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| Dr G Singh Kashyap |
17 अति पिछड़ी जाति के लोग अपनी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि कई प्रदेशों में हमारी जाति अनुसूचित जाति में शामिल है। इसलिए यूपी में भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाय। मैं समझता हूं यह उनकी अज्ञानता है या ढिंठाई है। इस विषय में यह बता दें कि सन् १९३२ में जो कम्यूनल एवार्ड जारी किया गया था वह सन् १९२७ के साइमन कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर था। जिसमें अनुसूचित जाति में वे ही जातियां शामिल की गई थीं जो उस समय उन प्रांतों में अस्पृश्य थीं जिन प्रांतों में वे रहती थीं। सन् १९२७ में साइमन कमीशन ने १९२१ की जनगणना को आधार माना था। और उसी के आधार पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत किया था। १९२१ में अस्पृश्यों की गणना नहीं हुई थी। अस्पृश्यों की गणना सर्व प्रथम १९११ में हुई थी। अस्पृश्यों की पहले से ही ब्रिटिश हुकूमत से मांग की जा रही थी अपने सामाजिक और आर्थिक उद्धार के लिए। ब्रिटिश सरकार भी उनके सामाजिक आर्थिक उद्धार करना चाहती थी। पर उनके सामने समस्या यह थी कि यदि इनके लिए अलग से कोई प्रावधान करेंगे तो उच्च वर्ग के लोग नाराज हो जायेंगे और ब्रिटिश हुकूमत के लिए बड़ी समस्या पैदा कर देंगे। इसलिए उन्होंने एक तरकीब सोची। उन्होंने मुस्लिमों के एक प्रतिनिधिमंडल को बुलाकर सन् १९०६ में अपने लिए अलग से प्रतिनिधित्व की मांग करने के लिए उकसाया। ताकि इनका सेपरेट प्रतिनिधित्व अस्पृश्यों के लिए अलग से प्रतिनिधित्व का आधार बन सके और उच्च वर्ग के विरोध को थोड़ा हल्का किया जा सके। १९०६ में इसी प्रतिनिधि मंडल ने इंडियन मुस्लिम लिग की स्थापना की। योजना के मुताबिक इस मुस्लिम प्रतिनिधि मंडल ने अपने लिए अलग से प्रतिनिधित्व की मांग की। इसलिए १९०९ में मार्ले-मिंटो ऐक्ट के तहत पहली बार इनको पृथक निर्वाचन का अधिकार मिला। १९०९ में इस ऐक्ट के तहत पहली बार चुनाव हुआ जिसमें २००० मतदाताओं को मताधिकार का अधिकार मिला था। जिसमें राजा नवाब और बड़े बड़े जमींदारों को शामिल किया गया था। इससे पहले ब्रिटिश सरकार प्रांतीय या केंद्रीय परिषदों के लिए स्वयं सदस्य नामित करती थी। १८८५ में कांग्रेस का गठन इसीलिए हुआ था कि सरकार स्वयं सदस्य नामित न करे। हम से सलाह लेकर नामित करे। क्योंकि हम (कांग्रेस) पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। १८५७ की क्रांति विफल करने के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने शासन सत्ता इस्ट इंडिया कंपनी से अपने हाथ में ले लिया था और १८५८ में महारानी विक्टोरिया ने घोषणा किया था कि हम भारत में शासन भारतीयों के साथ सहयोग से करेंगे। इसीलिए उसने वायसराय की सहायता के लिए १५ सदस्यीय कौंसिल बनाया था। कौंसिल के सदस्यों का चुनाव ब्रिटिश हुकूमत स्वयं नामित करके करती थी जिसमें शुरू में केवल अंग्रेज ही होते थे। बाद में भारतीयों से चुनने के लिए १८८१ से जातीय जनगणना प्रारंभ किया था ताकि जन संख्या के आधार पर प्रतिनिधियों का निर्धारण कर सके। दूसरी जनगणना १९९१ में हुई। इस जनगणना से ब्रिटिश सरकार को पता चला कि यहां केवल जातियां ही नहीं हैं। बल्कि एक दूसरे से ऊंच और एक दूसरे नीच यानी सीढ़ीनुमा जातियां हैं। इसलिए दस वर्ष बाद १९०१ में जनगणना उच्चतर और निम्नतर के आधार पर हुई। इसी जनगणना में उच्च जातियों के बहकावे में आकर छोटी जातियां अपने को उच्च साबित करने के लिए जनेऊ धारण करने लगी। बिहार के जनगणना आयुक्त को जो आवेदन पत्र मिले थे कि हम नीच नहीं,उच्च हैं,उनका वजन एक मन से अधिक था। मुसलमानो में जुलाहा जैसी छोटी जातियां और हिन्दुओं में भी ढेर सारी सछूत जातियां अपने को उच्च साबित करने लगीं। जैसे कोइरी जातियां अपने को कुश से और अहिर अपने को कृष्ण से जोड़कर उच्च बताने लगे। जुलाहा अपना तार अरब के शेख सैय्यद से जोड़ कर उच्च बताने लगे। मैं बता रहा था कि मुसलमानों को १९०९ में मार्ले मिंटो ऐक्ट के तहत पृथक निर्वाचन का अधिकार मिल गया था। अब अस्पृश्यों को देना था। इसलिए ब्रिटिश हुकूमत ने दस वर्षीय जनगणना जब १९११ में शुरू किया तो अस्पृश्यों की दयनीय दशा में सुधार के लिए सोचा कि क्यों न अब हम इनकी पहले जनसंख्या जान लें कि भारत में इनकी आबादी कितनी है। इसलिए १९११ में १० बिन्दुओं का एक मापदंड निर्धारित किया। अगले लेख में दसों मापदंड लिखूंगा। क्योंकि इसमें लिखने से पोस्ट ज्यादा लंबा हो जायेगा। जो जातियां उस मापदंड पर खरी उतरीं उन्हीं जातियों को अस्पृश्यों की सूची में शामिल किया गया। ऐसी बहुत सी जातियां थीं जो किसी प्रदेश में अस्पृश्य थीं तो दूसरे प्रदेश में अस्पृश्य नहीं थीं। स्पृश्य थीं। जो दूसरे प्रदेश में अस्पृश्य नहीं थीं उन्हें उस प्रदेश में अस्पृश्यों की सूची में शामिल नहीं किया गया। ये निषाद और अन्य १७ जातियां वही हैं। १९११ की यही जनगणना अस्पृश्यों की जनसंख्या का आधार बनीं जो भारत की कुल आबादी का लगभग पांचवां भाग थी। १९११ की जनगणना को ही १९२१ की जनगणना ने भी अपनी स्वीकृति प्रदान की। इसी जनगणना को साइमन ने अपनी १९२७ की रिपोर्ट के लिए आधार बनाया। १९३२ में साइमन कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर जो कम्यूनल एवार्ड जारी किया गया था और १९३५ के इंडिया ऐक्ट में जिनको अनुसूचित जातियों का दर्जा प्रदान किया गया थि वे ही जातियां आज अनुसूचित जातियां हैं। इसमें अलग से कोई सछूत जाति को जोड़ने का कोई प्रावधान ही नहीं। क्योंकि यदि किसी सछूत जाति को एससी में शामिल कर लिया जायेगा तो आरक्षण का सारा लाभ सछूत जातियां ही ले लेंगी। फिर तो अछूत जातियों के लिए अलग से आरक्षण का कोई मतलब ही नहीं रह जायेगा। क्योंकि कार्यालयों में उच्च जातियों के अधिकारी अछूत की जगह सछूत को ही रखना ज्यादा पसंद करते हैं जो आफिस से लेकर घर तक का उनका काम करता रहे। संजय निषाद की तरह उस समय भी इनके नेता था जो सछूतों को एससी में शामिल करने की मांग पर अड़े थे ताकि अछूतों का सारा हक वे ही ले सकें। अस्पृश्य नेताओं ने उनसे अपने लिए अलग से आबादी के बराबर आरक्षण की मांग करने को कहा था पर ये अलग से आरक्षण मांगने के लिए तैयार नहीं थे। मांगते तो जरूर मिला होता। साइमन कमीशन ने इनको भी इनकी आबादी के बराबर आरक्षण मांगने के लिए उकसाया था। पर ये उस समय ऐसा क्यों नहीं कर सके? यही कारण लगता है कि अस्पृश्यों का सारा हक इन्हें ही मिल जायेगा। भाई,नहीं मांगेगे तो वो देगा कैसे? अपने से तो देगा नहीं। उसे देने के लिए कुछ आधार चाहिए। पिछड़ापन आधार है। पर यदि पिछड़ा अपने को पिछड़ा माने तब न। उच्च या अगड़ा मानेगा तो कैसे मिलेगा? इसी वजह से ओबीसी को आरक्षण १९२७ में नहीं मिल सका। और इनमें से कुछ अब एससी में घुसने के जुगाड़ में हैं। यदि मांगते तो इन जातियों की पहचान की जाती कि कौन ओबीसी में आती हैं और उनकी आबादी कितनी है। उस आधार पर १९२७ में इनको भी आबादी के अनुसार आरक्षण की संस्तुति साइमन कमीशन द्वारा की गयी होती और १९३५ के इंडिया ऐक्ट में इनके आरक्षण का भी प्रावधान हो गया होता। पहचान जब तक नहीं होगा कि कौन पिछड़ी जाति में है तब तक न आबादी का पता चलेगा न कितना आरक्षण दिया जाय ,इसका पता लगेगा फिर आरक्षण कैसे मिलेगा? आज १७ सछूत जातियों को एससी में शामिल करने की मांग हो रही है। मुलायम और अखिलेश की सरकार और योगी की सरकार ने यूपी में लागू भी कर दिया था। प्रमाण पत्र भी जारी हो रहे थे। पर मामला न्यायालय में जाने की वजह से रूका है। १७ जातियां एससी का हक मारने की हर जुगत में लगी हुई हैं। देखिए कब तक सफल हो पाती हैं। इनका हक जहां है ये वहां नहीं मांग रही हैं। पता नहीं किससे डर रही हैं। तमिलनाडु सरकार ने अपने प्रदेश में ६९ परसेंट आरक्षण लागू किए हुए है। इन सभी १७ जातियों को अपनी आबादी के बराबर अलग से आरक्षण की मांग करनी चाहिए तो ये एससी में शामिल होने की मांग पर अड़ी हुई हैं। यदि तमिलनाडु का विधानमंडल अपने यहां ६९% आरक्षण का विधान बना सकता है तो यूपी क्यों नहीं? जितनी जिसकी संख्या भारी उसकी उतनी भागीदारी का नारा देने वाले कांशीराम साहब भी अपनी सरकार में इन ५२.५% आबादी को इनकी आबादी के बराबर यूपी में ५२.५% आरक्षण नहीं दे सके। दूसरे से देने के लिए मांग कर रहे थे। जब अपने देने की बात आई तो कन्नी काट गये। इनकी पार्टी ने १०% आरक्षण की मांग आर्थिक आधार पर उनके लिए कर दिया जिनके लिए संविधान में कोई प्रावधान ही नहीं था। उच्च वर्ग की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी की सरकार ने उनको संविधान में रातों रात प्रावधान बनाकर दे भी दिया। पर अपने को पिछड़ों की सरकार बताने वाली पार्टियों ने अपने पिछड़ों को उनका हक संविधान में प्रावधान होने के बावजूद नहीं दिया। ओबीसी की इन १७ जातियों के प्रबुद्ध वर्ग को चाहिए कि वे अपनी जातियों के लिए आबादी के बराबर अलग से आरक्षण की मांग करने के लिए अपने जातीय नेताओं से कहें। मैं तो सभी ओबीसी के प्रबुद्ध लोगों से कहना चाहता हूं कि आपकी आबादी पूरे भारत में ५२.५% है। आप चाहो तो अकेले बिना किसी के साथ सहयोग के अपनी सरकार बना सकते हो। अकेले ओबीसी के लोग संगठित होकर अपनी सरकार केंद्र और प्रदेश दोनों जगह बनाओ और अपना ५२.५% हिस्सा कानून बनाकर ले लो और सबका उनका आबादी के बराबर हिस्सा दे दो। कब तक चेतोगे और एससी-एसटी ओबीसी के लोग आपस में झगड़ते रहोगे। आपकी जाति के नेता आपके हक की जंग नहीं बल्कि अपने और अपने परिवार के वर्चस्व की जंग लड़ रहे हैं। आप समझ रहे हैं आप के हक की जंग लड़ रहे हैं। यदि आपके हक की जंग लड़ते तो सब ओबीसी और एससी-एसटी के नेता एक जगह हो जाते। आपके लायक एक एजेंडा बनाते। उसे लेकर चुनाव में उतरते और उसे लागू करते।
भाग 2
ब्रिटिश हुकूमत इस बात का पुख्ता इंतजाम करना चाहती थी कि अस्पृश्यों का हक कोई और स्पृश्य जाति न ले सके। इसलिए उसने 10 बिन्दुओं का एक मापदंड निर्धारित किया। और जनगणना आयुक्त को सख्ती से इसका पालन करने को कहा। वे दस मापदंड हैं-
1. जो ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को नहीं मानते।
जो ब्राह्मण या अन्य मान्यता प्राप्त हिन्दू से गुरु दीक्षा नहीं लेते।
3.जो वेदों की सत्ता स्वीकार नहीं करते।
4. जो बड़े बड़े हिन्दू देवी देवताओं की पूजा नहीं करते।
5. ब्राह्मण जिनकी यजमानी नहीं करते।
6. जिनका कोई ब्राह्मण पुरोहित बिल्कुल भी नहीं होता।
7. जो साधारण हिन्दू मंदिरों के गर्भ गृह में प्रवेश नहीं कर सकते।
8. जिनसे छूत लगती है।
9. जो अपने मुर्दे को दफनाते हैं।
10. जो गो मांस खाते हैं और गाय की पूजा नहीं करते।
(वोल्यूम 10 पृष्ठ 137) संस्करण -2013
जनगणना आयुक्त की छानबीन ने अटकल की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी। 1911 की खोज के अनुसार प्रांतवार अस्पृश्यों की संख्या निम्न प्रकार है -
1. मद्रास(अब तमिलनाडु) - 39.8 लाख
2. बंबई (महाराष्ट्र, गुजरात) 19.5 लाख
3.बंगाल 45 लाख
4.संयुक्त प्रांत- 47 लाख
पंजाब- 19.5 लाख
5. बिहार तथा उड़ीसा- 32.4 लाख
6. मध्य प्रांत - 12 लाख
7. असम - 6 लाख
कुल -221.2 लाख
वोल्यूम 10 पृष्ठ 137
जनगणना आयुक्त द्वारा स्पष्ट रूप से समझ बूझकर अस्पृश्यों की संख्या सुनिश्चित करने का यह प्रथम प्रयास था।
अस्पृश्यों की कुल आबादी के बारे में 1911 के जनगणना आयुक्त के निष्कर्षों की पुष्टि 1921 के जनगणना आयुक्त ने की। सन् 1921 के जनगणना आयुक्त ने अस्पृश्यों की आबादी को सुनिश्चित करने के लिए छानबीन भी की। जनगणना आयुक्त ने कहा- हाल के वर्षों में समाज के कतिपय वर्ग को दलित वर्ग कहने का रिवाज सा हो गया है। दलित वर्ग की कोई अन्तिम परिभाषा नहीं है।...... मैंने प्रांतीय अध्यक्षों से कहा है कि वे इसकी जांच करें। .....इन प्रांतीय आंकड़ों का कुल योग पांच करोड़ तीस लाख बैठता है। (पृ-138-139)। फिर साइमन कमीशन ने जांच की। (पृ 139)
फिर 1932 में लोथियन समिति बनी और उसने जांच पड़ताल शुरू की तो अचानक हिन्दुओं ने चुनौती भरा रूख अपनाया और उसने इन आंकड़ों को सही मानने से ही इनकार कर दिया। कुछ प्रांतों में तो हिन्दुओं ने यहां तक कहा कि वहां तो कोई अस्पृश्य है ही नहीं। (पृ 141-142)। अब बताइये यदि अस्पृश्य ही नहीं तो आरक्षण किसके लिए? ये सीधे सीधे यही खारिज कर दे रहे हैं कि हमारे यहां अस्पृश्य हैं ही नहीं।
लोथियन कमेटी की नियुक्ति भारतीय गोलमेज सम्मेलन की मताधिकार संबन्धी उप समिति की सिफारिशों के आधार पर की गई थी। कमेटी ने मध्य भारत और असम को छोड़कर पूरे भारत का दौरा किया। कमेटी की मदद के लिए प्रांतीय सरकार ने हर प्रांत में प्रांतीय समितियों का गठन किया था। प्रधानमंत्री ने मताधिकार समिति के अध्यक्ष लार्ड लोथियन को एक अनुदेश पत्र भेजा था। उसमें कहा गया-
"गोल मेज सम्मेलन में जो चर्चाएं हुईं उससे स्पष्ट हो गया है कि नये संविधान में डिप्रेस्ड क्लास के लिए प्रतिनिधित्व के बारे में पर्याप्त व्यवस्था करनी होगी। अब नामांकन द्वारा प्रतिनिधित्व की पद्धति को उपयुक्त नहीं माना जाता है।
बाबासाहेब अम्बेडकर भी सात सदस्यीय मताधिकार समिति के सदस्य बनाए गए थे। पर बाबासाहेब ने एक शर्त पर कमेटी का सदस्य बनना स्वीकार किया। वह शर्त थी कि," अस्पृश्यों के लिए संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र रखा जाय या या पृथक निर्वाचक मंडल,यह प्रश्न कमेटी के विचारार्थ विषय में शामिल न किया जाय। यह शर्त इसलिए रखा कि सात सदस्यीय समिति में वह अकेले अपने विचार के सदस्य होंगे और जब बहुमत से निर्णय की बात आयेगी तो उनका प्रस्ताव खारिज कर दिया जायेगा। इसलिए उस विषय को समिति के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखने की शर्त रखा। परन्तु एक ऐसा प्रश्न भी सामने आ गया जिसके विषय में उनको कोई अंदेशा ही नहीं था। वह समस्या थी अस्पृश्यों की संख्या। जिसकी पड़ताल 1911 से लेकर। 1929 के बीच चार समितियों ने किया था। उन्होंने पाया कि अस्पृश्यों की आबादी कुल पांच करोड़ होगी। उन्हें इस बात का कोई आभास नहीं था कि मताधिकार समिति के सामने इनकी संख्या को लेकर विवाद खड़ा हो जायेगा और मताधिकार समिति उनकी संख्या को ही नकार देगी। पर खड़ा हो ही गया। समिति के समक्ष कट्टरता से विवाद हुआ और उस पर लंबी खिंचतान हुई। कमेटी की अनगिनत बैठकें हुई। अनगिनत साक्ष्य प्रस्तुत किए गए और अस्पृश्यों के अस्तित्व को ही नकारा गया। जो प्रांतीय समितियां लोथियन मताधिकार समिति को सहयोग देने के लिए बनाई गयी थीं उन समितियों ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि हमारे प्रांत में एक भी अस्पृश्य नहीं। फिर किसके लिए प्रतिनिधित्व की बात की जा रही है। जैसे-
1. पंजाब प्रांत की कमेटी ने बहुमत से इन्कार कर दिया कि प्रांत में दलित अथवा अस्पृश्य जैसा कोई वर्ग है। जबकि अस्पृश्यों के प्रतिनिधि के.बी.दीन मुहम्मद हयात और हंसराज की राय में मुसलमानों में कोई डिप्रेस्ड वर्ग नहीं वहीं हिन्दुओं तथा सिखों में डिप्रेस्ड क्लास की संख्या- 1310709 है। पंजाब प्रांत की समिति के अन्य सदस्य हैं- श्री नाजीर हुसैन,राय बहादुर चौधरी,श्री छोटूराम,श्री ओम राबर्टस,श्री कुरैशी,श्री चटर्जी,सरदार भूटा सिंह, पंडित नानक चंद।
2. संयुक्त प्रांत की समिति की राय है कि हमारे प्रांत में अस्पृश्यता की समस्या है ही नहीं। संयुक्त प्रांत में अस्पृश्यों के सदस्य बाबू राम सहाय ने बताया कि संयुक्त प्रांत में अस्पृश्यों की संख्या- 11435117 है।
3. बंगाल- कमेटी की राय है कि भुइमाली को छोड़कर बंगाल में ऐसा कोई वर्ग नहीं है। जबकि बंगाल प्रांत में अस्पृश्यों के प्रतिनिधि मल्लिक ने अपनी रिपोर्ट में अनुसूचित वर्ग की 86 जातियों की सूची प्रस्तुत की।
4. बिहार और उड़ीसा-कमेटी ने कहा कि डिप्रेस्ड क्लास के लिए विशेष प्रतिनिधित्व की कोई जरूरत नहीं।
इस प्रकार अस्पृश्यों को कोई प्रतिनिधित्व न मिले,उनकी आबादी को ही नकार दिया जाय।
आज अस्पृश्यों को मिले उस अधिकार को स्पृश्य ओबीसी हड़पना चाहते हैं। जबकि ओबीसी के लिए भी संविधान के अनुच्छेद 16(4) और 340 में आबादी के अनुसार आरक्षण का प्रावधान है। वहां मांगने में क्या समस्या है? अस्पृश्य जातियों को उनकी आबादी के आधार पर और अस्पृश्यता के आधार पर आरक्षण मिला हुआ है। हम अपना हक अधिकार ले रहे हैं। आप भी अपना हक अधिकार मांगिये। अपका हक,अधिकार जहां है वहां लिजिए। जहां नहीं है वहां जबर्दस्ती क्यों घुसना चाहते हैं। जिस प्रदेश में आपकी जाति के लोग अस्पृश्य थे वहां पा रहे हैं। जहां नहीं हैं वहां नहीं मिल रहा है। इसलिए अन्य प्रांत के आधार पर अनुसूचित जाति में शामिल करने की आपकी मांग जायज नहीं है। आप अलग से अपनी आबादी के बराबर आरक्षण की मांग करें। हम आपकी मांग का पुरजोर समर्थन करेंगे।

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