बाबा साहेब डॉ भीम राव आंबेडकर सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य की स्थापना करना चाहते थे .राजनैतिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य ( वोट) का अधिकार तो मिल गया मगर सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में अभी तक नहीं मिला है बाबा साहेब का यही काम अधूरा इसे पूरा करने के लिए संघर्ष करना है इसके प्रमाण में राज्य और अल्पसंख्यक पुस्तक का कुछ अंश यह दिया जा रह है
सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य स्थापित करने के लिए जमीं और उधोगो का राष्ट्रीयकरण करने के सम्बन्ध में बाबा साहेब डॉ भीम राव आंबेडकर द्वारा लिखा गया मेमोरेंडम जो बाद में राज्य और अल्पसंख्यक के नाम से प्रकाशित हुआ :----- में प्रस्तावित अनुच्छेद -२, खंड -२ , मूल अधिकारों पर हमले के विरुद्ध उपचार की धरा -४ : आर्थिक शोषण के विरुद्ध संरक्षण में ये लिखा है
........."लोक तंत्र की आत्मा है , एक व्यक्ति ,एक मान( value ) . लेकिन दुर्भाग्यवश लोकतान्त्रिक प्रणाली ने एक व्यक्ति ,एक मत(वोट ) को अपनाकर इस सिधांत को केवल राजनितिक ढांचे की स्थापना मात्र तक प्रयोग में लाने का प्रयास किया है और यह मान लिया जा सकता है की इसी प्रकार इसे एक व्यक्ति एक मूल्य में परिवर्तित किया जा सकता है .इसने आर्थिक ढांचे को उन पर छोड़ दिया है जो इसे आकार प्रकार प्रदान कर सके . ऐसा इसलिय हुआ की सैविधानिक कानूनदा पर यह पुरातन अवधारणा छाई हुई थी की एक पूर्ण लोकतांत्रिक सविंधान के लिए केवल इतना ही आवश्यक है कि ऐसा संविधानिक कानून बना दिया जाये कि सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी हो जो सरकार द्वारा जनता का उत्पीडन रोकने वाली हो .इसका परिणाम यह हुआ की लोकतांत्रिक कहलाने वाले देशो के संविधानिक कानून केवल व्यस्क मताधिकार तथा मौलिक अधिकारों तक ही सीमित रह गए . उन्होंने इससे आगे सोचा ही नहीं की लोकतंत्र के संविधानिक कानून को व्यस्क मताधिकार और मौलिक अधिकारों से भी आगे बढ़ना चाहिए "........
सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य स्थापित करने के लिए जमीं और उधोगो का राष्ट्रीयकरण करने के सम्बन्ध में बाबा साहेब डॉ भीम राव आंबेडकर द्वारा लिखा गया मेमोरेंडम जो बाद में राज्य और अल्पसंख्यक के नाम से प्रकाशित हुआ :----- में प्रस्तावित अनुच्छेद -२, खंड -२ , मूल अधिकारों पर हमले के विरुद्ध उपचार की धरा -४ : आर्थिक शोषण के विरुद्ध संरक्षण में ये लिखा है
........."लोक तंत्र की आत्मा है , एक व्यक्ति ,एक मान( value ) . लेकिन दुर्भाग्यवश लोकतान्त्रिक प्रणाली ने एक व्यक्ति ,एक मत(वोट ) को अपनाकर इस सिधांत को केवल राजनितिक ढांचे की स्थापना मात्र तक प्रयोग में लाने का प्रयास किया है और यह मान लिया जा सकता है की इसी प्रकार इसे एक व्यक्ति एक मूल्य में परिवर्तित किया जा सकता है .इसने आर्थिक ढांचे को उन पर छोड़ दिया है जो इसे आकार प्रकार प्रदान कर सके . ऐसा इसलिय हुआ की सैविधानिक कानूनदा पर यह पुरातन अवधारणा छाई हुई थी की एक पूर्ण लोकतांत्रिक सविंधान के लिए केवल इतना ही आवश्यक है कि ऐसा संविधानिक कानून बना दिया जाये कि सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी हो जो सरकार द्वारा जनता का उत्पीडन रोकने वाली हो .इसका परिणाम यह हुआ की लोकतांत्रिक कहलाने वाले देशो के संविधानिक कानून केवल व्यस्क मताधिकार तथा मौलिक अधिकारों तक ही सीमित रह गए . उन्होंने इससे आगे सोचा ही नहीं की लोकतंत्र के संविधानिक कानून को व्यस्क मताधिकार और मौलिक अधिकारों से भी आगे बढ़ना चाहिए "........
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