मनि राम सिंह कुशवाह डॉ जी सिंह
Wednesday, 11 March 2015
Sunday, 15 February 2015
मनु स्मृति और भारतीय संविधान
भारत के संविधान में समानता का अधिकार मिला है जिसमे लिंग भेद की कोई बात ही नहीं है मनु स्मृति ब्राह्मणों का संविधान है जो सदियों से इस देश में लागू है मानसिक रूप से आज भी देखने को मिलता है हमारा कर्तव्य है की हमें उसका जानकर होना चाहिए ,भारत के संविधान में शिक्षा ,शास्त्र और सम्पति रखने का अधिकार सभी लोगो को दिया हुआ है। संविधान में पिछड़ा वर्ग, आदिवासी /मूलनिवासी हितों की रक्षा और उनके लिए किये जाने वाले संघर्ष के लिए बने संवैधानिक व क़ानूनी प्रावधानों की जानकारी होना जरुरी है इसके बिना संघर्ष का कोई ओचित्य नहीं है। संविधान में आदिवासियों / मूलनिवासियो अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति, और अन्य पिछड़ा वर्ग से सम्बंधित कई प्रावधान है |संविधान के अनुच्छेद -15(4),16(4), 19(5), 23,29,46,164,खंड-10-244,244 क, 243घ, 330,332,334,335,338, 339,(1),366 (24),366(25), 371(क),371 (ख)371(ग), 340,341,342 पांचवी अनुसूची-पैरा 3,4,5 तथा छठी अनुसूची में इनके लिए अधिकार निहित है | वही मनु स्मृति में शुद्रो के लिए शिक्षा सम्पति और शास्त्र की मनाही थी आईये जाने मनु स्मृति में क्या लिखा है -
१- पुत्री,पत्नी,माता या कन्या,युवा,व्रुद्धा किसी भी स्वरुप में नारी स्वतंत्र नही होनी चाहिए. -मनुस्मृति अध्याय-९ श्लोक-२ से ६ तक.
...२- पति पत्नी को छोड सकता हैं, सुद(गिरवी) पर रख सकता हैं, बेच सकता हैं, लेकिन स्त्री को इस प्रकार के अधिकार नही हैं. किसी भी स्थिती में, विवाह के बाद, पत्नी सदैव पत्नी ही रहती हैं. - मनुस्मुर्तिःअध्याय-९ श्लोक-४५
३- संपति और मिलकियत के अधिकार और दावो के लिए, शूद्र की स्त्रिया भी "दास" हैं, स्त्री को संपति रखने का अधिकार नही हैं, स्त्री की संपति का मलिक उसका पति,पूत्र, या पिता हैं. - मनुस्मुर्तिःअध्याय-९ श्लोक-४१६.
४- ढोर, गंवार, शूद्र और नारी, ये सब ताडन के अधिकारी हैं, यानी नारी को ढोर की तरह मार सकते हैं....तुलसी दास पर भी इसका प्रभाव दिखने को मिलता हैं, वह लिखते हैं-"ढोर,चमार और नारी, ताडन के अधिकारी."
- मनुस्मुर्तिःअध्याय-८ श्लोक-२९९
५- असत्य जिस तरह अपवित्र हैं, उसी भांति स्त्रियां भी अपवित्र हैं, यानी पढने का, पढाने का, वेद-मंत्र बोलने का या उपनयन का स्त्रियो को अधिकार नही हैं.- मनुस्मुर्तिःअध्याय-२ श्लोक-६६ और अध्याय-९ श्लोक-१८.
६- स्त्रियां नर्कगामीनी होने के कारण वह यग्यकार्य या दैनिक अग्निहोत्र भी नही कर सकती.(इसी लिए कहा जाता है-"नारी नर्क का द्वार") - मनुस्मुर्तिःअध्याय-११ श्लोक-३६ और ३७ .
७- यग्यकार्य करने वाली या वेद मंत्र बोलने वाली स्त्रियो से किसी ब्राह्मण भी ने भोजन नही लेना चाहिए, स्त्रियो ने किए हुए सभी यग्य कार्य अशुभ होने से देवो को स्वीकार्य नही हैं. - मनुस्मुर्तिःअध्याय-४ श्लोक-२०५ और २०६ .
८- - मनुस्मुर्ति के मुताबिक तो , स्त्री पुरुष को मोहित करने वाली - अध्याय-२ श्लोक-२१४ .
९ - स्त्री पुरुष को दास बनाकर पदभ्रष्ट करने वाली हैं. अध्याय-२ श्लोक-२१४
१० - स्त्री एकांत का दुरुप्योग करने वाली. अध्याय-२ श्लोक-२१५.
११. - स्त्री संभोग के लिए उमर या कुरुपताको नही देखती. अध्याय-९ श्लोक-११४.
१२- स्त्री चंचल और हदयहीन,पति की ओर निष्ठारहित होती हैं. अध्याय-२ श्लोक-११५.
१३.- केवल शैया, आभुषण और वस्त्रो को ही प्रेम करने वाली, वासनायुक्त, बेईमान, इर्षाखोर,दुराचारी हैं . अध्याय-९ श्लोक-१७.
१४.- सुखी संसार के लिए स्त्रीओ को कैसे रहना चाहिए? इस प्रश्न के उतर में मनु कहते हैं-
(१). स्त्रीओ को जीवन भर पति की आग्या का पालन करना चाहिए. - मनुस्मुर्तिःअध्याय-५ श्लोक-११५.
(२). पति सदाचारहीन हो,अन्य स्त्रीओ में आसक्त हो, दुर्गुणो से भरा हुआ हो, नंपुसंक हो, जैसा भी हो फ़िर भी स्त्री को पतिव्रता बनकर उसे देव की तरह पूजना चाहिए.- मनुस्मुर्तिःअध्याय-५ श्लोक-१५४.
जो इस प्रकार के उपर के ये प्रावधान वाले पाशविक रीति-नीति के विधान वाले पोस्टर क्यो नही छपवाये?
(१) वर्णानुसार करने के कार्यः -
- महातेजस्वी ब्रह्मा ने स्रुष्टी की रचना के लिए ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र को भिन्न-भिन्न कर्म करने को तै किया हैं -
- पढ्ना,पढाना,यग्य करना-कराना,दान लेना यह सब ब्राह्मण को कर्म करना हैं. अध्यायः१:श्लोक:८७
- प्रजा रक्षण , दान देना, यग्य करना, पढ्ना...यह सब क्षत्रिय को करने के कर्म हैं. - अध्यायः१:श्लोक:८९
- पशु-पालन , दान देना,यग्य करना, पढ्ना,सुद(ब्याज) लेना यह वैश्य को करने का कर्म हैं. - अध्यायः१:श्लोक:९०.
- द्वेष-भावना रहित, आंनदित होकर उपर्युक्त तीनो-वर्गो की नि:स्वार्थ सेवा करना, यह शूद्र का कर्म हैं. - अध्यायः१:श्लोक:९१.
(२) प्रत्येक वर्ण की व्यक्तिओके नाम कैसे हो?:-
- ब्राह्मण का नाम मंगलसूचक - उदा. शर्मा या शंकर
- क्षत्रिय का नाम शक्ति सूचक - उदा. सिंह
- वैश्य का नाम धनवाचक पुष्टियुक्त - उदा. शाह
- शूद्र का नाम निंदित या दास शब्द युक्त - उदा. मणिदास,देवीदास
- अध्यायः२:श्लोक:३१-३२.
(३) आचमन के लिए लेनेवाला जल:-
- ब्राह्मण को ह्रदय तक पहुचे उतना.
- क्षत्रिय को कंठ तक पहुचे उतना.
- वैश्य को मुहं में फ़ैले उतना.
- शूद्र को होठ भीग जाये उतना, आचमन लेना चाहिए.
- अध्यायः२:श्लोक:६२.
(४) व्यक्ति सामने मिले तो क्या पूछे?:-
- ब्राह्मण को कुशल विषयक पूछे.
- क्षत्रिय को स्वाश्थ्य विषयक पूछे.
- वैश्य को क्षेम विषयक पूछे.
- शूद्र को आरोग्य विषयक पूछे.
- अध्यायः२:श्लोक:१२७.
(५) वर्ण की श्रेष्ठा का अंकन :-
- ब्राह्मण को विद्या से.
- क्षत्रिय को बल से.
- वैश्य को धन से.
- शूद्र को जन्म से ही श्रेष्ठ मानना.(यानी वह जन्म से ही शूद्र हैं)
- अध्यायः२:श्लोक:१५५.
(६) विवाह के लिए कन्या का चयन:-
- ब्राह्मण सभी चार वर्ण की कन्याये पंसद कर सकता हैं.
- क्षत्रिय - ब्राह्मण कन्या को छोडकर सभी तीनो वर्ण की कन्याये पंसद कर सकता हैं.
- वैश्य - वैश्य की और शूद्र की ऎसे दो वर्ण की कन्याये पंसद कर सकता हैं.
- शूद्र को शूद्र वर्ण की ही कन्याये विवाह के लिए पंसद कर सकता हैं.- (अध्यायः३:श्लोक:१३) यानी शूद्र को ही वर्ण से बाहर अन्य वर्ण की कन्या से विवाह नही कर सकता.
(७) अतिथि विषयक:-
- ब्राह्मण के घर केवल ब्राह्मण ही अतिथि गीना जाता हैं,(और वर्ण की व्यक्ति नही)
- क्षत्रिय के घर ब्राह्मण और क्षत्रिय ही ऎसे दो ही अतिथि गीने जाते थे.
- वैश्य के घर ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य तीनो द्विज अतिथि हो सकते हैं, लेकिन ...
- शूद्र के घर केवल शूद्र ही अतिथि कहेलवाता हैं - (अध्यायः३:श्लोक:११०) और कोइ वर्ण का आ नही सकता...
(८) पके हुए अन्न का स्वरुप:-
- ब्राह्मण के घर का अन्न अम्रुतमय.
- क्षत्रिय के घर का अन्न पय(दुग्ध) रुप.
- वैश्य के घर का अन्न जो है यानी अन्नरुप में.
- शूद्र के घर का अन्न रक्तस्वरुप हैं यानी वह खाने योग्य ही नही हैं.
(अध्यायः४:श्लोक:१४)
(९) शब को कौन से द्वार से ले जाए? :-
- ब्राह्मण के शव को नगर के पूर्व द्वार से ले जाए.
- क्षत्रिय के शव को नगर के उतर द्वार से ले जाए.
- वैश्य के शव को पश्र्चिम द्वार से ले जाए.
- शूद्र के शव को दक्षिण द्वार से ले जाए.
(अध्यायः५:श्लोक:९२)
(१०) किस के सौगंध लेने चाहिए?:-
- ब्राह्मण को सत्य के.
- क्षत्रिय वाहन के.
- वैश्य को गाय, व्यापार या सुवर्ण के.
- शूद्र को अपने पापो के सोगन्ध दिलवाने चाहिए.
(अध्यायः८:श्लोक:११३)
(११) महिलाओ के साथ गैरकानूनी संभोग करने हेतू:-
- ब्राह्मण अगर अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो सिर पे मुंडन करे.
- क्षत्रिय अगर अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो १००० भी दंड करे.
- वैश्य अगर अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो उसकी सभी संपति को छीन ली जाये और १ साल के लिए कैद और बाद में देश निष्कासित.
- शूद्र अगर अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो उसकी सभी संपति को छीन ली जाये , उसका लिंग काट लिआ जाये.
- शूद्र अगर द्विज-जाती के साथ अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो उसका एक अंग काटके उसकी हत्या कर दे.
(अध्यायः८:श्लोक:३७४,३७५,३७९)
(१२) हत्या के अपराध में कोन सी कार्यवाही हो?:-
- ब्राह्मण की हत्या यानी ब्रह्महत्या महापाप.(ब्रह्महत्या करने वालो को उसके पाप से कभी मुक्ति नही मिलती)
- क्षत्रिय की हत्या करने से ब्रह्महत्या का चौथे हिस्से का पाप लगता हैं.
- वैश्य की हत्या करने से ब्रह्महत्या का आठ्वे हिस्से का पाप लगता हैं.
- शूद्र की हत्या करने से ब्रह्महत्या का सोलह्वे हिस्से का पाप लगता हैं.(यानी शूद्र की जिन्द्गी बहोत सस्ती हैं)
- (अध्यायः११:श्लोक:१२६)
Wednesday, 28 January 2015
आरक्षण की आवश्यकता क्यों ?
१३ दिसम्बर १९४६ को प. जवाहरलाल नेहरू ने संविधान निर्माण के लिए आठ सूत्रीय उद्देश्य संकलप पत्र संविधान सभा समक्ष विचार करने के लिए प्रस्तुत किया। इस संकलप पत्र में प्रत्येक नागरिक को सामाजिक, आर्थिक न्याय देने के लिए देश की अर्थव्यवस्था क्या होगी तथा देश के उद्योग एवं जमीन का क्या होगा, कोई उल्लेख नहीं था। इस महत्वपूर्ण बिंदु को उद्देश्य संकलप पत्र में क्यों नहीं शामिल किया गया ? यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। उस समय ५६५ राजाओं ने राष्ट्र हित में अपनी रियासत का परित्याग किया और साधारण मनुष्य बनकर रहना स्वीकार किया। इस देश के उद्योगपतियों और जमींदारो को भी राष्ट्र हित में अपने उधोग और जमीन का परित्याग करना और साधारण बनकर रहना स्वीकार करना चाहिए था , परन्तु इन्होने ऐसा नहीं किया और इन्हे ऐसा करने के लिए बाध्य भी नहीं किया गया। उद्देश्य संकलप पत्र में इस महत्वपूर्ण बिंदु को शामिल न करके इन उद्योगपतियों के उद्योग और जमींदारो की जमीन की सुरक्षा की गयी। यहीं से आज़ाद भारत में आरक्षण की संकलपना का सूत्रपात होता है। क्योकि इस देश की ९५% भूमि ,१००% उद्योग और नौकरियां उच्च वर्ग के पास है। पिछड़ा वर्ग के पास मात्र ५% जमीन है। उद्योग व नौकरियां न के बराबर है। यदि आरक्षण की संकलपना न होती तो १००% नौकरियां भी उच्च वर्ग के ही पास होती। जमीन अयोग्यता के आधार पर और नौकरियां योग्यता के आधार पर। आज आरक्षण के बावजूद भी उच्च वर्ग के पास ८०% नौकरियां है।
आखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन राष्ट्रीय स्तर पिछड़ा वर्ग (SC, ST,OBC, NT,DNT, VJNT ) एव इनके अल्पसंख्यको को अपने अधिकारों के लिए जागरूक करने का कार्यक्रम चला रहा है
Tuesday, 27 January 2015
ब्रह्मिनो के सुरक्षा कवच जिनका प्रयोग करके वे पुरे समाज पैर हावी रहते है
ब्रह्मिनो के सुरक्षा कवच जिनका प्रयोग करके वे पुरे समाज पैर हावी रहते है
१-ऊँच-नीच ,छुआ-छूत आधारित अशंख्य जातिया - ये अपनी जाती में तो संघटित हो
सकती है मगर पिछड़ा वर्ग के रूप में संघ्तिः नहीं हो सकती है
२- पिछड़ा वर्ग का अपनी गरीबी को पूर्व जन्मो के कर्मो का परिणाम मानना - इसको दूर करने के लिए कोई ठोश कदम न उठाना -इससे इनकी प्रबल धरना बनी हुई है कि किसी की भी सरकार बने उसमे हमारी कोई रूचि नहीं है
३- पिछड़ा वर्ग के संपन्न एव नौकरी पेशा लोगो की उच्च वर्गों जैसी सोच - की यहाँ अमीरी गरीबी बनी रहेगी
४ -प्रगति शील उच्च वर्ग से नियंत्रित साम्यवादी और समाज वादी तथा पिछड़ा वर्ग के बहुत सारे संघटन जो अपने अहंकार के कारन पिछड़ा वर्ग के रूप में संघटित होने में अवरोध का कार्य करते है
५ राज्य सभा
६- न्यायपालिका
७ सेना
Monday, 26 January 2015
वामन अवतार के तीन पग :संरक्षण ,सत्ता और शिक्षा के अधिकारों से वंचित करना !
वामन पुराण की कहानी में विष्णु ने वामन ( बौना )के रूप में अवतार लिया था जिसमे कहा गया है कि वामन ने सश्री प्रथ्वी को तीन पग से नाप दिया था जब जघह नहीं मिली तो राजा बलि के सर पर पैर रख दिया था .साथियों कहानी का अर्थ है जिसका अर्थ हमको सही तरीके से जानना पड़ेगा जो इस प्रकार है
अर्यो के आगमन से सभी परिचित है अर्यो ने इस देश में आकार अपनी पहचान बनायीं देव के रूप में ,यहाँ के मूलनिवासियो कि पहन बनायीं दानव के रूप में ,अर्यो ने अपने को कहा देव ,सुर और हमें कहा दानव असुर और देव और दानव कि लडाई शरू कर दिया और एक व्यवस्था बनाया जिसे वर्ण वयस्था नाम दिया जिसमे १-ब्रहमिन २- क्षत्रिय ,२- वैश्य ,४- शुद्र यहाँ के मूलनिवासियो को चौथे वर्ण में रखा ,और बताया ब्रहमिन का धरम पढ़ना , पढाना,क्षत्रिय का धरम ,पढना ,राज करना मगर पढाना नहीं, वैश्य का धरम खेती,व्यापर ,और पढ़ना .मगर शुद्र का धरम तीनो वर्णों कि सेवा करना बताया
मगर शुद्रो के राजा बलि ने भुजाओ के बल पर अपना राज कायम किया और तीन कानून पास किये १- मेरे र्राज में वर्ण वयस्था नहीं चलेगी सब बराबर है कोई उच्च नीच नहीं होगी २- हर कोई हर काम कर सकता है २- कोई यज्ञ नहीं करेगा . ये तीनो कानून समानता स्थापित करने के लिए किये गये थे , किन्तु ब्राह्मणों ने कहा कि र्राजा बलि को अभिमान हो गया है जो भगवन कि बनायीं हुयी गैर बराबरी को नहीं मानता हम ब्रह्मिब श्रेष्ठ है और रहेंगे तो ब्राह्मणों ने अपना संघटन बनाना शरू कर दिया और राज्य के चारो और किले के रूप में यज्ञ शालाये बनाना शुरू कर दिया और षड़यंत्र के तहेत एक ब्रह्मिन को भिखारी का भेष बनाकर राजा के किर्या कलापों को जाचने के लिए दरबार में भेज दिया उसने राजा को नयाय करते देखा और उसकी बचंबद्ता को समन्झ कर उसने भी कुछ माँगा और कहा मुझे भी कुछ दे दो राजा ने कहा मांगो भिखारी ने कहा पहले बचन दो राजा बचन के पक्के थे कहा तथास्तु मंत्री ने मना था ,राजा जबान के पक्के थे
भिखारी (ब्रह्मिन ) ने कहा हमें हमरी यागशाला दे दो , राजा ने कहा तथास्तू ,मंत्री से राजा ने कहा इनको इनकी यज्ञ शाला दे दो आगे आगे ब्रह्मण चला अपनी यज्ञ शाला लेने के लिए पीछे मंत्री जब एक यागशाला दिया तो मंत्री ने पूछा कितनी याग शाला है ब्रह्मण ने कहा जब राजा ने नहीं पूछा तो आप क्यों पूछ रहे हो तो आगे आगे ब्रह्मिन यागशाला लेता चलता रहा पीछे -२ ब्राह्मणों कि फ़ौज चल दी तो इस प्रकार से राजा का सरक्षण चला गया , सरक्षण के बिना सत्ता चली गयी तो सत्ता के बिना सिक्षा चली गयी
तो इस प्रकार कहानी को लिखा गया कि तीन पग में धरती आकाश पाताल नाप दिया था बल्कि ये तीन पग
१-सरक्षण २-सत्ता ३-शिक्षा समाप्त करना और लोगो को पता न चले कहानी ल्लिख दिया क्योकि शुद्रो को शिक्षा का अधिकार नहीं था उनकी समझ नहीं थी तब उसने लिखा किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले वहा ये मंत्र बोल कर संकल्प करवाता है
येंबधो बलिराजा दनेंद्रोमाहबाला ,तेंत्वाम प्रतिबंधामी माचाल्माचाल्म
यानि तुम्हरे राजा बलि जो दान और वेद में महाबली थे उनको मैंने बचन बध करके गुलाम बनाया है ठीक उसी प्रकार आप को भी गुलाम बना रहा हु शांत रहो क्रमशा....... age
Friday, 16 January 2015
देश में पहला स्कूल खोलनेवाले राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीआई के कार्य अतुलनीय हैं । जहां पूरे sc,st,obc,and converted minorities को एज्युकेशन लेने का अधिकार नहीं था वहां उसकी शुरुआत कर सभी बंधनो को तोडनेवाले महात्मा फुले और सावित्रीआई विश्वरत्न हैं. सावित्रीआई के योगदान की जितनी बातें करें उतनी कम हैं. ब्राम्हणो की गालियां, उन्होनें फेके हूए पत्थर झेलकर उन्होंने अपना कार्य किया। इस कार्य की वजह से राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीआई को घर से निकाल दिया गया लेकिन फिर भी उन्होंने इसे अंजाम तक पहूँचाया. सावित्रीआई देश की पहली शिक्षिका हैं।
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