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Wednesday, 1 October 2025

धम्म विजय दशमी : अशोक से आंबेडकर तक


धम्म विजय दशमी : अशोक से आंबेडकर तक

भारत के इतिहास में ऐसे अवसर बहुत कम मिलते हैं, जब कोई पर्व केवल धार्मिक उत्सव न रहकर सामाजिक क्रांति और मानवता की विजय का प्रतीक बन जाता है। “धम्म विजय दशमी” ऐसा ही एक अवसर है। यह पर्व दो महान विभूतियों – सम्राट अशोक महान और डॉ. भीमराव आंबेडकर – की स्मृतियों से जुड़ा है। एक ने प्राचीन भारत में खड्ग को त्यागकर धम्म की ओर रुख किया, तो दूसरे ने आधुनिक भारत में करोड़ों पीड़ितों और शोषितों को नई राह दिखाने के लिए बौद्ध धम्म को अपनाया।

सम्राट अशोक और धम्म विजय

261 ईसा पूर्व का कलिंग युद्ध भारतीय इतिहास का निर्णायक मोड़ था। इस युद्ध में लाखों लोगों की मृत्यु और असीम विनाश देखकर सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ। उन्होंने खड्ग-विजय (तलवार की विजय) को त्यागकर धम्म विजय को जीवन का आधार बनाया।

अशोक ने अपने शिलालेखों में लिखा –

“सच्ची विजय दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि उनके दिल जीतने में है।”
(अशोक का 13वाँ शिलालेख)

उन्होंने धम्म की नीति को करुणा, अहिंसा और प्रज्ञा पर आधारित किया और इसे सम्पूर्ण प्रजा के कल्याण का माध्यम बनाया। यही कारण है कि इतिहासकार उन्हें "धम्म विजय का प्रतीक" मानते 

आंबेडकर और आधुनिक धम्म क्रांति

प्राचीन भारत में जो बीज अशोक ने बोए थे, वही आधुनिक भारत में डॉ. आंबेडकर ने पुनर्जीवित किए। उन्होंने लंबे संघर्ष के बाद यह अनुभव किया कि भारतीय समाज में समानता और न्याय केवल बौद्ध धर्म के मानवीय मूल्यों से ही संभव है।

इसलिए उन्होंने विजयादशमी का दिन चुना, जो अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। 1956 का विशेष संयोग यह था कि उस वर्ष विजयादशमी 14 अक्टूबर को आई और साथ ही भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण को पूरे 2500 वर्ष पूरे हो रहे थे। इस ऐतिहासिक क्षण को उन्होंने एक नव धम्म क्रांति का आरंभ बनाया।

डॉ. आंबेडकर ने दीक्षा के समय कहा –

“मैं हिंदू धर्म की गुलामी में पैदा हुआ, लेकिन मैं हिंदू धर्म की गुलामी में मरूँगा नहीं।”
“मैं बौद्ध धर्म की शरण में जाता हूँ, क्योंकि इसमें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व है।”

नागपुर दीक्षाभूमि : धम्म विजय दशमी की पुनर्प्रतिष्ठा

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की पवित्र दीक्षाभूमि पर डॉ. आंबेडकर ने अपने लगभग पाँच लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। उन्होंने 22 प्रतिज्ञाएँ दिलाकर अंधविश्वास, जातिभेद और असमानता से मुक्त जीवन जीने का आह्वान किया।

उन्होंने अनुयायियों से कहा –

“अब हमें बुद्ध और उनके धर्म के अनुसार जीना है। यही हमारा उद्धार और समाज का कल्याण कर सकता है।”

यह केवल धर्म परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक क्रांतिकारी सामाजिक आंदोलन था। इस क्षण ने विजयादशमी को नया अर्थ दिया – अब यह केवल रावण वध का पर्व नहीं रहा, बल्कि अन्याय, असमानता और अंधविश्वास पर धम्म की विजय का दिन बन गया। इसी कारण इसे “धम्म विजय दशमी” और “धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस” कहा जाने लगा।

धम्म विजय दशमी का महत्व

  • यह दिन हमें याद दिलाता है कि वास्तविक विजय तलवारों से नहीं, बल्कि करुणा और प्रज्ञा से होती है।

  • यह अशोक की धम्म नीति और आंबेडकर की धम्म क्रांति को जोड़ता है।

  • यह सामाजिक समता, न्याय और भाईचारे की स्थापना का प्रतीक है।

  • आज भी  भारत और विश्व के अनेक स्थानों पर बौद्ध अनुयायी धम्म विजय दशमी को उत्साहपूर्वक मनाते हैं।

निष्कर्ष

“धम्म विजय दशमी” प्राचीन और आधुनिक भारत को जोड़ने वाला सेतु है। अशोक महान ने कलिंग युद्ध के बाद धम्म विजय का मार्ग अपनाकर इतिहास की धारा मोड़ी, और डॉ. आंबेडकर ने 1956 में नागपुर दीक्षाभूमि से उसे पुनर्जीवित कर एक नवजागरण की शुरुआत की। यह पर्व केवल धार्मिक स्मृति नहीं है, बल्कि यह मानवता, समानता और न्याय की सतत धारा का प्रतीक है और जैसा डॉ. आंबेडकर ने कहा था –“बुद्ध का धर्म ही मानवता की सबसे बड़ी आशा है।”


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