पिछड़े वेर्गो के सामाजिक न्याय हेतु जाति आधारित जनगणना होना अनिवार्य है ,भारत में जनगणना का इतिहास १४० साल का है . सन्न १८७२ में भारत में पहली बार अंग्रेजो द्वारा जनगणना की शुरुवात हुई थी .अस्सी साल तक जातिय जनगणना अंग्रेजो द्वारा करायी जाती रही .१९४१ की जनगणना अंतिम जाति आधारित जनगणना थी जो विश्व युद्ध के कारण अधूरी रह गयी थी .आज तक १९३१ की जनगणना का ही डाटा उपलब्ध है जो आखरी जाति आधारित जनगणना थी .आजाद भारत में १९४८ में cencus act बनाकर जाति आधारित प्रश्नावली को निकल दिया और आजाद भारत में १९५१ पहली बार जनगणना हुई जो जाति के आधारपर नहीं थी १९५१ से लेकर आज तक किसी भी सरकार ने अभी तक जाति आधारित जनगणना नहीं करवाया है जिससे पिछड़ी जातियों की ठीक ठीक आबादी का पता नहीं चल पाया है सभी akada पुराना है
शाशक जाती के लोग भारत में जाति आधारित जनगणना क्यों नहीं करना चाहते ? क्योकि अगर जातियों की गिनती हो जायगी तो सबसे कम जन्शंख्या वाली जाति जो सबसे जयादा धन धरती शाशन प्रशाशन में काबिज है उसकी पोल खुल जायगी .इससे बचने के लिए शाशक जाति के लोग भारत में जातियों की गिनती नहीं होने देना चाहते .
अगर सभी जातियों की गिनती हो जायगी तो ओ बी सी में कौन कौन सी जातिया आती है यह पता चल जायगा और ओ बी सी को उनकी आबादी के आधार पर अपना अधिकार लेने में आसानी हो जायगी तो पिछड़ी जातियों के सामाजिक न्याय हेतु जाति आधारित जनगणना कराना अनिवार्य है
शाशक जाती के लोग भारत में जाति आधारित जनगणना क्यों नहीं करना चाहते ? क्योकि अगर जातियों की गिनती हो जायगी तो सबसे कम जन्शंख्या वाली जाति जो सबसे जयादा धन धरती शाशन प्रशाशन में काबिज है उसकी पोल खुल जायगी .इससे बचने के लिए शाशक जाति के लोग भारत में जातियों की गिनती नहीं होने देना चाहते .
अगर सभी जातियों की गिनती हो जायगी तो ओ बी सी में कौन कौन सी जातिया आती है यह पता चल जायगा और ओ बी सी को उनकी आबादी के आधार पर अपना अधिकार लेने में आसानी हो जायगी तो पिछड़ी जातियों के सामाजिक न्याय हेतु जाति आधारित जनगणना कराना अनिवार्य है
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