भारतीय राजनीति में जाति हमेशा से निर्णायक तत्व रही है। दलित-पिछड़े, आदिवासी और अन्य मूलनिवासी समुदाय जब-जब अपने अधिकारों के लिए जागरूक हुए, तब-तब विभिन्न नेता और परिवार उनके नाम पर राजनीति में उभरे। उन्होंने बहुजन समाज को यह सपना दिखाया कि उनकी पार्टी ही उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी दिलाएगी। लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि ऐसी जाति-जाति की व्यक्ति या परिवार केंद्रित पार्टियाँ बहुजन समाज को शासक जमात बनाने का आंदोलन खड़ा नहीं करतीं, बल्कि उन्हें ब्राह्मणवादी ताक़तों के लिए “रेडिमेड चमचे” बनाकर तैयार कर देती हैं।
1. परिवारवाद की राजनीति का संकट
बहुजन समाज के नाम पर बनी अधिकांश पार्टियों का नियंत्रण कुछ गिने-चुने व्यक्तियों या उनके परिवारों के हाथों में सिमट गया है। यहाँ जनता की भागीदारी केवल वोट तक सीमित रहती है। आंदोलन चाहे लाखों का हो, लेकिन उसका राजनीतिक और आर्थिक लाभ सिर्फ एक परिवार को मिलता है। यह लोकतांत्रिक राजनीति का नहीं, बल्कि सामंती सत्ता का रूप है, जिसमें बहुजन जनता केवल सीढ़ी बनकर रह जाती है।
2. बहुजन आंदोलन का मूल उद्देश्य
फुले, पेरियार, आंबेडकर और कांशीराम ने बहुजन आंदोलन का असली मकसद साफ़ किया था—
- जाति व्यवस्था का उन्मूलन,
- शिक्षा और जागरूकता के ज़रिए सामाजिक बदलाव,
- और बहुजन समाज को शासक जमात में बदलना।
लेकिन परिवार-केंद्रित दल इस उद्देश्य को आगे बढ़ाने की बजाय, केवल जातीय वोट बैंक इकट्ठा कर सत्ता की भागीदारी में अपने परिवार को सुरक्षित करने का काम करते हैं। इस प्रक्रिया में बहुजन जनता का सामूहिक लक्ष्य पीछे छूट जाता है।
3. ब्राह्मणवादी ताक़तों से समझौता
आजादी के बाद से अब तक उच्च जातीय दलों—चाहे वे खुद को राष्ट्रवादी कहें या धर्मनिरपेक्ष—का असली उद्देश्य सामाजिक वर्चस्व बनाए रखना ही रहा है। परिवारवादी बहुजन पार्टियाँ चुनाव के समय इन्हीं दलों से समझौता कर लेती हैं। नतीजा यह होता है कि बहुजन समाज अपने ही नेताओं के पीछे चलते हुए उन्हीं ताक़तों की सेवा करने लगता है, जिनके खिलाफ आंदोलन खड़ा किया गया था। यही वह बिंदु है जहाँ बहुजन राजनीति ब्राह्मणवादी राजनीति की “सप्लायर” बन जाती है।
4. जनता का मोहभंग और आंदोलन की कमजोरी
जब जनता बार-बार देखती है कि जिन नेताओं को उसने अपना उद्धारक समझा था, वे सिर्फ अपने परिवार को सत्ता तक पहुँचाने में लगे हैं, तो उसमें गहरा मोहभंग पैदा होता है। शिक्षा, रोजगार, आरक्षण, सामाजिक न्याय और सत्ता में वास्तविक भागीदारी जैसे मुद्दे पीछे धकेल दिए जाते हैं। इस कारण बहुजन आंदोलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ता है और जनता दोबारा वही पुराने शोषक ढांचे के अधीन चली जाती है।
5. आगे का रास्ता
बहुजन समाज को अब यह समझना होगा कि व्यक्ति-पूजा और परिवारवाद आंदोलन को कमजोर करते हैं। असली लड़ाई जाति प्रथा के उन्मूलन और सत्ता में बहुजन बहुसंख्यक की साझेदारी सुनिश्चित करने की है। इसके लिए आवश्यक है—
- सामूहिक नेतृत्व,
- वैचारिक एकजुटता,
- और सत्ता के विकेन्द्रीकरण की राजनीति।
बहुजन आंदोलन को केवल वोट जुटाने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाना होगा।
निष्कर्ष
जाति-जाति की परिवार केंद्रित पार्टियाँ बहुजनों को शासक जमात बनाने का आंदोलन नहीं चलातीं, बल्कि वे ब्राह्मणवादी राजनीति के लिए रेडिमेड चमचे तैयार करने का षड्यंत्र करती हैं। बहुजन समाज को अब यह तय करना होगा कि वह जाति और परिवारवाद की राजनीति का हिस्सा बनेगा या आंबेडकर–फुले–पेरियार की वैचारिक धारा पर चलकर असली सत्ता-भागीदारी हा
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