भारत की सामाजिक व्यवस्था में क्रमशा : वर्ण व्यवस्था , जाति व्यवस्था , आदिवासियों का प्रथ्करण ,महिलाओ की दासता का mai jikar करूँगा सबसे पहले वर्ण व्यवस्था के बारे में चर्चा करूँगा ऋग्वेद के दशवे मंडल के ९० वे सूक्त के वर्ण व्यवस्था का जिकर है जिसमे चार वर्ण है चारो वर्णों का विवरण इस प्रकार है पहला वर्ण ब्रह्मण २ क्षत्रिय ३ वैश्य ४ शुद्र चारो वर्ण क्रमिक असमानता पर आधारित है वर्ण व्यवस्था में
१ ब्राह्मण : ब्रह्मं के मुख से उत्पन्न हुआ है २: क्षत्रिय - भुजाओ से उत्पन्न हुआ है ३: वैश्य -जांघो से उत्पन्न हुआ है ४: शुद्र -पैरो से उत्पन्न हुआ है
वर्ण व्यवस्था की विशेषताए
१- वर्ण व्यवस्था अपोरुष्य है ईशवर की बनायीं हुयी है ,चारो वर्ण आपस में असमान है ,यहाँ सीधी नुमा व्यवस्था है जिसमे ब्रह्मण सबसे ऊपर क्षत्रिय उसके निचे उसके बाद वैश्य शुद्र सबसे निचे है , जिसमे सामाजिक सम्मान ऊपर से निचे आने पर घाट जाता है और निचे से ऊपर जाने पर सामाजिक सम्मान बढ़ जाता है इसे ही क्रमिक असमानता कहता हैं
2-जिसमे ब्रह्मण का धर्म पढ़ना ,पढ़ाना, पुरोहिताई करना दान लेना यज्ञ करना ,क्षत्रिय का धर्म पढ़ना मगर पढ़ाना नहीं ,राज करना ,वैश्य का धर्म पढ़ना मगर पढाना नहीं व्यापार करना और शुद्र का धर्म न पढना और न पढाना बल्कि तीनो वर्णों की सेवा करना था
३-इस प्रकार तीनो वर्णों को अधिकार थे मगर शुद्रो को कर्तव्य ही थे ,ब्रह्मण को जो अधिकार मिले थे उनकी मांग क्षत्रिय नहीं कर सकता था ,क्षत्रिय को जो अधिकार मिले थे उनको वैश्य नहीं मांग सकता था ,शुद्र किशी भी अधिकार की मांग नहीं कर सकता था. ऊपर से ब्रह्मण के सब गुलाम थे ,क्षत्रिय के वैश्य और शुद्र गुलाम थे, और शुद्र सब के गुलाम थे और यह गुलामी ऊपर से निचे की और अति है निचे से उपर को नहीं जाती यानि ब्रह्मण के सब गुलाम होगे शुद्र किसी को गुलाम नहीं बना सकता
वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में बदल गयी वर्ण व्यवस्था से भी कठोर हो गयी एक बार जिस जाति में जन्म ले लिया मरने के बाद भी जाति उसका पीछा नहीं छोडती है जन्म लेते ही उसके संस्कार, व्यक्तित्व सभी जन्म ले लेता है .जाति में गतिशीलता नहीं है यानि मल्लाह के घर में जन्म लिया तो प्रोफेसर होने के बाद भी नहीं बदलता है जाति उसका पीछा करती रहती है
ब्राह्मणों में सभी ब्रह्मण है ,क्षत्रियो में सभी क्षत्रिय है ,वैश्य में सभी वैश्य है मगर शुद्रो में सभी शुद्र नहीं है उनकी बहुत सी जातीय है अभी तक 6743 जातिया देखने को मिली है जो कृमिक असमानता वर्ण व्यवस्था में थी वे सब जातियों में भी आ गयी हर जाति के ऊपर धी जाति है और निचे भी जाति है हर जाति एक दुसरे से उची नीची है हर आदमी अपनी जाति को उची जाति समजता है इस प्रकार ब्रह्मण से भी ऊपर कोई जाति नहीं है और शुद्रो की अछूतों की माँगा जाति से भी कोई नीची जाति नहीं है
तो मित्रो भारत की सामाजिक व्यवस्था उच्च एव नीच के क्रमिक असमानता पर आधारित है हमें इसको बदलना है
१ ब्राह्मण : ब्रह्मं के मुख से उत्पन्न हुआ है २: क्षत्रिय - भुजाओ से उत्पन्न हुआ है ३: वैश्य -जांघो से उत्पन्न हुआ है ४: शुद्र -पैरो से उत्पन्न हुआ है
वर्ण व्यवस्था की विशेषताए
१- वर्ण व्यवस्था अपोरुष्य है ईशवर की बनायीं हुयी है ,चारो वर्ण आपस में असमान है ,यहाँ सीधी नुमा व्यवस्था है जिसमे ब्रह्मण सबसे ऊपर क्षत्रिय उसके निचे उसके बाद वैश्य शुद्र सबसे निचे है , जिसमे सामाजिक सम्मान ऊपर से निचे आने पर घाट जाता है और निचे से ऊपर जाने पर सामाजिक सम्मान बढ़ जाता है इसे ही क्रमिक असमानता कहता हैं
2-जिसमे ब्रह्मण का धर्म पढ़ना ,पढ़ाना, पुरोहिताई करना दान लेना यज्ञ करना ,क्षत्रिय का धर्म पढ़ना मगर पढ़ाना नहीं ,राज करना ,वैश्य का धर्म पढ़ना मगर पढाना नहीं व्यापार करना और शुद्र का धर्म न पढना और न पढाना बल्कि तीनो वर्णों की सेवा करना था
३-इस प्रकार तीनो वर्णों को अधिकार थे मगर शुद्रो को कर्तव्य ही थे ,ब्रह्मण को जो अधिकार मिले थे उनकी मांग क्षत्रिय नहीं कर सकता था ,क्षत्रिय को जो अधिकार मिले थे उनको वैश्य नहीं मांग सकता था ,शुद्र किशी भी अधिकार की मांग नहीं कर सकता था. ऊपर से ब्रह्मण के सब गुलाम थे ,क्षत्रिय के वैश्य और शुद्र गुलाम थे, और शुद्र सब के गुलाम थे और यह गुलामी ऊपर से निचे की और अति है निचे से उपर को नहीं जाती यानि ब्रह्मण के सब गुलाम होगे शुद्र किसी को गुलाम नहीं बना सकता
वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में बदल गयी वर्ण व्यवस्था से भी कठोर हो गयी एक बार जिस जाति में जन्म ले लिया मरने के बाद भी जाति उसका पीछा नहीं छोडती है जन्म लेते ही उसके संस्कार, व्यक्तित्व सभी जन्म ले लेता है .जाति में गतिशीलता नहीं है यानि मल्लाह के घर में जन्म लिया तो प्रोफेसर होने के बाद भी नहीं बदलता है जाति उसका पीछा करती रहती है
ब्राह्मणों में सभी ब्रह्मण है ,क्षत्रियो में सभी क्षत्रिय है ,वैश्य में सभी वैश्य है मगर शुद्रो में सभी शुद्र नहीं है उनकी बहुत सी जातीय है अभी तक 6743 जातिया देखने को मिली है जो कृमिक असमानता वर्ण व्यवस्था में थी वे सब जातियों में भी आ गयी हर जाति के ऊपर धी जाति है और निचे भी जाति है हर जाति एक दुसरे से उची नीची है हर आदमी अपनी जाति को उची जाति समजता है इस प्रकार ब्रह्मण से भी ऊपर कोई जाति नहीं है और शुद्रो की अछूतों की माँगा जाति से भी कोई नीची जाति नहीं है
तो मित्रो भारत की सामाजिक व्यवस्था उच्च एव नीच के क्रमिक असमानता पर आधारित है हमें इसको बदलना है
No comments:
Post a Comment