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Friday, 27 July 2012

केंद्र सरकार और राज्य सरकारों का पिछड़ा वर्ग के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया

सदियों सामाजिक न्याय से वंचित पिछड़ा वर्ग (SC ,ST,OBC ,CM  ) के सामाजिक न्याय हेतु बाबा साहेब डॉ भीम राव आंबेडकर के तर्कपूर्ण दबाव में भारतीय संविधान में बहुत  सारे प्राविधान बनाये गए . भारत का संविधान लागु हुए लगभग ६२ वर्ष बीत चुके है मगर इन प्राविधानो को  अब तक लागू नहीं किया गया . उनको लागु करने में भी उपेक्षा बरती गयी मगर अब यह पिछड़ा वर्ग इस उपेक्षा को सहन करने के लिए तैयार  नहीं है . यदि भारत सरकार, राज्य सरकारे आगे भी उपेक्षात्मक रवैया अपनाती रही तो यह पिछड़ा वर्ग इस देश में बहुत  बड़ा   जन आन्दोलन करने के लिए बाध्य होगा  
  प्रशासनिक सेवाओ में वर्षो से रिक्त पड़े  पदों को तत्काल भरा जाये और उनमे  पिछड़ा वर्ग को उनकी आबादी के अनुसार समुचित  प्रतिनिधित्व दिया जाये . पिछड़ा वर्ग को हाई कोर्ट एव सुप्रीम कोर्ट में भी उनकी आबादी के अनुसार समुचित  प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए क्योकि न्यायपालिका में बैठे एक वर्ग विशेष के न्यायधिशो ने पिछड़ा वर्ग के सवैधानिक अधिकारों के साथ न्याय नहीं किया है और पिछड़ा वर्ग अब इनसे न्याय की उम्मीद नहीं कर सकता . संविधान के किसी  भी अनुच्छेद  में आरक्षण में ५०% का अवरोध लगाने का कोई प्राविधान नहीं है फिर भी न्यापालिका ने  संविधान की भावनाओ की उपेक्षा करते हुए आरक्षण में ५०% का अवरोध लगा दिया .इसी प्रकार संविधान के किसी   भी अनुच्छेद में क्रीमीलेयर  लगाने का कोई प्राविधान नहीं है फिर भी न्यायपालिका ने क्रीमीलेयर  लगा दिया . संविधान का अनुच्छेद १६(४) गरीबी  उन्मूलन का अनुच्छेद नहीं है. गरीबी  उन्मूलन  का अनुच्छेद ४१   ४३ और 46 है जिसकी  ६२ वर्षो से उपेक्षा की जा रही   है . अनुच्छेद १६(४) सामाजिक न्याय के लिए प्रशासन और न्यायपालिका में समुचित   भागीदारी  का अनुच्छेद है जिसके अंतर्गत पदों और नियुक्तियों  में आरक्षण की बात  कही गयी है चाहे वे सीधी भर्ती से भरे जाये या पदोन्नति से या परामर्श की प्रक्रिया से .फिर भी न्यायपालिका ने १९९२ में इंदिरा सहनी बनाम भारत  संघ के वाद में अनुसूचित जातियों के प्रमोशन में आरक्षण को समाप्त कर दिया इसलिए की कही अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग भी पदोन्नति में आरक्षण की मांग न करने लगे  . इसके   अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट के बहुत सारे ऐसे निर्णय है जिसके माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़ा वर्ग के साथ न्याय नहीं किया है 
      सेना में भी पिछड़ा वर्ग को उनकी आबादी के अनुसार कमांडिंग पदों पर नियुक्त किया जाये . इस देश का एक खास वर्ग ही देश नहीं है जिसके जिम्मे देश की रक्षा करने का तथा देश को आगे ले जाने का भार है .इस देश का ८५% पिछड़ा वर्ग (SC ,ST,OBC ,CM  ) भी देश है और पिछड़ा वर्ग की उपेक्षा करना देश की उपेक्षा करना है उत्तर प्रदेश में १९७७ से पिछड़ा वर्ग के सरकारे बनने का क्रम जरी है मगर पिछड़ा वर्ग की इन सरकारों ने पिछड़ा वर्ग के लिए संविधान की भावनाओ के अनुरूप कोई कार्य नहीं किया क्योकि  ये सरकारे उच्च  वर्ग के नियंत्रण में कार्य करती रही है  जिसका मुखिया पिछड़ा वर्ग का रहा है और नियंत्रण उच्च वर्ग का . पिछड़ा वर्ग की सरकारे ये जान ले की यदि पिछड़ा वर्ग को उनकी आबादी के अनुसार न्यायपालिका  और प्रशासन में समुचित भागीदारी नहीं मिलती है तो यह पिछड़ा वर्ग इनके खिलाफ भी जनांदोलन तैयार करेगा 
       पिछड़ा वर्ग के सामाजिक न्याय हेतु जनगरण करने के लिए  समर्पित "पिछड़ा वर्ग की आवाज" हिंदी मासिक पत्रिका का विमोचन इलाहबाद  हाई कोर्ट   के न्यायमूर्ति   माननीय आर ० सी ० दीपक  ने किया है जिसका मै (डॉ जी सिंह कश्यप ) प्रधान संपादक हूँ ,और अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएसन का राष्ट्रीय अध्यक्ष हूँ .

  " पिछड़ा वर्ग की आवाज" हिंदी मासिक पत्रिका  के सम्पादकीय  से साभार 

पिछड़ा वर्ग ( SC , ST , OBC , CM )के मतदाताओ से अपील !!!

पिछड़ा वर्ग ( SC ,  ST ,  OBC , CM  ) के मतदाताओ से अपील है कि अपने हक़ और अधिकारों को पाने के लिए विधायको ,सांसदों /जनप्रतिनिधियों को विधान सभा और संसद में निम्न लिखित बिन्दुओ को उठाने के लिए बाध्य करे :--
  • १- केंद्रीय एन प्रांतीय मंत्री परिषदों   में पिछड़ा वर्ग को उनकी आबादी के अनुसार ८५ % प्रतिनिधित्व     सुनिश्चित   किया जाये .
  • 2 हाई कोर्ट एव सुप्रीम कोर्ट  में पिछड़ा वर्ग का ८५% प्रतिनिधित्व   सुनिश्चित   किया जाये .
  • ३- सेना के उच्च कमांडिंग पदों पर पिछड़ा वर्ग को ८५% प्रतिनिधित्व  सुनिशचित    किया जाये .
  • ४- सभी प्रशासनिक पदों पर पिछड़ा वर्ग की तैनाती उनकी आबादी के अनुसार तत्काल कि जाये .
  • ५- समाज कल्याण विभाग में उच्च वर्ग के अधिकारियो /कर्मचारियों की तैनाती न की जाये .
  • ६- OBC  को भर्ती और प्रोन्नति में उनकी आबादी के अनुसार ५२.५ % आरक्षण दिया जाये .
  • ७- मानदेय की नियुक्तियों  में आरक्षण के नियमो का पालन किया जाये .
  • ८- प्रत्येक नागरिक को रोजगार एव नौकरी की गारंटी देने के लिए निति का निर्धारण किया जाये तथा योजना बनाया जाये

Wednesday, 25 July 2012

सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य स्थापित करने के लिए संघर्ष करे

बाबा साहेब डॉ  भीम राव आंबेडकर   सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य की स्थापना करना चाहते थे .राजनैतिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य ( वोट) का अधिकार तो मिल गया मगर सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में अभी तक नहीं मिला है  बाबा साहेब का यही काम अधूरा इसे पूरा करने के लिए संघर्ष करना है  इसके प्रमाण में राज्य और अल्पसंख्यक  पुस्तक का कुछ अंश यह दिया जा रह है 


 सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य स्थापित करने के लिए जमीं और उधोगो का राष्ट्रीयकरण करने के सम्बन्ध में बाबा साहेब डॉ भीम राव आंबेडकर द्वारा लिखा गया मेमोरेंडम जो बाद में राज्य और अल्पसंख्यक  के नाम से प्रकाशित हुआ :----- में  प्रस्तावित अनुच्छेद -२, खंड -२ , मूल अधिकारों पर हमले के विरुद्ध उपचार की  धरा -४ : आर्थिक शोषण के विरुद्ध संरक्षण  में ये लिखा है 
........."लोक तंत्र की आत्मा है , एक व्यक्ति ,एक मान( value ) . लेकिन दुर्भाग्यवश लोकतान्त्रिक प्रणाली ने एक व्यक्ति ,एक मत(वोट ) को अपनाकर  इस सिधांत को केवल राजनितिक ढांचे की स्थापना मात्र तक प्रयोग में लाने का प्रयास किया है और यह मान लिया जा सकता है की इसी प्रकार इसे एक व्यक्ति एक मूल्य  में परिवर्तित  किया जा सकता है .इसने आर्थिक ढांचे को उन पर छोड़ दिया है जो इसे आकार प्रकार प्रदान कर सके . ऐसा इसलिय हुआ की सैविधानिक कानूनदा पर यह पुरातन अवधारणा छाई  हुई थी  की एक पूर्ण लोकतांत्रिक सविंधान के लिए केवल इतना ही आवश्यक है कि ऐसा संविधानिक  कानून बना दिया जाये कि सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी हो जो सरकार द्वारा जनता का  उत्पीडन रोकने वाली हो .इसका परिणाम यह हुआ की लोकतांत्रिक कहलाने वाले देशो के संविधानिक कानून केवल व्यस्क मताधिकार तथा मौलिक अधिकारों तक ही  सीमित रह गए . उन्होंने इससे आगे सोचा ही नहीं की लोकतंत्र के संविधानिक कानून को व्यस्क मताधिकार और मौलिक अधिकारों से भी आगे बढ़ना चाहिए "........

Thursday, 5 July 2012

आरक्षण की आवश्यकता क्यों ?

13 दिशम्बर  1946 को तात्काली प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने संविधान निर्माण के लिए आठ सूत्रीय उधेश्य संकल्प संविधान सभा के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत किया.  इस संकल्प पत्र में प्रत्येक नागरिक को सामाजिक , आर्थिक न्याय देने के लिए देश की अर्थ व्यवस्था क्या होगी? तथा देश के उद्योगों एव जमीं का क्या होगा? , कोई उल्लेख नहीं था .इस महत्व पूर्ण बिंदु को उधेश्य संकल्प में क्यों नहीं शामिल किया गया ? यह भी एक विचारनीय सवाल   है . उस समय ५६५ राजाओ ने राष्ट्रहित में अपनी रियासत का परित्याग किया और साधारण मनुष्य बनकर रहना स्वीकार किया . इस देश के उद्योगपतियों  और जमींदारो को भी राष्ट्र हित में अपने उद्योग और जमीं का परित्याग करना और साधारण आदमी बनकर रहना स्वीकार करना चाहिए था , परन्तु इन्होने ऐसा नहीं किया और इन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य भी नहीं किया गया .उधेश्य संन्क्लाप  में ई महत्व पूर्ण मुद्दे शामिल न करके इन उद्योगपतियों के उद्योग और जमींदारो की जमीं की सुरक्षा  की गयी .यही से आजाद भारत में आरक्षण की संकलपना का सूत्रपात होता है .क्योकि इस देश की ९५% भूमि ,शत-प्रतिशत उद्योग और नौकरिया उच्च वर्ग के पास है . पिछड़ा वर्ग के पास मात्र ५% जमीं है उद्योग और जमीं न के बराबर है .यदि  आरक्षण की संकलपना न होती  तो  शत प्रतिशत नौकरिया भी उच्च वर्ग के पास ही  होती . जमीं अयोग्यता के अधर पर और नौकरिया योग्यता के अधर पर . आज आरक्षण के प्राविधान के बावजूद भी उच्च वर्ग के पास ८०% नौकरिया है