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Thursday, 18 September 2025

यदि शपथ को आचरण में उतारा जाए, तो वह समाज के उत्थान और क्रांति का आधार बन सकती है: संत लहरी सिंह कश्यप के संदर्भ में

यदि शपथ को आचरण में उतारा जाए, तो वह समाज के उत्थान और क्रांति का आधार बन सकती है: संत लहरी सिंह कश्यप के संदर्भ में, वे एक समाज सुधारक, संत और जनजागरण के प्रेरक थे। उन्होंने हमेशा सत्य, समानता और न्याय पर बल दिया। उनके जीवन में शपथ (Oath/Resolution) की विशेष भूमिका रही, क्योंकि शपथ व्यक्ति को अपने लक्ष्य और मूल्यों से जोड़े रखती है।

शपथ की उपयोगिता :

  1. संकल्प की दृढ़ता – शपथ लेने से व्यक्ति अपने विचारों और कार्यों के प्रति दृढ़ निश्चयी हो जाता है। संत लहरी सिंह कश्यप ने समाज को शोषण, अन्याय और भेदभाव से मुक्त करने का जो संकल्प लिया था, वह उनके जीवन की शपथ थी।

  2. सामूहिक जागृति – शपथ केवल व्यक्तिगत नहीं होती, यह समाज में जागरूकता और सामूहिक शक्ति जगाने का माध्यम बनती है। संत जी अपने अनुयायियों से भी समानता, शिक्षा और संघर्ष की शपथ दिलवाते थे।

  3. अनुशासन और नैतिक बल – शपथ व्यक्ति के जीवन को अनुशासित और नैतिक बनाती है। यह उसे प्रलोभनों और भय से बचाती है।

  4. न्याय और समानता का मार्ग – शपथ समाज में न्याय और समानता स्थापित करने के लिए संघर्ष की प्रेरणा देती है। संत लहरी सिंह कश्यप ने अपने जीवनभर इस मार्ग पर डटे रहकर समाज को प्रेरित किया।

  5. समाज परिवर्तन का साधन – शपथ एक आंदोलन या क्रांति का आधार बन सकती है। जैसे – जब लोग सामूहिक रूप से शपथ लेते हैं कि वे अन्याय और असमानता को स्वीकार नहीं करेंगे, तो परिवर्तन निश्चित होता है।


इतना ही नही जब कभी दो पक्षों में किसी बात को लेकर विवाद की स्थिति बनती है और यह साबित नहीं हो पाता कि कौन सही और कौन गलत है तो फिर 'शपथ' ली जाती है, जिसे कसम और सौगंध भी कहा जाता है। शपथ लेने के कई तरीके हैं। पहला तो दोनों पक्षों से कहा जाता है कि वे अपने सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति का नाम लेकर शपथ लें। सरकारी स्तर पर जब कोई पद प्राप्त होता है, तो पदासीन होने वाला शख्स संविधान की शपथ लेता है। इसमें मंत्री, सांसद, विधायक और अधिकारीगण भी शामिल हैं। भारतीय संस्कृति में शपथ का बहुत महत्व है। माना जाता है कि झूठी शपथ लेने वाले का अनिष्ट होता है। इसलिए शपथ तभी लेनी चाहिए, जब अंदर से यह लगे कि जो सही है, वही कहा जा रहा है। सत्य शपथ में बड़ी शक्ति बताई जाती है। जबकि झूठी शपथ साम्राज्यों से लेकर कुल के पतन का कारण भी बन सकती है।. स्मरण रहे कि महाभारत युद्ध तो पांडवों की पत्नी द्रौपदी की शपथ का परिणाम रहा। युधिष्ठिर द्वारा द्रौपदी को जुए में हारने के बाद जब दुर्योधन, के भाई दुशासन ने द्रौपदी के बाल खींचते हुए भरी, 'सभा में निर्वस्त्र करना चाहा तो उन्होंने शपथ ली कि जब तक दुर्योधन का विनाश नहीं हो जाएगा, तब तक वह बाल नहीं बांधेंगी। द्रौपदी की शपथ 4 को पांडवों ने सच साबित किया। इसके बाद ही द्रौपदी ने बाल बांधे। इसी तरह की शपथ आचार्य चाणक्य ने भी ली थी। नंद वंश के राजा घनानंद ने चाणक्य का अपमान किया। अपमानित होने पर चाणक्य ने अपनी शिखा खोल दी और तय किया कि वह नंद वंश के विनाश के बाद ही पुनः शिखा बांधेंगे। अपनी शपथ को पूरा करने के लिए उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य का सहयोग लिया। इसलिए शपथ बहुत सोच-समझ कर लेनी चाहिए। झूठी शपथ से पुण्य नष्ट होता है। निष्कर्षतः संत लहरी सिंह कश्यप का जीवन स्वयं एक शपथ था – "समानता, न्याय और मानवीय गरिमा की स्थापना"। उन्होंने दिखाया कि यदि शपथ को आचरण में उतारा जाए, तो वह समाज के उत्थान और क्रांति का आधार बन सकती है


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