Friday, 20 December 2013
पिछड़ा वर्ग को हाई कोर्ट एव सुप्रीम कोर्ट में भी उनकी आबादी के अनुसार समुचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए
पिछड़ा वर्ग को हाई कोर्ट एव सुप्रीम कोर्ट में भी उनकी आबादी के अनुसार समुचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए क्योकि न्यायपालिका में बैठे एक वर्ग विशेष के न्यायधिशो ने पिछड़ा वर्ग के सवैधानिक अधिकारों के साथ न्याय नहीं किया है और पिछड़ा वर्ग अब इनसे न्याय की उम्मीद नहीं कर सकता . संविधान के किसी भी अनुच्छेद में आरक्षण में ५०% का अवरोध लगाने का कोई प्राविधान नहीं है फिर भी न्यापालिका ने संविधान की भावनाओ की उपेक्षा करते हुए आरक्षण में ५०% का अवरोध लगा दिया .इसी प्रकार संविधान के किसी भी अनुच्छेद में क्रीमीलेयर लगाने का कोई प्राविधान नहीं है फिर भी न्यायपालिका ने क्रीमीलेयर लगा दिया . संविधान का अनुच्छेद १६(४) गरीबी उन्मूलन का अनुच्छेद नहीं है. गरीबी उन्मूलन का अनुच्छेद ४१ ४३ और 46 है जिसकी ६२ वर्षो से उपेक्षा की जा रही है . अनुच्छेद १६(४) सामाजिक न्याय के लिए प्रशासन और न्यायपालिका में समुचित भागीदारी का अनुच्छेद है जिसके अंतर्गत पदों और नियुक्तियों में आरक्षण की बात कही गयी है चाहे वे सीधी भर्ती से भरे जाये या पदोन्नति से या परामर्श की प्रक्रिया से .फिर भी न्यायपालिका ने १९९२ में इंदिरा सहनी बनाम भारत संघ के वाद में अनुसूचित जातियों के प्रमोशन में आरक्षण को समाप्त कर दिया इसलिए की कही अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग भी पदोन्नति में आरक्षण की मांग न करने लगे . इसके अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट के बहुत सारे ऐसे निर्णय है जिसके माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़ा वर्ग के साथ न्याय नहीं किया है सेना में भी पिछड़ा वर्ग को उनकी आबादी के अनुसार कमांडिंग पदों पर नियुक्त किया जाये . इस देश का एक खास वर्ग ही देश नहीं है जिसके जिम्मे देश की रक्षा करने का तथा देश को आगे ले जाने का भार है .इस देश का ८५% पिछड़ा वर्ग (SC ,ST,OBC ,CM ) भी देश है और पिछड़ा वर्ग की उपेक्षा करना देश की उपेक्षा करना है
Wednesday, 18 December 2013
डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर का ओबीसी समुदाय को क्या प्रदान है
जो ओबीसी तथागत बुध्ध, संत कबीर और महात्मा जोतिबा फुले को नहीं जानता उस के लिए भारत के राष्ट्रिय नेता डो. बाबा साहेब आम्बेडकर को जानना, समजना और मानना मुश्किल है.
मानवता के उत्थान के लिए जो कार्य तथागत बुध्ध, संत कबीर और महात्मा जोतिबा ने किया, वोही कार्य डो.बाबासाहेब ने आगे बढाया था.
एक बड़ा भ्रम ओबीसी समुदाय के बुध्धिजिवियो और पढ़े-लिखे शिक्षितों में फैला हूवा है कि, डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर अछूत मानी गई महार जाती में जन्मे थे इसलिये उन्होंने दलित-एससी समुदाय के उत्थान लिए ही कार्य किया किया है. वास्तव मे डो बाबा साहेब आम्बेडकर हमारे राष्ट्रीय नेता थे.
इस भ्रम फेलने के पीछे मिडिया का बड़ा रोल है और जिसके हाथ में सार्वजनिक पुस्तकालयों का कारोबार रहा है, ऐसे उच्च वर्ण जातियों के संचालको का भी बड़ा रोल है, क्योकि ऐसे पुस्तकालयों में डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर के जीवनचरित्र कि किताबे उपलब्ध नहीं कराइ जाती थी. किताबे पढने का मुज़े शोख होते हुवे भी डॉ. बाबा साहेब का जीवन चरित्र पढने को नहीं मिला था.
1991 में मुझे "मंडल आयोग रिपोर्ट" की हिंदी किताब मिली, जिसका प्रकाशन बामसेफ संगठन ने किया था. 1991 में डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर की जीवनी की दो किताबे पढने में आयी और पता चला की आधुनिक विश्व के एक महान पुरुष के बारे में मुझे पर्याप्त जानकारी नहीं थी.
आज 2013 में भी ओबीसी के बुध्धिजिवियो और शिक्षितों को ये पता नहीं है कि बाबा साहेब ने ओबीसी समुदाय के लिए क्या किया है ? हम देखेंगे कि, बाबा साहेब ने ओबीसी समुदाय, जिस की देश में 54% से भी अधिक जनसँख्या है उसके उत्थान के लिए क्या किया है?
(1) 1928 में बोम्बे सरकार ने स्टार्ट कमिटी नियुक्त कि थी जिसमे डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर ने Other backward caste यानि कि OBC शब्द का उपयोग किया था. स्टार्ट कमिटी में बाबा साहेब ने कहा था कि, जो जातिया अपर कास्ट और बेकवर्ड के बिच में आती है ऐसी जातियां अन्य पिछड़ी जाति यानी कि OBC-ओबीसी है.
(2) देश की संविधान सभा में सिर्फ 6 ही ओबीसी सदस्य थे. जिसकी आवाज ब्राह्मण सदस्यों ने दबा कर रख दी थी लेकिन डॉ. बाबा साहेब के कारण ही कलम 340 का प्रावधान करना पडा और जिनके फलस्वरूप "काका कालेलकर आयोग" (1953-55) तथा "मंडल आयोग" (1978-80) की रचना केन्द्र सरकार को करनी पड़ी थी. दोनों आयोग ओबीसी के लिए थे लेकिन अफसोसजनक है की ओबीसी समुदाय के 99% शिक्षितों को इसके बारे में पता नहीं है.
(3) 1951 में अपने कानून मंत्री पद से इस्तीफा देते हुवे पत्र में बाबा साहेब ने इस्तीफा का दूसरा कारण ओबीसी जातियों के लिए आयोग की नियुक्ति नहीं करना और ओबीसी की उपेक्षा करना बताया था. क्या ओबीसी के संवैधानिक अधिकारों को लागु करने के लिए 1947 से 2013 तक राज्य या केन्द्र सरकार के कोई मंत्री ने इस्तीफा दिया है ?
डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर के इस्तीफा के कारण ही दबाव में आकर नहेरू सरकार को ओबीसी के लिए "काका कालेलकर आयोग" की रचना करनी पड़ी थी. 1952 की लोकसभा में 52% से ज्यादा ओबीसी-समुदाय के सांसदों सिर्फ 4.39% ही थे. बाबासाहेब ही थे जिन्होंने ओबीसी(शुद्र), एससी-एसटी(अति शुद्र) और महिलाओं के उत्थान के किया आजीवन संघर्ष किया था. उनको दलितो के उद्धारक के रूप में सिमित कार देना क्या एक षडयंत्र नहीं है ?
14-एप्रिल के दिन डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर की जन्म जयंती आती है उसमे ओबीसी जातियों के बुध्धिजिवियो और शिक्षितों को अवश्य सामिल होना चाहिए. क्यों की बाबा साहेब एक सच्चे भारतीय राष्ट्रवादी थे जिन की उपेक्षा हम अगर राष्ट्रवादी और मानवतावादी है तो नही कर सकते.
Sunday, 8 December 2013
ब्राह्मण को पता है की, जब तक उसने ''हिन्दू'' नाम की चादर ओढ़ी है तब तक ही ,उसका वर्चस्व भारत पर है
ब्राह्मण को पता है की, जब तक उसने ''हिन्दू'' नाम की चादर ओढ़ी है तब तक ही ,उसका वर्चस्व भारत पर है ,इसीलिए ब्राह्मण दिन रात हिन्दू हिन्दू रटते रहता है,जब की ब्राह्मण यह जानता है की ,हिंदू नाम का कोई धर्म नही है ...हिन्दू फ़ारसी का शब्द है । हिन्दू शब्द न तो वेद में है न पुराण में न उपनिषद में न आरण्यक में न रामायण में न ही महाभारत में । स्वयं दयानन्द सरस्वती कबूल करते हैं कि यह मुगलों द्वारा दी गई गाली है । 1875 में ब्राह्मण दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की हिन्दू समाज की नहीं । अनपढ़ ब्राह्मण भी यह बात जानता है । ब्राह्मणो ने स्वयं को हिन्दू कभी नहीं कहा । आज भी वे स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं लेकिन सभी शूद्रों को हिन्दू कहते हैं । जब शिवाजी हिन्दू थे और मुगलों के विरोध में लड़ रहे थे तथा तथाकथित हिन्दू धर्म के रक्षक थे तब भी पूना के ब्राह्मणो ने उन्हें शूद्र कह राजतिलक से इंकार कर दिया । घूस का लालच देकर ब्राह्मण गागाभट्ट को बनारस से बुलाया गया । गगाभट्ट ने "गागाभट्टी" लिखा उसमें उन्हें विदेशी राजपूतों का वंशज बताया तो गया लेकिन राजतिलक के दौरान मंत्र "पुराणों" के ही पढे गए वेदों के नहीं ।तो शिवाजी को हिन्दू तब नहीं माना । ब्राह्मणो ने मुगलों से कहा हम हिन्दू नहीं हैं बल्कि तुम्हारी तरह ही विदेशी हैं परिणामतः सारे हिंदुओं पर जज़िया लगाया गया लेकिन ब्राह्मणो को मुक्त रखा गया । 1920 में ब्रिटेन में वयस्क मताधिकार की चर्चा शुरू हुई । ब्रिटेन में भी दलील दी गई कि वयस्क मताधिकार सिर्फ जमींदारों व करदाताओं को दिया जाए । लेकिन लोकतन्त्र की जीत हुई । वयस्क मताधिकार सभी को दिया गया । देर सबेर ब्रिटिश भारत में भी यही होना था । तिलक ने इसका विरोध किया । कहा " तेली,तंबोली ,माली ,कूणबटो को संसद में जाकर क्या हल चलाना है" । ब्राह्मणो ने सोचा यदि भारत में वयस्क मताधिकार यदि लागू हुआ तो अल्पसंख्यक ब्राह्मण मक्खी की तरह फेंक दिये जाएंगे । अल्पसंख्यक ब्राह्मण कभी भी बहुसंख्यक नहीं बन सकेंगे । सत्ता बहुसंख्यकों के हाथों में चली जाएगी । तब सभी ब्राह्मणों ने मिलकर 1922 में "हिन्दू महासभा" का गठन किया । जो ब्राह्मण स्वयं हो हिन्दू मानने कहने को तैयार नहीं थे वयस्क मताधिकार से विवश हुये । परिणाम सामने है । भारत के प्रत्येक सत्ता के केंद्र पर ब्राह्मणो का कब्जा है । सरकार में ब्राह्मण ,विपक्ष में ब्राह्मण ,कम्युनिस्ट में ब्राह्मण ,ममता ब्राह्मण ,जयललिता ब्राह्मण 367 एमपी ब्राह्मणो के कब्जों में है । सर्वोच्च न्यायलयों में ब्राह्मणो का कब्जा ,ब्यूरोक्रेसी में ब्राह्मणो का कब्जा ,मीडिया ,पुलिस ,मिलिटरी ,शिक्षा ,आर्थिक सभी जगह ब्राह्मणो का कब्जा है । एक विदेशी गया तो दूसरा विदेशी सत्ता में आ गया । हम अंग्रेजों के पहले ब्राह्मणो के गुलाम थे अंग्रेजों के जाने के बाद भी ब्राह्मणो के गुलाम हैं । यही वह हिन्दू शब्द है जो न तो वेद में है न पुराण में न उपनिषद में न आरण्यक में न रामायण में न ही महाभारत में । फिर भी ब्राह्मण हमें हिन्दू कहते हैं ।
http://www.ncbc.nic.in/
By: National obc federation
Subscribe to:
Posts (Atom)


