| डॉ जी सिंह कश्यप , एसोसिएट प्रोफेसर , पी जी कॉलेज गाजीपुर |
बाबा साहब का मिशन वही है जो बुद्ध का मिशन है । 25 नवंबर 1949 को बाबा साहब ने अपने भाषण में कहा था । हमने राजनीति के क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य का लक्ष्य तो पा लिया है पर सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य का लक्ष्य पाना बाकी है । जो बाकी रह गया है वही बाबा साहब का मिशन है । तो जब यही बाबा साहब का मिशन है तो सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य का लक्ष्य हासिल कैसे होगा ? उन्हें जब भारत का संविधान बनाने का मौका मिला तो क्यों नहीं उन्होंने ऐसे कानून बनाये जिससे न कोई लैंड लार्ड हो न कोई लैंड लेस हो न कोई टेनेंट हो । मित्रो, बाबा साहब ने संविधान जरूर बनाये पर उन्हें अपनी मन मरजी से सब बनाने की छूट नहीं थी । बहुत कुछ अपनी इच्छा के विरूद्ध भी संविधान में व्यवस्था बनाना पड़ा । इसी लिये 1951 में मनमाड की एक सभा में शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था । हमारे लोग सच्चा समाजवाद लायेंगे । आज जो अंबेडकरवादी हैं क्या किसी के मुंह से कभी ऐसा कोई नारा सुना है कि जमीन ऊद्योग का राष्ट्रीयकरण करो ? उनको पता ही नहीं कि बाबा साहब ने कभी ऐसा कहा भी होगा । बस वे इतना ही जानते हैं कि हमें बाबा साहब के विचारों को लागू कराना है । बुद्ध के विचारों को लागू कराना है । जय भीम और नमो बुद्धाय । बाबा साहब और बुद्ध के क्या विचार हैं पता नहीं । सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य तभी लागू हो सकता है जब अर्थव्यवस्था समाजवादी हो और समाजवाद की ऐसी परिभाषा संविधान में परिभाषित हो । एक गांधीजी का भी समाजवाद है जिसे संविधान सभा में गांधीवादी लाना चाहते थे । उसके लिये हाय तौबा मचाये थे । वह समाजवाद क्या है ? वह समाजवाद है वर्ण व्यवस्था । गांधीजी का आदर्श समाजवाद वर्ण व्यवस्था पर आधारित था जो गीता में है । हर वर्ण हर जाति अपने जातिगत पेशे करे । इस तरह देश में हर व्यक्ति को काम और उसका दाम मिलता रहेगा और सब सुखी रहेंगे । समाज में समरसता बनी रहेगी । अटल बिहारी वाजपेयी ने जब उन्हें भारत रत्न का सम्मान मिला तब भारत के संविधान में जो समाजवादी शब्द है उसकी परिभाषा करते हुए कहा था,"समाजवाद एक अधूरा शब्द है । जब गांधीवाद से मिला तब जाकर पूर्ण हुआ "। तो बाबा साहब के समाजवाद और गांधीजी के समाजवाद में जमीन आसमान का अंतर है । जहां तक साम्यवाद की बात है तो भारत के कम्युनिस्टों का तो संविधान सभा में कहीं अता पता भी नहीं लगता । जो समाजवादी थे वे गांधीजी के समाजवाद के समाजवादी थे । समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण और लोहिया का भी संविधान सभा में कहीं अता पता नहीं लगता । कोई भेजता तो जाते । न किसी ने भेजा न जाने का ये प्रयास किये । बाबा साहब का भी संविधान सभा में अतापता नहीं लगता यदि वो इन्हीं समाजवादियों और कम्यूनिस्टों की तरह चुपचाप बैठे रहते । पर बाबा साहब सारे बंद खिड़की दरवाजे रोशनदान तोड़वाकर घुसे । जब घूसे तो संविधान का सारा भार इन्हीं पर डाल दिया गया पर हाथ बांध दिये गये । बाबा साहब भी जरूरत भर काम कर लेना चाहते थे और आधार बना देना चाहते थे जिसपर खड़े होकर भारत की प्रजा अपना हक अधिकार ले सके और आधार बना भी दिया । हम न ले सकें तो बाबा साहब क्या कर सकते हैं । जितना बन सकता था किया । बाबा साहब बिना परिभाषित किये समाजवाद संविधान में रखते भी तो उसका क्या अर्थ लगाया जाता ? समझ सकते हैं । अंबेडकरवादियों को बस एक काम करना है । ओबीसी को बताना है कि उनके हितैषी कैसे अंबेडकर हैं और कैसे गांधी जी नहीं हैं । क्योंकि उच्चवर्ग ने ओबीसी के दिमाग में अंबेडकर के खिलाफ जहर भर दिया है कि अंबेडकर ने जो कुछ भी किया है अछूतों के लिये किया है । तुम्हारे लिये कुछ नहीं किया है । ताकि ओबीसी अंबेडकर के पंजरे न जा पाये । न जायेगा न जान पायेगा कि अंबेडकर ने उनके लिये क्या किया है । एससी भी उन्हें समझाने का प्रयास नहीं करता । ओबीसी गांधीजी को अपना रहनुमा मानता है । अगर गांधीजी का और कांग्रेस का बस चलता तो वयस्क मताधिकार का स्वरूप क्या होता ? संविधान सभा में कामथ ने बताया था । कामथ ने बताया कि गांधीजी ने अमेरिकी लेखक लुई फिशर से कहा था । अभी सत्तर लाख गांव हैं तो सत्तर लाख वोट होंगे । प्रत्येक गांव का एक वोट होगा । गांव में प्रत्येक व्यक्ति अपने वयस्क मताधिकार से गांव का मुखिया चुनेगा । जैसे एक गांव की आबादी दो हजार है तो गांव के लोग मुखिया को चुनेंगे । उसके बाद उनका काम समाप्त । गांव का मुखिया जिला मुखिया चुनेगा । जिला का मुखिया प्रदेश का मुखिया चुनेगा । प्रदेश का मुखिया देश का मुखिया चुनेगा । वोट की ऐसी प्रणाली रहती तो उस समय तो जमीदारी प्रथा थी । कोई साधारण आदमी चुनाव जीत पाता ? जीतना तो दूर खड़ा भी नहीं हो पाता । हम आज भी उसी अवस्था में होते जिस अवस्था में तब थे । आज भी गाय भैंस बकरी ही चराना पड़ता । याद है ? एकबार जब राम नरेश यादव सीएम बने थे तो क्या नारा लगाया था । राम नरेश वापस जाओ । लाठी लेकर भैंस चराओ । बिहार में कर्पूरी ठाकुर के लिये भी ऐसा ही कुछ नारा दिया था । कर्पूरी कर्पूरा वर्ना .....। 2017 की बात है अखिलेश जब सीएम आवास छोड़े तो उस आवास को गंगाजल से धोकर सुद्ध किया गया । आज आपकी ये दशा है जब आप सीएम रह चुके हैं । इनके पिता धरती पुत्र मुलायम सिंह धरती में ही रहते यदि डा. अंबेडकर संविधान सभा में न जाते । मुलायम डा. अंबेडकर को कहते हैं वह तो सिर्फ एक क्लर्क थे । यही मुलायम सिंह हैं जब गाजीपुर में चंद्रशेखर की मूर्ति का अनावरण किये तो उस मूर्ति को गंगाजल से धोकर शुद्ध किया गया । अंबेडकर के संविधान सभा में जाने से अब हम अपने मन माफिक सरकार बना सकते हैं तो उस पर दबाव भी बना सकते हैं कि ऐसा करो । वैसा करो । केजरीवाल ने दिल्ली की जनता की सेवा की तो जनता ने भी भरपूर उसको इनाम दिया । भाजपा के लोग हिन्दू मुस्लिम,भारत पाकिस्तान कहते रह गये और कहते कहते ठंडे हो गये । जनता को बता दें कि यदि जमीन उद्योग का राष्ट्रीयकरण हो जायेगा तो अमीर गरीब की खाई पट जायेगी । सब बराबर हो जायेंगे । देश के लिये काम करेंगे । मगर सवाल तो यह है कि कौन जमीन के राष्ट्रीयकरण की बात करे ? जिसे कहना चाहिए वह अमीर हो गया । तो अमीर तो जमीन के राष्ट्रीयकरण की बात तो करेगा नहीं । वही हाल अब इन अंबेडकरवादियों का हो गया है । जो अंबेडकरवादी अमीर हो गये हैं वो केवल जयभीम और नमोबुद्धाय कहकर अपने को पक्के अंबेडकरवादी का प्रमाण दे रहे हैं । कुछ बाबा साहब का जन्मदिन मनाकर और कुछ बाबा साहब का अपने टेबल पर फोटो रखकर अपने को पक्का अंबेडकरवादी होने का प्रमाण दे रहे हैं । पक्के अंबेडकरवादी हो तो जय भीम नमोबुद्धाय बोलो साथ में यह भी बोलो । जमीन उद्योग का राष्ट्रीयकरण करो और तब आरक्षण समाप्त करो । ताकि न कोई पूजीपति हो न कोई गरीब हो । न कोई लैंडलार्ड हो न कोई भूमहीन हो । तब देखो सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य लागू हो जाता है कि नहीं । तब बुद्ध और बाबा साहब दोनों का सपना साकार हो जायेगा ।
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