पदोन्नति में आरक्षण के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट का निर्णय असंवैधानिक :प्रोफे०(डॉ०) जी०सिंह कश्यप
पदोन्नति में आरक्षण पर पूरे देश भर में बहस छिड़ी हुई है। आजाद भारत में आरक्षण की आवश्यकता क्यों पड़ीं? यह एक ऐसा विचारणीय प्रश्न है जिस पर प्रत्येक नागरिक को विचार करना होगा। 13 दिसम्बर 1946 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू ने संविधान निर्माण के लिए आठ सूत्रीय उद्देश्य संकल्प संविधान सभा के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत किया। इस संकल्प में प्रत्येक नागरिक को सामाजिक, आर्थिक न्याय देने के लिए देश की अर्थ व्यवस्था क्या होगी तथा देश के उद्योग एवं जमीन का क्या होगा, कोई उल्लेख नहीं था। इस महत्वपूर्ण बिन्दू को उद्देश्य संकल्प में क्यों नहीं शामिल किया गया? यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। उस समय 565 राजाओं ने राष्ट्रहित में अपनी रियासत का परित्याग किया और साधारण मनुष्य बनकर रहना स्वीकार किया। इस देश के उद्योगपतियों और जमींदारों को भी राष्ट्रहित में अपने उद्योग और जमीन का परित्याग करना और साधारण आदमी बनकर रहना स्वीकार करना चाहिए था, परन्तु इन्होंने ऐसा नहीं किया और इन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य भी नहीं किया गया। उद्देश्य संकल्प में इस महत्वपूर्ण बिन्दू को शामिल न करके इन उद्योगपतियों के उद्योग और जमींदारों की जमीन की सुरक्षा की गयी। यहीं से आजाद भारत में आरक्षण की संकल्पना का सूत्रपात होता है। क्योंकि इस देश की 95 प्रतिशत भूमि, शत-प्रतिशत उद्योग और नौकरियाँ उच्च वर्ग के पास हैं। पिछड़ा वर्ग (SC, ST, OBC, CM) के पास मात्र 5 प्रतिशत जमीन है। उद्योग व नौकरियाँ न के बराबर हैं। यदि आरक्षण की संकल्पना न होती तो शत-प्रतिशत नौकरियों भी उच्च वर्ग के ही पास होती। जमीन अयोग्यता के आधार पर और नौकरियों योग्यता के आधार पर। आज आरक्षण के बावजूद भी उच्च वर्ग के पास 80 प्रतिशत नौकरियों है।
आठ सूत्रीय उद्देश्य संकल्प पत्र पर चर्चा के दौरान 18 दिसम्बर 1946 को बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने खेद व्यक्त करते हुए कहा था " इस प्रस्ताव में यह बात होनी चाहिए थी कि इस देश की जमीन व उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया जायेगा। मैं नहीं समझता कि कोई देश जो सामाजिक और आर्थिक न्याय पर विश्वास करता है, उस देश की अर्थव्यवस्था बिना समाजवादी बनाये कैसे कर सकता है।" इससे स्पष्ट है कि बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर स्वतंत्र भारत के संविधान में भारत के प्रत्येक नागरिक को नौकरी एवं रोजगार की गारण्टी देने के लिए तथा इस देश की ऊँच-नीच की जातियों, समूहों और सम्प्रदायों में बंटे हुए समस्त लोगों के लिए बिना भेदभाव के सामाजिक और आर्थिक न्याय देने के लिए जमीन और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कराना चाहते थे। अगर ऐसा हो गया होता तो पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की आवश्यकता ही समाप्त हो गयी होती। भारत के सभी लोग राजा हों या जमींदार सभी भूमिहीन होते। सामाजिक और अर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य की स्थापना हो जाती। पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप ऊँच-नीच, अमीर-गरीब में जन्म लेने का सिलसिला ही समाप्त हो जाता। विधि के विधान में अमीरी-गरीबी, ऊँच-नीच सुनिश्चित करने वाली भाग्य की सभी रेखायें सदा के लिए समाप्त हो जाती। भाग्य से ज्यादा समय से पहले कुछ भी न मिलने की कहावत पर भी सदा के लिए विराम लग जाता। मंहगे कोचिंग और डोनेशन से योग्यता हासिल करके निम्न वर्ग की योग्यता का उपहास करने की प्रवृत्ति जन्म ही नहीं लेती। उच्च वर्ग का अपने को उच्च साबित करने के सारे आधार और अपने को जबरदस्ती उच्च मनवाने की सारी शक्तियाँ सदा के लिए समाप्त हो जाती। मगर बाबा साहब अम्बेडकर ऐसा नहीं करवा सके। क्योंकि संविधान सभा में ऐसे विचार रखने वाले वे अकेले व्यक्ति थे। इसलिए देश की तरक्की के लिए और समाज के पिछड़े हुए लोगों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए आरक्षण का प्रस्ताव किया। इस प्रस्ताव के विरोध में कुछ समाजवादियों ने संविधान की उद्देशिका में समाजवादी शब्द रखने पर जोर दिया, मगर जमीन और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करने पर जोर नहीं दिया। आज भी इस बिन्दु पर मौन हैं और नकली समाजवादी बने हुए है। साम्यवादी और समाजवादी संगठन उच्च वर्ग के प्रगतिशील विचारकों से नियंत्रित संगठन हैं और उच्च वर्ग के सामाजिक एवं आर्थिक हितों की रक्षा के लिए कार्य करते हैं। इन्होंने सन् 1925 में कम्युनिस्ट पार्टी का और सन् 1934 में समाजवाद के नाम पर कांग्रेस समाजवादी दल का गठन किया ताकि अंग्रेजों द्वारा विधान मण्डल कायम करने के लिए पिछड़ा वर्ग को देने वाले मताधिकार से उपजी समस्या से निपटा जा सके और इनके स्वतन्त्र आन्दोलन खड़ा करने के सभी रास्ते बन्द किये जा सकें। उनकी सोच थी कि यदि संविधान की उद्देशिका में समाजवादी शब्द जुड़ जाये तो अम्बेडकर के द्वारा पिछड़ा वर्ग के लिए सेवाओं में रखे जाने वाले आरक्षण की आवश्यकता ही समाप्त हो जायेगी और एक बार संविधान में इस तरह का कोई प्राविधान नहीं रहेगा तो फिर कभी भी प्राविधान बनाने की नौबत ही नहीं आयेगी। ठीक वैसे ही जैसे सन् 1976 में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने संविधान की उद्देशिका में "समाजवादी" शब्द जोड़ा और आज सारी अर्थव्यवस्था समाजवादी अर्थ व्यवस्था के विपरीत चल रही है। उच्च वर्ग के समाजवादियों और साम्यवादियों की यही नीति उन्हें शोषक और शोषित दोनों के मध्य पूज्यनीय बनाये हुए है और भारत में साम्यवाद और समाजवाद दिवास्वप्न बना हुआ है। बाबा साहब डॉ० अम्बेडकर उनकी चालाकी को भली भाँति जानते थे इसलिए उन्हानें नौकरियों में अनुच्छेद 16(4), 335 तथा 340 का प्रस्ताव किया और इनको संविधान में रखे जाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दिया। यहाँ तक कि उन्होंने प्रारूप समिति के सदस्य के०एम० मुन्शी से यह तक कह दिया कि यदि मेरी ये बातें संविधान में नहीं रखी जायेगी तो मैं संविधान निर्माण से छुट्टी लेता हूँ। जो बनाना चाहते है वे बनाये परन्तु मैं ऐसे संविधान को स्वीकार नहीं करूँगा जिसमें पिछड़ा वर्ग के लिए प्रस्तावित प्राविधान न हो। अन्ततः बाबा साहब की बात माननी पड़ी और संविधान में पिछड़ा वर्ग के लिए प्राविधान बनाना पड़ा। संविधान सभा सदस्य डॉ० पट्टाभिसीता रमैया ने दुःख व्यक्त करते हुए कहा "अन्त में हमें एकाएक संविधान, इस संविधान सभा को अनेक वर्गों एवं समूहों के साथ अपनाना पड़ा। बहुत मूल्य चुकाकर हमने इन वर्गों एवं समूहों से पीछा छुड़ाया था।" प्रमुख समाजवादी दामोदर स्वरूप सेठ ने कहा "उम्र भर गांधी जी हमको डीसेन्ट्रलाइजेशन का सबक सिखाते रहे और उनके बिदा होने के बाद उनको इतनी जल्दी भूल गये। हमारे स्पीकर साहब कहते हैं कि जो यह विधान तैयार हुआ है उसमें हिन्दुस्तान की प्रतिभा का नाम व निशान बिल्कुल नहीं है और उसके वह सर्वथा प्रतिकूल है।" देश की प्रतिभा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी है और उनकी प्रतिभा का समाज दर्शन यह है कि " जो शूद्र तीन वर्णों की सेवा करना अपना धार्मिक कर्तव्य समझते हैं, उनकी अपनी सम्पत्ति कभी नहीं होती। ऐसे शूद्र पूजा करने योग्य है और ऐसे शूद्रों पर देवता भी पुष्प वर्षा किये बिना नहीं रहते" (गांधी जी की पुस्तक 'वर्ण व्यवस्था', पृ० 51)। समाजवादी और साम्यवादी जो भारत की अर्थ व्यवस्था को समाजवादी बनाना चाहते हैं और गांधी को अपना आदर्श मानते हैं, दोनों एक दूसरे के विपरीत। इसके पीछे रहस्य क्या है?
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि एस०सी० एस०टी० का पदोन्नति में आरक्षण असंवैधानिक है। यह कैसे असंवैधानिक कहा जायेगा? संविधान के अनुच्छेद 16(4) में लिखा है कि इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को नागरिकों के किसी पिछड़े वर्ग के पक्ष में जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है। नियुक्तियों और पदों के आरक्षण के लिए उपबन्ध करने से निवारित नहीं करेगी। इसमें यह कहीं नहीं लिखा है कि केवल भर्ती के लिए, खाली पदों को भरने के लिए जो प्रक्रिया अनायी जाती है उसमें कुछ पद सीधी भर्ती से भरे जाते हैं। कुछ पद पदोन्नति से भरे जाते हैं और कुछ पद परामर्श की प्रक्रिया से भरे जाते हैं। जहाँ-जहाँ सेवाओं में पद एवं नियुक्तियाँ होंगी। वहाँ पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के लिए अनुच्छेद 16 (4) प्रभावी हो जायेगा। इसका आशय है कि अगर 100 पद पदोन्नति से भरे जाने है तो उसमें 23 पद एस०सी०/ एस०टी० से, 52 पद ओ०बी०सी० से भरे जाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुच्छेद की गलत व्याख्या करते हुए इन्दिरा साहनी बनाम भारत संघ के वाद में सन् 1992 में अनुसूचित जातियों, जनजातियों के पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगा दिया जिसे संसद ने 77 वां संविधान संसोधन पारित कर अधिनियम 1995 की धारा 2 द्वारा संविधान में 16(4) ए जोड़कर सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को निष्प्रभावी कर दिया जबकि सन् 1962 में जनरल मैनेजर सर्दन रेलवे बनाम सी० रंगाचारी के बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण को बैध माना था। इसके बाद एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि आरक्षण के आधार पर पदोन्नति मिल जाने के बाद भी लाभार्थी को परिणामी वरीयता प्राप्त नहीं होगी, और जब सामान्य वर्ग का उससे वरिष्ठ कर्मचारी बाद में पदोन्नति पाकर उस पद पर आयेगा तो उसकी पुरानी वरीयता बनी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को पुनः निष्प्रभावी करने के लिए 85वां संविधान संशोधन द्वारा 16 (4) ए को पुनः संशोधित कर स्पष्ट किया गया कि पदोन्नति पाने वाले को परिणामी वरीयता भी दी जायेगी। इस संशोधन को एम० नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने संसोधन को संविधान सम्मत ठहराया किन्तु ये शर्ते जोड़ दी कि पिछड़ापन को साबित करने के लिए विश्वसनीय आँकड़े हों। प्रतिनिधित्व पर्याप्त न हो और सेवा की कार्य कुशलता पर विपरीत प्रभाव न हो। पिछड़ापन के प्रामाणिक आधार पर ही नियुक्ति हुई है फिर अलग से पिछड़ापन का कैसा प्रमाण? पर्याप्त प्रतिनिधित्व के न रहने पर ही पदोन्नति हुई है, फिर अलग से प्रतिनिधित्व पर्याप्त न हो जैसी आपत्ति क्यों? शासन ने कार्यकुशलता पर विपरीत प्रभाव न पड़े उसको ध्यान में रखकर ही पदोन्नत दिया है। फिर कार्यकुशलता पर विपरीत प्रभाव न पड़े की आपत्ति क्यों? इस निर्णय के बाद पदोन्नति में आरक्षण देने के अनेक मामलों को विभिन्न उच्च न्यायालयों में चुनौती दी गयी और कई आरक्षण देने वाले प्राविधान निरस्त भी किये गये। यू० पी० पावर कार्पोरेशन बनाम राजेश कुमार के वाद के निर्णय से पहले 2011 में भी सूरजभान मीणा बनाम राजस्थान सरकार के वाद में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा ही फैसला सुनाया था। क्या देश की सर्वोच्च न्यायपालिका का यह फैसला संविधान निर्माताओं की भावनाओं के अनुरूप है? जिसके लिए उन्होंने संविधान में अनुच्छेद 16 (4) का प्राविधान किया था। क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसी कोई स्वतंत्र न्यायिक इकाई है जो संविधान के अनुच्छेदों के विपरीत भी फैसला दे सकती है? देश की पिछड़ा वर्ग की आवाज हर संवैधानिक संस्था चाहे विधायिका हो, चाहे कार्यपालिका या न्यायपालिका हो सबको संविधान के दायरे में ही रहकर कार्य करने की स्वतंत्रता है। मगर सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक हदों को पार कर पदोन्नति में आरक्षण के विरुद्ध अन्यायपूर्ण फैसला दिया है। इसका अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट में एक वर्ग विशेष के न्यायाधीश जातीय दुर्भावना से ग्रसित होकर पिछड़ा वर्ग के खिलाफ अन्यायपूर्ण एवं असंवैधानिक निर्णय दे रहे हैं तथा संविधान की अवहेलना कर रहे हैं जिसे यह पिछड़ा वर्ग अब सहन नहीं करेगा। ओबीसी के लिए भी पदोन्नति में आरक्षण संविधान के 16 (4) में उपबन्धित है जो उन्हें उनकी आबादी के अनुसार 52 प्रतिशत मिलना चाहिए। इस समय उसका लाभ सामान्य वर्ग के लोग ले रहे हैं। हम पिछड़ा वर्ग की आवाज के माध्यम से न्यायालयों, संसदीय शक्तियों तथा कार्यपालिका से यह कहना चाहते हैं कि पिछड़ा वर्ग के संवैधानिक अधिकारों की अवहेलना न की जाय, अन्यथा भारत में जापान की क्रान्ति की पुनरावृत्ति होगी। जिसके सम्बन्ध में चेतावनी इस देश के उच्च वर्ग को बड़ौदा रियासत के महाराजा सायाजी राव गायकवाड़ ने साउथबरो मताधिकार आयोग के आगमन पर सन् 1918 में एक जनसभा में भाषण के दौरान दी थी, जिसकी स्वर्ण जयन्ती आने वाली है। पिछड़ा वर्ग के नेता पिछड़ा वर्ग के लिए नौकरियों में भर्ती एवं पदोन्नति में आरक्षण तथा हाईकोर्ट एवं सुप्रीमकोर्ट में पिछड़ा वर्ग की आबादी के अनुसार समुचित प्रतिनिधित्व 85 प्रतिशत लागू करायें। यदि उच्च वर्ग के गरीबों से ज्यादा हमदर्दी हो तो उच्च वर्ग के 15 प्रतिशत में क्रीमीलेयर लागू करायें अथवा देश की जमीन व उद्योग का राष्ट्रीयकरण करायें अथवा भारत के प्रत्येक नागरिक को योग्यता के आधार पर नौकरी एवं रोजगार, समान कार्यों के लिए समान वेतन, असंगठित क्षेत्र के मजूदरों (मनरेगा आदि) को चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के वेतन के बराबर मजदूरी और असहायों के लिए जीवन निर्वाह भत्ता दिलाने के लिए आवश्यक कानून बनवाये और उसे लागू करवायें। उच्च वर्ग के आरक्षण विरोधी लोग यदि आरक्षण को समाप्त कराना चाहते हैं तो वे अपनी जमीन और उद्योगों का परित्याग करके राष्ट्र की सम्पत्ति घोषित करा दें। तो पिछड़ा वर्ग भी आरक्षण का परित्याग कर देगा। यदि उच्च वर्ग के अमीर और पिछड़ा वर्ग के अमीर इसका विरोध करते हैं तो पिछड़ा वर्ग के गरीब और उच्च वर्ग के गरीब अपने-अपने सम्वर्ग में इसके लिए जनमत तैयार करें।
पिछड़ा वर्ग के अधिकारी, कर्मचारी जो नौकरियों में समुचित प्रतिनिधित्व का लाभ ले रहे हैं वे अपने समाज में प्रत्येक व्यक्ति को नौकरी व रोजगार उपलब्ध कराने के लिए तन-मन-धन से सहयोग कर जनमत तैयार करने का कार्य करें ताकि बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने जिस उद्देश्य से नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व का उपबन्ध करवाया था उसका उद्देश्य पूरा हो सके, जिसे बाबा साहब संविधान निर्माण में अकेले होने के कारण पूरा नहीं करा सके थे।
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