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Saturday, 14 December 2019

राजनीतिक विश्लेषक श्री प्रदीप सिंह एवं स्तंभकार श्री विकास सारस्वत जी का दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख पर टिप्पणी

नीचे राजनीतिक विश्लेषक श्री प्रदीप सिंह एवं स्तंभकार श्री विकास सारस्वत जी का दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख है ।
           राजनीतिक विश्लेषक श्री प्रदीप सिंह जी ने सीएबी और एनआरसी मुद्दे पर अपने दैनिक जागरण वाराणसी के दिनांक 12.12.2019 के "नया इतिहास रचते मोदी- शाह" शीर्षक से प्रकाशित अंक में कहा है कि, " वास्तव में यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि वह (भाजपा) भारतीय समाज को उसकी जड़ों की ओर वापस ले जा रही है । जो काम आजादी के बाद ही शुरू हो जाना चाहिए था वो अब हो रहा है । इस देश की आत्मा भारतीय संस्कृति में बसती है ।" आगे वह कहते हैं, " भाजपा का मानना है कि देश का धर्म के आधार पर बटवारे का एजेंडा पूरा नहीं हुआ है ।" इसी बात को विकास सारस्वत अपने उसी दिन के दैनिक जागरण में," भूल सुधार है नागरिकता विधेयक " शीर्षक से प्रकाशित अपने निबंध में इस प्रकार कहते हैं, "राष्ट्र- राज्य वह अवधारणा है जिसमें राज्य पुरातन सभ्यता और सांस्कृतिक पहचान का उत्तराधिकारी होता है । और उसके ऊपर पूरातन पहचान को बनाये रखने का उत्तरदायित्व होता है ।" इन स्तंभ लेखकों के लेखों से प्रतीत होता है कि भाजपा सीएबी और एनआरसी को भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने के प्रथम पायदान के रूप में ला  रही है । अयोध्या मुद्दे के समाप्त हो जाने के बाद हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण के लिये मथुरा काशी मुद्दे को अभी छेड़ना नहीं चाह रही थी इसलिये सीएबी और एनआरसी को ही एक नया हथियार के रूप में गढ़ा गया है । ताकि मुस्लिमों के खिलाफ हिन्दू ध्रुवीकरण को जारी रखा जाय और  इसी ध्रुवीकरण के बल पर एससी एसटी ओबीसी के आपसी ध्रुवीकरण को रोका जा सके और उन्हें उनकी पुरानी जगह पहुंचाई जा सके । जहां से अंग्रेज़ी हुकूमत लाये गये थे । भारत के ब्राह्मणों से अच्छे तो अंग्रेज ही थे जिन्होंने इस समाज को मानवीय जीवन जीने का अवसर प्रदान किया । ये पुनः उसे छिनना चाहते हैं । एससी एसटी को कहते हैं तुम्हारे लिये आरक्षण ठीक नहीं है और ओबीसी से कहते हैं आरक्षण बैसाखी है । इस तरह पूरी आरक्षण व्यवस्था को ही ध्वस्त कर दिया है । भाजपा आरएसएस का एजेंडा क्या है ? पूरा देश जानता है । पर देश के कुछ राजनीतिक घरानों को इससे मतलब नहीं । उन्हें अपना राजनीतिक कद ऊंचा करना है । देश,समाज जाये भाड़ में । यदि ये सब एक जूट होकर रहते तो भाजपा कभी सत्ता में आती ही नहीं । यही कारण है कि देश के न चाहते हुए भी भाजपा भारी बहुमत से सत्ता में आई । जब देश आजाद हुआ था तभी भाजपा के आदर्श पुरूष विनायक दामोदर सावरकर ने आरएसएस के मुखपत्र पंचजन्य मे कहा था कि भारत के पास जब मनुस्मृति है तो अलग से संविधान बनाने की क्या जरूरत ? राजस्थान हाईकोर्ट के सामने मनु की मूर्ति इसका जीता जागता प्रमाण है । इलाहाबाद हाईकोर्ट के माननीय जज द्वारा गीता को "राष्ट्रीय पुस्तक" घोषित करने का निर्देश भारत सरकार को देना इसी का एक हिस्सा है । गीता को डा. अंबेडकर शरारत पूर्ण पुस्तक बता ही चुके हैं ।  महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामः धर्मराज युधिष्ठिर को राजकाज समझाते हुये कहते हैं ,शूद्र को इतनी ही मजदूरी मिलनी चाहिए और वह भी ऐसे फटे वस्त्र में कि घर जाते जाते आधा रह जाये जिससे उसका और उसके परिवार का पेट न भर सके । पेट भरेगा तो वह तुम्हारे लिये खतरा बन जायेगा । आज भाजपा द्वारा सरकारी क्षेत्र को प्राइवेट सेक्टर में डालकर बेरोजगारी पैदा करना इसी एजेंडा का एक हिस्सा है । गुप्तकाल को इसलिये स्वर्ण युग कहा जाता है क्योंकि इसी काल में किसी समय अछूतपन पैदा हुआ । डा. अंबेडकर ने अपनी पुस्तक " the untachables" में लिखा है । इसी काल में किसी समय भारत में अछूतपन पैदा हुआ और बौद्ध अनुयायियों को अछूत घोषित किया गया । यही भारतीय सभ्यता और संस्कृति की जड़ें हैं जिसकी ओर भाजपा और आरएसएस देश को ले जा रहे हैं । विकास सारस्वत का मरीच झापी के दलित हिंदुओं पर उमड़ता प्रेम सीएबी और एनआरसी को जस्टीफाई करने का एक उपक्रम मात्र है । कितना इस समाज का उत्पीड़न ब्राह्मण धर्म के नाम पर किया गया है । यह पूरे हिन्दू धर्म शास्त्रों (स्मृतियां,कल्प सूत्र,पुराण,महाभारत, रामायण, गीता) में भरा पड़ा है । आज उसे किन्हीं लोगों द्वारा प्रक्षेपित अंश बताया जा रहा है । यह नहीं बताया जा रहा है वे कौन लोग हैं जिन्होंने इनकी धर्म पुस्तकों में छेड़छाड़ की और ये प्रक्षेपण किया और ये तमाशा देखते रहे । आज उसे प्रक्षेपित अंश बता रहे हैं । पहले इस देश में हिन्दू धर्म नामका कोई धर्म नहीं था । यह ब्राह्मण धर्म के नाम से जाना जाता था । इतिहास की पुस्तकों में तो यही पढ़ाया जाता है । न यह वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता था न सनातन धर्म के नाम से । आज जरूर सनातन और वैदिक धर्म  का नाम लिया जा रहा है । भाजपा आरएसएस इस पूरे इतिहास को बदलना चाहते हैं । वेदों में वर्ण व्यवस्था है । सनातन का भी यही मतलब है । एक सृष्टि के समाप्त होते ही चारों वेद ब्रह्मा के मुंह में समा जाते हैं । और दूसरी सृष्टि के प्रारम्भ के बाद पुनः उसी रूप में ब्रह्मा के मुंह से निकल आते हैं । इसी ब्राह्मण धर्म को सनातन धर्म अर्थात सदा से पूर्ववत धर्म कहा जाता है । आज ये लोग जिस सभ्यता और संस्कृति की ओर देश को ले जाने की बात कह रहे हैं,उसी सभ्यता और संस्कृति का बखान करते हुए राहुल सांकृत्यायन ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है । "भारतीय सभ्यता संस्कृति ने किस तरह हिन्दुओं में से एक तिहाइ को अछूत बनाके छोड़ा । किस तरह जातिभेद को ब्रह्मा के मुख से निकली व्यवस्था पर आधारित कर जातीय एकता को कभी बनने नहीं दिया । किस तरह पाप दूर करने के नाम पर गोबर और गोमुत्र पिलाया । किस तरह पेशाब और पैखाने तक को भक्ष्य बना स्वर्ग सिद्ध करने का रास्ता साफ किया । किस तरह स्त्रियों को उनके प्ररंभिक अधिकारों से भी बंचित कर पुरूषों के पैरों की जूती बनाया । किस तरह यह सब देखते हुए भी मानव को टुक टुक दीदम दम न कसीदम के मोहनी मंत्र में फंसाये रखा "। यह हम नहीं एक ब्राह्मण ही कह रहा है । हमारे पुरूखों और हमने तो इसे  झेला है आज भी झेल रहे हैं । क्रीमीलेयर लगाकर सैकड़ों आईएएस में सेलेक्टेड अभ्यर्थियों को आईएएस बनने से रोक दिया गया । जबकि भारत का पीएम भी ओबीसी है । उसके शासन काल में । यह देखकर अनायास ही हमें शूद्र राजाओं के गुप्त काल की याद आ जा रही है जिसे इतिहासकार स्वर्ण काल कहते हैं और उसी काल में एक बड़ी आबादी को अछूत बनाया जाता है । भाजपा और आरएसएस भारत को इसी संस्कृति की ओर ले जा रहे हैं । एनआरसी और सीएबी के पीछे भाजपा आरएसएस का ऐसा एजेंडा है,मुझे भी नहीं लगता था । पर प्रदीप सिंह का लेख पढ़ने के बाद और उसी तारीख के अंक में विकास सारस्वत का लेख पढ़ने के बाद इसका एहसास हुआ । कितना खतरनाक खेल ये दोनों मिलकर खेल रहे हैं जब हम जैसे लोगों को नहीं पता चल रहा है तो आम जनता को क्या पता ? कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना ।


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