ,चारो वर्ण आपस में असमान है ,यहाँ सीधी नुमा व्यवस्था  है   जिसमे ब्रह्मण सबसे ऊपर क्षत्रिय उसके निचे उसके बाद वैश्य शुद्र सबसे निचे है , जिसमे सामाजिक सम्मान  ऊपर से निचे आने पर घाट जाता है और निचे से ऊपर जाने पर सामाजिक सम्मान बढ़ जाता है इसे ही क्रमिक असमानता कहता हैं
2-जिसमे ब्रह्मण का धर्म पढ़ना ,पढ़ाना, पुरोहिताई  करना दान लेना यज्ञ करना ,क्षत्रिय  का धर्म पढ़ना मगर पढ़ाना नहीं ,राज करना ,वैश्य का धर्म पढ़ना मगर पढाना नहीं व्यापार   करना और शुद्र का धर्म न पढना और न पढाना बल्कि तीनो वर्णों की सेवा करना था
 ३-इस प्रकार तीनो वर्णों को अधिकार थे मगर शुद्रो को कर्तव्य ही थे ,ब्रह्मण को जो अधिकार मिले थे उनकी मांग क्षत्रिय नहीं कर सकता था ,क्षत्रिय को जो अधिकार मिले थे उनको वैश्य नहीं मांग सकता था ,शुद्र किशी भी अधिकार की  मांग नहीं कर सकता था.  ऊपर से ब्रह्मण के सब गुलाम थे ,क्षत्रिय के वैश्य और शुद्र गुलाम थे, और शुद्र सब के गुलाम थे और यह गुलामी ऊपर से निचे की और अति है निचे से उपर को नहीं जाती यानि ब्रह्मण के सब  गुलाम  होगे  शुद्र किसी को गुलाम नहीं बना सकता 
वर्ण व्यवस्था  जाति व्यवस्था में बदल गयी वर्ण व्यवस्था से भी कठोर हो गयी एक बार जिस  जाति में जन्म ले लिया मरने के बाद भी जाति उसका पीछा नहीं छोडती है जन्म लेते ही उसके संस्कार,   व्यक्तित्व सभी जन्म ले लेता है  .जाति में गतिशीलता नहीं है यानि मल्लाह के घर में जन्म लिया तो प्रोफेसर होने के बाद भी नहीं बदलता है जाति उसका पीछा करती रहती है
 ब्राह्मणों में सभी ब्रह्मण है ,क्षत्रियो में सभी क्षत्रिय है ,वैश्य  में सभी वैश्य है मगर शुद्रो में सभी शुद्र नहीं है उनकी बहुत  सी  जातीय है   अभी तक 6743 जातिया देखने को मिली है  जो कृमिक असमानता वर्ण व्यवस्था में थी वे सब जातियों में भी आ गयी हर जाति के ऊपर धी जाति है और निचे भी जाति है हर जाति एक दुसरे से उची नीची है हर आदमी अपनी जाति को उची जाति समजता है  इस प्रकार ब्रह्मण से भी ऊपर कोई जाति नहीं है और शुद्रो की अछूतों की माँगा जाति से भी कोई नीची जाति नहीं है
 तो मित्रो भारत की सामाजिक व्यवस्था उच्च  एव नीच  के क्रमिक असमानता पर आधारित है हमें इसको बदलना है

Monday, 26 September 2011

जाति आधारित जनगणना होना जरूरी है

पिछड़े वेर्गो के सामाजिक न्याय हेतु जाति आधारित जनगणना होना अनिवार्य है  ,भारत में जनगणना का इतिहास १४० साल का है . सन्न  १८७२ में भारत में पहली बार अंग्रेजो द्वारा जनगणना की शुरुवात हुई  थी .अस्सी साल तक जातिय  जनगणना अंग्रेजो द्वारा करायी  जाती रही .१९४१ की जनगणना अंतिम जाति आधारित जनगणना थी जो विश्व युद्ध के कारण अधूरी रह गयी थी .आज तक १९३१ की जनगणना का ही डाटा उपलब्ध है जो  आखरी जाति आधारित जनगणना थी    .आजाद भारत में १९४८ में  cencus act बनाकर जाति आधारित प्रश्नावली को निकल दिया और आजाद भारत में  १९५१ पहली बार जनगणना हुई जो जाति के  आधारपर नहीं थी १९५१ से लेकर आज तक  किसी भी सरकार ने अभी तक जाति आधारित जनगणना नहीं करवाया है जिससे पिछड़ी जातियों की ठीक ठीक आबादी का पता नहीं चल पाया है सभी akada पुराना है
     शाशक जाती के लोग भारत में जाति आधारित जनगणना  क्यों नहीं करना चाहते  ? क्योकि अगर जातियों  की गिनती हो जायगी तो सबसे कम जन्शंख्या वाली जाति जो सबसे जयादा धन धरती शाशन प्रशाशन में काबिज है उसकी पोल खुल जायगी .इससे  बचने के लिए शाशक जाति के लोग भारत में जातियों की गिनती  नहीं होने देना चाहते .
            अगर सभी जातियों की गिनती हो जायगी तो ओ बी सी में कौन कौन सी जातिया आती  है यह पता चल जायगा  और ओ बी सी को उनकी  आबादी के आधार पर अपना अधिकार लेने में आसानी हो जायगी तो पिछड़ी जातियों के सामाजिक न्याय हेतु जाति आधारित जनगणना कराना अनिवार्य है