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Wednesday, 17 September 2025

पिछड़ा वर्ग के लोगो उठो, जागो और संघर्ष करो : डॉ० जी० सिंह कश्यप


18 सितंबर 2022 को गाजीपुर के स्टार पैलेश में वीर एकलव्य फाउंडेशन ट्रस्ट द्वारा आयोजित युवा बौद्धिक शैक्षिक एवं सामाजिक चिंतन शिविर में  पी जी कॉलेज गाजीपुर के आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के प्रोफेसर एवं  अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ० जी० सिंह कश्यप ने एक ऐतिहासिक और मार्गदर्शक विचार प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि – “देश के प्रत्येक साधन-संसाधन यानी शक्ति के सभी स्रोतों – आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक क्षेत्र में आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी सुनिश्चित करने हेतु संघर्ष करना होगा। समाज को एकजुट होकर मानसिक स्तर से लेकर सड़क, संसद और विधानसभा तक आंदोलन छेड़ना होगा।”यह कथन सिर्फ़ भाषण नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के दबे-कुचले और वंचित तबकों के लिए एक आह्वान था।

1. शिक्षा : समानता की पहली सीढ़ी

डॉ० कश्यप ने शिक्षा को सबसे महत्वपूर्ण साधन बताया। सदियों से वंचित तबकों को शिक्षा से दूर रखा गया ताकि ज्ञान और विवेक विकसित न हो सके। आज भी शिक्षा की गुणवत्ता और पहुंच में असमानता साफ दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि अगर समाज शिक्षा में मजबूत होगा, तो बाकी सभी क्षेत्रों में अपनी हिस्सेदारी खुद हासिल कर सकेगा। इसलिए बच्चों से लेकर युवाओं तक को शिक्षित करना सबसे बड़ा आंदोलन है।

2. आर्थिक संसाधनों में भागीदारी

देश की संपत्ति और साधन कुछ गिने-चुने हाथों में केंद्रित हैं। गरीब, मजदूर, किसान और वंचित वर्ग आज भी आर्थिक असुरक्षा में जी रहे हैं। डॉ० कश्यप का मानना है कि आबादी के अनुपात में आर्थिक अवसर और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। जब तक गरीब वर्ग आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होगा, तब तक वह अपने हक की लड़ाई मजबूती से नहीं लड़ पाएगा।

3. राजनीतिक शक्ति और प्रतिनिधित्व

राजनीति ही वह साधन है, जो समाज के हर क्षेत्र को प्रभावित करता है। अगर सत्ता में हिस्सेदारी नहीं होगी तो नीति-निर्माण भी पक्षपाती रहेगा। उन्होंने कहा कि वंचित समाज को केवल वोट बैंक बनने की बजाय खुद सत्ता का हिस्सा बनना होगा। पंचायत से लेकर संसद तक अपनी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होगा।

4. धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता

धर्म और संस्कृति भी समाज पर गहरा प्रभाव डालते हैं। अक्सर धार्मिक सत्ता का इस्तेमाल वंचित समाज को दबाने के लिए किया गया। डॉ० कश्यप ने लोगों से आह्वान किया कि धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी समानता और स्वतंत्रता का वातावरण बने। किसी भी जाति या वर्ग को पूजा-पद्धति, मंदिर, या धार्मिक संसाधनों से वंचित न किया जाए।

5. संघर्ष की दिशा

डॉ० कश्यप ने स्पष्ट किया कि यह संघर्ष केवल सड़क पर नारेबाज़ी तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह मानसिक स्तर से शुरू होकर संसद और विधानसभा तक पहुंचना चाहिए। मतलब – विचार, शिक्षा, लेखन, बहस, सोशल मीडिया और जन-जागरण से लेकर धरना-प्रदर्शन और विधायी संस्थाओं में बहस तक हर स्तर पर यह लड़ाई जारी रहनी चाहिए।

6. समाज के दबे-कुचले लोगों का आह्वान

आज भी लाखों लोग गरीबी, भेदभाव और उत्पीड़न की मार झेल रहे हैं। उन्हें अपने हक की पहचान करानी होगी। डॉ० कश्यप ने कहा – “उठो, जागो और जब तक हक न मिल जाए, तब तक रुको मत।” यह संदेश खासकर उन वर्गों के लिए है जिन्हें जानबूझकर सत्ता, संसाधन और शिक्षा से वंचित रखा गया।

निष्कर्ष

डॉ० जी० सिंह कश्यप का यह संदेश समाज के लिए चेतावनी भी है और प्रेरणा भी। अगर आबादी के हिसाब से शिक्षा, संपत्ति और सत्ता में हिस्सेदारी सुनिश्चित नहीं हुई तो लोकतंत्र का असली उद्देश्य अधूरा रहेगा। इसलिए अब समय है कि दबे-कुचले और वंचित समाज के लोग एकजुट होकर शिक्षा, सड़क और संसद—हर जगह अपनी हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ें। यही संघर्ष असली आज़ादी और सामाजिक न्याय का मार्ग है।


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