राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले की जयंति"*_पर
*"देश की प्रथम महिला शिक्षिका को नमन"*
*"महिला सशक्तिकरण की मूर्ति को प्रणाम"*
*"विधवाओं व बालिकाओं की पैरोकार"*
*"गरीबों व अनाथों की अभिभावक"*_
*"महान समाजसेवी व विद्वान लेखिका"*
*"के 03.01.1831-10.03.1897 के जीवन"*
की परोपकारी गौरवशाली जीवनगाथा"*
संघर्षों का इतिहास विपरित परिस्थितियों व विकट समस्याओं की पथरीली पगडंडियों पर सफलतापूर्वक चलकर ही लिखा जा सकता है....
देश के मूलनिवासियों के विरूद्ध अत्याचारों और साजिशों का दौर भारत में विदेशी आर्यों यानि ब्राह्मणों के आगमन से ही शुरू होता है....
पराजित प्रजा को गुलाम बनाने के लिए उनके मानवाधिकार छीनकर उन्हें मूलभूत सुविधाओं से वंचित करके असहाय और कमजोर बना दिया जाता है और ऐसा ही भारत के द्रविड़ों यानि मूलनिवासियों के साथ हजारों सालों से होता आ रहा था और वर्तमान में भी अनेकों स्थानों पर आज भी बदस्तूर जारी है....
जिस असमानता और अन्याय वाले पेशवाई ब्राह्मणवादी दौर में ब्राह्मण कथित शूद्रों को लिखने-पढ़ने, अच्छा रहने-पहनने, पक्के मकानों में रहने, सड़क पर चलने का अधिकार नहीं था और जाति के आधार पर गले में हांडी व कमर में झाडू बांधकर चलना पड़ता था, ऐसे बदमाश और बदमिजाजी पेशवाई कुशासन में शूद्रों का जीवन नारकीय था....
विदेशी आर्य अर्थात ब्राह्मण उस अमानवीय दौर में कुनबी, कोईरी, तेली, कहार, ग्वाला, माली, बढ़ई, लोहार, सोनार, ठठेरा, कसेरा, योगी, ततवा, तमोली आदि सभी पिछड़ी जातियों को शूद्र कहते थे। जिस दौर में सारे श्रमजीवी, खेतिहर मजदूर, गौपालकों की यह दुर्गति थी, तब उस दौर में लड़कियों और औरतों की दुर्गति की तो कोई सीमा ही नहीं थी....
पेशवाइयों का कानून बहुत बर्बरतापूर्ण था जो शूद्रों के साथ-साथ महिलाओं के विरूद्ध भी था। परिवार में पुत्री का जन्म होना अशुभ माना जाता था। स्त्रियों को दोयम दर्जे का दर्जा दिया जाता था। कन्या परिवार का भार समझी जाती थी। परिवार में कन्या के जन्म होते ही उसके विवाह करने की चिंता हो जाती थी। 09 वर्ष तक की आयु तक लड़की की शादी करनी पड़ती थी। धर्म शास्त्रों के अनुसार स्त्री को शिक्षित करना सामाजिक अपराध था। किसी भी स्थिति में स्त्री व शूद्र को ज्ञान नहीं देना और शिक्षित नहीं करने की कुत्सित व्यवस्था थी।
उस दुर्दांत काल में महाराष्ट्र राज्य के सतारा जिले के खंडाला तहसील के नयागांव में माली जाति के खांडोजी नेवसे पाटिल के परिवार में राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले का जन्म 03 जनवरी, 1931 को हुआ था। उनके जन्म पर परिवार में खुशियां जबरदस्त मनाई गई थी।
माता सावित्रीबाई फुले के पिताजी पेशवाई शासन में कार्य करते थे और इसी कारण पेशवाइयों का आदेश मानना उनकी मजबूरी थी। इसी मजबूरी के कारण माता सावित्रीबाई फुले की शादी महान क्रांतिकारी, समाजसुधारक और विद्वान शिक्षक महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ में सन् 1940 में मात्र 09 साल की आयु में कर दी गई।
*शिक्षा :----* माता सावित्रीबाई फुले को उनके पति महात्मा ज्योतिबा फुले ने मिट्टी व बालू रेत पर लिख-लिखकर शिक्षित किया था।
*परिवार से निष्कासन :----* महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को पढ़ाने का ब्राह्मणों ने कड़ा विरोध किया और महात्मा ज्योतिबा फुले के पिताजी गोविंदराव फुले पर अपने पुत्र को पत्नी व महिलाओं को शिक्षित नहीं करने का दबाव बनाया, परंतु महात्मा ज्योतिबा फुले इसके लिए तैयार नहीं थे और अंततः महात्मा ज्योतिबा फुले व सावित्रीबाई फुले को घर से बाहर निकाल दिया गया।
*विद्यालय व महाविद्यालय :----* पेशवाई काल में 90% जनता मानसिक गुलाम थी और 95% जनता अशिक्षित थी जिन्हें शिक्षा का कोई अधिकार नहीं था। सावित्रीबाई फुले ने अपनी सहेली फातिमा शेख के साथ मिलकर पहला कन्या विद्यालय खुला जिसमें 6 छात्राओं का प्रवेश हुआ। इसके बाद एक-एक करके माता सावित्रीबाई फुले ने कन्याओं के लिए 18 विद्यालय और महाविद्यालय खोले तथा पति-पत्नी दोनों ने मिलकर कुल 71 विद्यालय में महाविद्यालय खोलें।
*नि:शुल्क शिक्षा :----* इनके द्वारा खोले गए सभी विद्यालयों व महाविद्यालयों में छात्र छात्राओं को निशुल्क शिक्षा देने की व्यवस्था की गई।
*अपमान व तिरस्कार :----* कट्टरपंथी ब्राह्मणों को सावित्रीबाई फुले के द्वारा महिलाओं को शिक्षित करना बिल्कुल भी रास नहीं आ रहा था, इसीलिए उन्होंने सावित्रीबाई फुले का अपमान व तिरस्कार करने के लिए महिलाओं व नासमझ लोगों को भड़काया गया। जब सावित्रीबाई फुले स्कूल जाया करती थी, तो रास्ते में महिलाएं उन्हें गालियां देती थी, अपशब्द बोलती थी, उनके ऊपर गोबर, राख, धूल, गंदा पानी फेंका करती थी जिसके कारण सावित्रीबाई फुले के कपड़े गंदे हो जाते थे और स्कूल जाकर अपने साथ ले जाने वाली दूसरी साड़ी पहना करती थी। एक बार ब्राह्मणों में दो युवकों को सावित्रीबाई फुले को पीटने के लिए भेजा, तो सावित्रीबाई फूले ने उन युवकों का जबरदस्त मुकाबला किया और उनकी पिटाई करके उनको भगा दिया।
*प्रथम प्रसूति ग्रह व अनाथालय :----* सन् 1853 में देश में प्रथम प्रसूति व अनाथालय खोलने का श्रेय भी माता सावित्रीबाई फुले को ही जाता है। रूढ़िवादी परंपराओं के कारण बच्चियों की शादी बचपन में ही कर दी जाती थी। बाल विवाह के कारण समाज में बाल विधवाएं बहुत हुआ करती थी। पेशवाई युवक उन लड़कियों के साथ में जबरदस्ती संबंध बनाकर उन्हें गर्भवती कर दिया करते थे जिसके कारण वे गर्भवती महिलाएं या तो अपना गर्भपात करवाती थी और यदि गर्भपात कराने में असफल हो जाती थी, तो ऐसी स्थिति में आत्महत्या कर लिया करती थी। इन्हीं विषम परिस्थितियों से महिलाओं को उभारने के लिए माता सावित्री बाई फुले ने प्रसूति गृह व अनाथालय की व्यवस्था की थी जिसमें गर्भवती महिलाएं अपने बच्चों को जन्म देकर छोड़ जाया करती थी और फिर उन बच्चों की देखभाल महात्मा ज्योतिबा फुले व सावित्रीबाई दोनों मिलकर किया करते थे।
*रात्रि पाठशाला :----* जब माता सावित्री बाई का ध्यान गरीब मजदूर और उनकी औरतों की ओर गया, तो उन्हें शिक्षित करने के लिए माता सावित्रीबाई फुले ने पुणे के मोहल्लों में रात्रि पाठशाला एक खोली और गरीब मजदूरों और उनके परिवार की महिलाओं को पढ़ाने का काम किया।
*अछूतों के लिए कुआं खुदवाया :----* घनघोर छुआछूत के कारण शूद्रों को कुआं तालाब और पोखर से पानी लेना अपराध था। उनके छूने से कुआं या तालाब या पोखर का पानी अपवित्र हो जाता था। ऐसा करने पर शूद्रों को मार दिया जाता था। इस भय के कारण वो लोग कुओं, तालाबों व पोखरों से पानी लेने की हिम्मत नहीं करते थे। शूद्र कुआं, तालाब या पोखर पर अपना घड़ा लेकर बैठे रहते थे। कोई दया करके उनके घड़ों में पानी डाल देते थे, तब वह पानी पीते थे या अपने बच्चों की प्यास बुझाते थे। पानी के अभाव में शूद्र प्यास से मरने के लिए विवश हो जाते थे। कुएं के पानी के अभाव में अछूत किसी गंदे खड्डे से पानी लेकर पी लेते थे, तब वे बीमार होकर मर जाते थे। ऐसी विकराल स्थिति ब्राह्मणों ने नियम बनाकर कर रखी थी। इस नरकभरी जिंदगी से बचाने के लिए माता सावित्रीबाई फुले ने शूद्रों के लिए एक कुआं खुदवाया, जहां से वे अपने लिए पीने का पानी भर सकते थे।
*बाल विवाह पर रोक लगाई :----* धार्मिक परंपराओं के कारण बच्चियों का 09 वर्ष की आयु तक विवाह कर दिया जाता था जिसके कारण उनका शरीर विवाह योग्य पूरी तरह से विकसित नहीं होता था और बच्चियां मौत के ग्रास में चली जाती थी। इस त्रासदी को देखकर सावित्रीबाई फुले ने बाल विवाह पर रोक लगाने का आंदोलन किया और उसमें वह सफल हुई।
*पुनर्विधवा विवाह शुरू किया :----* ब्राह्मणों ने यह भी धार्मिक परंपरा बना रखी थी कि बालकों का विवाह 10 वर्ष की आयु तक कर दिया जाए। इस कारण कई बालक छोटी उम्र में ही मौत के मुंह में चले जाया करते थे और बचपन में शादी होने के कारण बालिकाएं बहुत बड़ी संख्या में विधवा हो जाया करती थी। इस परंपरा का विरोध करते हुए माता सावित्रीबाई फुले ने विधवा का पुनर्विवाह कराने का आंदोलन किया और विधवाओं को पुनर्विवाह करने का अधिकार दिलवाया।
*महान नर्स :----* वर्ष 1876-77 में पुणे शहर जबरदस्त अकाल की चपेट में आ गया था। सावित्रीबाई फुले व महात्मा ज्योतिबा फुले की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, फिर भी दोनों ने अकाल का सामना करने की ठानी और धनी लोगों से धन व अन्न मांगकर पीड़ितों को राहत पहुंचाने का संकल्प लिया। इस संकल्प के बाद में दोनों पति-पत्नी धनाढ्य लोगों से अन्न व धन लेकर अकाल क्षेत्र में जाकर राहत सामग्री बांटते थे। इन्होंने अकाल पीड़ितों के लिए 52 राहत शिविर भी बनाए थे।
*शराब नहीं पीने का आंदोलन :----* शराब के कारण समाज की दुर्गति को माता सावित्रीबाई ने करीब से देखा था और इस शराब की लत को छुड़ाने के लिए माता सावित्रीबाई ने महिलाओं के साथ मिलकर आंदोलन चलाया और उनके पुरुषों और बच्चों को समझाया जिसके कारण हजारों की तादात में लोगों सावित्रीबाई फुले के कहने में शराब पीना छोड़ दिया था।
*ब्राह्मणवादी विवाह पद्धति का विरोध :----* महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने ब्राह्मणों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए शूद्रों को ब्राह्मणों से विवाह संस्कार कराने के लिए मना किया। उनसे किसी भी प्रकार के संस्कार कराने के लिए मना किया। उन्होंने विवाह में किसी भी संस्कृत के मंत्र का पढ़ने पर रोक लगाई। उन्होंने मुहूर्त के बिना किसी भी निर्धारित तारीख को शादी करनी पर जोर दिया। उन्होंने ब्राह्मणों से विवाह करवाने के लिए रोक लगाई। उन्होंने विवाह में मांसाहार नशापन का विरोध किया।
*महान लेखिका :----* माता सावित्रीबाई फुले ने 06 साहित्य सर्जन किया और काव्य रचना भी की। उनके द्वारा सृजित साहित्य जनजागरण का साहित्य है। सावित्रीबाई फुले द्वारा सर्जित साहित्य में दीन-दुखियों की पीड़ा और उससे उबरने का मार्गदर्शन भरा पड़ा है। अधिकार चेतना को उनके साहित्य की पंक्ति-पंक्ति में पिरोया हुआ है।
*सत्यशोधक समाज :----* महात्मा ज्योतिबा फुले के द्वारा सन् 1873 में गठित सत्यशोधक समाज में माता सावित्रीबाई फुले ने बहुत अहम भूमिका निभाई और महात्मा ज्योतिबा फुले के परिनिर्वाण के बाद सावित्रीबाई फुले ने सत्यशोधक समाज का सफल नेतृत्व किया।
*मनुस्मृति का विरोध :----* सत्यशोधक समाज की बैठकों में मनुस्मृति सहित ब्राह्मणवादी ग्रंथों पर खुलकर विचार-विमर्श किया जाता था और फुले दम्पति का दावा था कि आने वाले समय में लोग मनुस्मृति व ग्रंथों को कूड़ादान में फेंकेंगे या फिर जला देंगे....
*परिनिर्वाण :----* माता सावित्रीबाई फुले गरीबों की सेवा करने में दिन-रात लगे रहती थी। उस समय हैजा और प्लेग दो महामारियां हुआ करती थी। इन दोनों महामारियों से परिवार के परिवार मौत के आगोश में चले जाते थे। माता सावित्रीबाई फुले सेवा करने में जरा भी नहीं घबराती थी और और ना थकती थी। उनको रोगियों की गंदगी साफ करने में घिन नहीं आती थी। मार्च, 1897 में पुणे के इनके इलाके में प्लेग की महामारी फैल गई थी। अनेक लोग प्ले की चपेट में आ गए थे। माता सावित्रीबाई फुले ने रोगियों को बचाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दी और दुर्भाग्यवश माता सावित्रीबाई फुले प्लेग की शिकार हो गई और *इस प्रकार महान समाजसेविका राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले का 10 मार्च, 1897 को परिनिर्वाण हो गया....*
*राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले व उनके महान योगदान को हम कोटि कोटि नमन करते हैं....🙏🙏*
डॉ जी सिंह कश्यप
प्रोफेसर पी जी कॉलेज गाजीपुर