19 सितम्बर 2021 को गाजीपुर जिले के रुक्कापुर में “राष्ट्र निर्माण में महापुरुषों का योगदान” विषयक एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह अवसर दो महान समाज सुधारकों—पेरियार ई. वी. रामास्वामी नायकर और समाज चेतना के प्रतीक ललई सिंह यादव—की जयंती का था। कार्यक्रम में अनेक सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद् और छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता डॉ. जी. सिंह कश्यप ने अपने विचार रखते हुए कहा कि पेरियार की शिक्षाएँ केवल धार्मिक आलोचना तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वे सामाजिक और राजनीतिक जीवन की वास्तविकताओं से जुड़ी थीं। उन्होंने तर्क के आधार पर यह प्रश्न उठाया था—“क्या कोई देवी-देवता आपकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं का समाधान करते हैं? बिल्कुल नहीं!”
डॉ. कश्यप ने स्पष्ट किया कि यदि वास्तव में देवी-देवता समाज के दुखों का समाधान करते, तो हजारों वर्षों पहले ही अछूतपन, गैरबराबरी और शोषण की व्यवस्था समाप्त हो गई होती। लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी जातिगत भेदभाव, असमानता और अन्याय समाज में मौजूद है। इसलिए पेरियार ने तर्क, विज्ञान और शिक्षा पर आधारित समाज निर्माण की राह दिखाई।
पेरियार की शिक्षाएँ और उनका संदेश
पेरियार का जीवन इस विचार का प्रतीक था कि “तर्क ही सत्य तक पहुँचने का मार्ग है।” वे अंधविश्वासों के कट्टर विरोधी थे और समाज से प्रश्न पूछने की हिम्मत पैदा करते थे। उनका कहना था कि—
पूजा और आस्था से नहीं, बल्कि शिक्षा और आत्मसम्मान से मुक्ति संभव है।
समाज को बराबरी और न्याय की नींव पर खड़ा करना ही असली धर्म है।
महिलाएँ, दलित और वंचित वर्ग यदि संगठित होकर अपने अधिकार की माँग करेंगे, तभी राष्ट्र मजबूत होगा।
पेरियार ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह सभी को समान अवसर और सम्मान प्रदान करे।
ललई सिंह यादव का योगदान
इस आयोजन में वक्ताओं ने ललई सिंह यादव के योगदान को भी विस्तार से याद किया। उन्हें प्रायः “यादवों का पेरियार” कहा जाता है क्योंकि उन्होंने भी अंधविश्वास, शोषण और गैरबराबरी के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना।
ग्रामीण समाज में शिक्षा का अलख जगाना, पिछड़े और शोषित वर्ग को संगठित करना, तथा अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना ललई सिंह यादव की पहचान थी। उन्होंने दिखाया कि समाज परिवर्तन केवल विचारों से नहीं बल्कि संघर्ष और संगठन से संभव है।
उनका जीवन यह सिखाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों के प्रयास से नहीं, बल्कि जनता की जागरूकता और साहसिक कदमों से होता है।
डॉ. जी. सिंह कश्यप के विचार
डॉ. कश्यप ने कहा कि आज के समय में जब धार्मिक आडंबर और जातिगत भेदभाव फिर से सिर उठाने लगे हैं, तब पेरियार और ललई सिंह यादव की शिक्षाएँ और भी प्रासंगिक हो जाती हैं।
उन्होंने कहा—
“सामाजिक परिवर्तन का मार्ग तर्क और विज्ञान से होकर जाता है, न कि अंधविश्वास और आस्था से।”
यदि हम समाज से शोषण और गैरबराबरी मिटाना चाहते हैं, तो हमें शिक्षा को हथियार बनाना होगा।
लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक समान अवसर और न्याय पहुँचेगा।
राष्ट्र निर्माण की दिशा
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में राष्ट्र निर्माण का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है। असली राष्ट्र निर्माण तब होगा जब—
हर व्यक्ति को समान अवसर और सम्मान मिले।
महिलाओं और दलितों को बराबरी के अधिकार प्राप्त हों।
आर्थिक और सामाजिक असमानताओं को दूर किया जाए।
विज्ञान, शिक्षा और तर्क पर आधारित सामाजिक व्यवस्था बने।
पेरियार और ललई सिंह यादव ने अपने जीवन से इन मूल्यों को जीवंत किया।
आज की प्रासंगिकता
आज जब भारत आर्थिक प्रगति और तकनीकी विकास की ओर बढ़ रहा है, तब भी सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव और धार्मिक आडंबर हमारे सामने चुनौतियाँ बने हुए हैं।
इन परिस्थितियों में पेरियार का यह सवाल और भी गूंजता है—
“क्या कोई देवी-देवता आपकी समस्याओं का समाधान करते हैं?”
इसका उत्तर आज भी वही है—“बिल्कुल नहीं।”
समाधान केवल शिक्षा, संगठन, संघर्ष और संवैधानिक अधिकारों के प्रयोग से ही संभव है।
निष्कर्ष
रुक्कापुर, गाजीपुर में आयोजित यह जयंती समारोह केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं था, बल्कि आत्ममंथन का क्षण था। इसने हमें याद दिलाया कि महापुरुषों का मार्गदर्शन आज भी उतना ही जरूरी है जितना उनके जीवनकाल में था।
पेरियार और ललई सिंह यादव ने हमें सिखाया कि सच्चा राष्ट्र निर्माण तभी संभव है जब समाज से भेदभाव और शोषण की जड़ें उखाड़ी जाएँ और तर्क, समानता तथा न्याय पर आधारित नई व्यवस्था स्थापित की जाए।
उनकी शिक्षाओं को आत्मसात करना ही उनकी सबसे बड़ी स्मृति है और यही भारत को एक सशक्त, न्यायपूर्ण और समतामूलक राष्ट्र बनाने की राह है।
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