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Sunday, 29 August 2021

बाबासाहेब संविधान सभा में कैसे पहुंचे?

  

 

Dr.G.Singh Kashyap
बाबासाहेब संविधान सभा में कैसे पहुंचे? कैसे उनको अस्पृश्यों की लड़ाई से दूर रखने,उनको अलग थलग करने के लिए चालें चली गईं तथा कैसे बाबासाहेब ने उनकी हर चाल को नाकाम किया। अंत में कैसे बाबासाहेब को उन्होंने खुद निर्विरोध चुन कर लाया? उन्हें कानून मंत्री बनाया तथा ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन बनाकर भारत का संविधान निर्माण का काम सौंपा? यह सब जानने के लिए लेख को थोड़ा लंबा करना पड़ रहा है। वैसे इस विषय पर मैंने ढेर सारे वीडियो सुने। पर कोई संतोषजनक नहीं लगा। इसलिए यह पोस्ट लिखना पड़ा।

बाबासाहेब डा अंबेडकर अस्पृश्यों को हिन्दुओं की गुलामी से मुक्त करना चाहते थे। गांधीजी उनको गुलाम बनाये रखना चाहते थे। यही दोनों नेताओं में विरोध का कारण था। देश को आजाद तो दोनों ही करना चाहते थे। डा अम्बेडकर ने कहा था,आप हमें आजाद कर दो। हम दोनों मिलकर कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई लड़ेंगे। पर गांधीजी को यह मंजूर नहीं था। जो गांधीजी चाहते थे वह अंबेडकर को मंजूर नहीं था। इधर अंग्रेज अस्पृश्यों को अधिक से अधिक अधिकार देते जा रहे थे। उधर इससे गांधी जी की परेशानी बढ़ती जा रही थी।‌ इसलिए वह अंग्रेजों को भगाने की जल्दी में थे। अगर अंग्रेज,तिलक और गांधीजी की सलाह मान लेते कि कि "हम से राय मशविरा लेकर जब तक चाहें शासन करें। हमारी सलाह पर मुगलों ने सैकड़ों साल शासन किया। आप भी ऐसा कर कर सकते हैं" तो आज आजादी की लड़ाई की जरूरत ही नहीं पड़ी होती। पर यह अंग्रेजों को मंजूर नहीं था। इसलिए गांधीजी चाहते थे कि जितना जल्दी हो अंग्रेज भारत छोड़ दें। वरना अगर कुछ दिन और रह गये तो ये अस्पृश्य तो हिन्दुओं से आजाद हो ही जायेंगे। स्पृश्य पिछड़े भी आजाद हो जायेंगे। यह बात हमारे लोगों को ठीक से समझ में आ जाए। इसलिए 1935 के इंडिया ऐक्ट के बाद से शुरू करना जरूरी समझा।

1935 का इंडिया ऐक्ट पारित होने के बाद बाबासाहेब ने सोचा कि अब हमें अपनी लड़ाई का दायरा अस्पृश्यों से बढ़ाकर मजदूरों,किसानों तक करना चाहिए। इसी सोच से 1937 में होने वाले विधानमंडलों के चुनाव में भाग लेने के लिए उन्होंने स्वतंत्र मजदूर दल का गठन किया। बंबई विधानसभा की कुल 175 सीटों में से 15‌ आरक्षित सीटों पर और 2 सामान्य सीटों पर उन्होंने प्रत्याशी उतारे थे। जिसमें 15 आरक्षित सीटों पर उनकी पार्टी की जीत हुई। योगेन्द्र नाथ मंडल से अभी बाबासाहेब का संपर्क नहीं हुआ था। वह निर्दल प्रत्याशी के रूप में बंगाल से कांग्रेस के दिग्गज नेता को हराकर चुनाव जीते थे। बंगाल को छोड़कर सभी प्रांतों में कांग्रेस की सरकारें बनीं थीं। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार बनी थी। 1940 में वे मुस्लिम लीग में शामिल हुए और उसकी सरकार में मंत्री बने। 1940 में ही मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान बनाने का लक्ष्य निर्धारित कर लिया था।

1सितंबर 1939 को पोलैंड पर जर्मनी के आक्रमण से और उस युद्ध में ब्रिटेन के कूदने से विश्व युद्ध छिड़ गया।‌ यह विश्व युद्ध 2 सितंबर 1945 तक चला। (युद्ध समाप्त होने की तिथि कहीं 8 मई,कहीं 14 अगस्त भी मिलती है। यानी युद्ध समाप्त होने की तारीख में मतभेद हैं)। उस समय भारत ब्रिटेन का उपनिवेश था। इसलिए गवर्नर जनरल ने एक घोषणा कर भारत को भी युद्ध में शामिल कर लिया। गवर्नर जनरल की इस घोषणा का सभी राजनीतिक दलों ने विरोध किया। क्योंकि उनसे बिना कोई सलाह मशविरा लिए भारत को युद्ध में शामिल कर लिया गया था। राजनीतिक पार्टियों के विरोध को देखते हुए गवर्नर जनरल ने घोषणा की कि :-

"युद्ध समाप्ति के बाद सभी प्रमुख दलों की सहमति से भारत सरकार का शासन संबंधी सुधार किया जायेगा। कोई भी सुधार अल्पसंख्यकों की सहमति के बिना कार्यान्वित नहीं किया जायेगा।"

इस घोषणा का भी कांग्रेस ने विरोध किया। उसका दावा था कि वह पूरे भारत का आकेले प्रतिनिधित्व करती है। अन्य दलों से सलाह मशविरा का मतलब सरकार भारतीयों को बांटने की साज़िश कर रही है। कांग्रेस का यह दावा कांग्रेस के इतर नेताओं को स्वीकार नहीं था जिसमें डाक्टर अंबेडकर भी थे।

अप्रैल 1940 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन रामगढ़ में हुआ। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने भारतीयों को बांटने के ब्रिटिश प्रयासों का विरोध किया। इसी अधिवेशन में जीन्ना के खिलाफ अलग से मुस्लिम नेतृत्व खड़ा किया गया। मुस्लिम लीग का भी वार्षिक अधिवेशन उसी समय लाहौर में हुआ। इस अधिवेशन में यह मांग की गई कि जहां मुस्लिम बहुसंख्यक में हैं वहां अलग राज्य स्थापित किया जाय। उनकी सोच थी कि बहुसंख्यक हिन्दू राज्य में जो व्यवहार हिन्दू मुस्लिमों के साथ करेंगे वही व्यवहार हम मुस्लिम बहुसंख्यक राज्य में हिन्दुओं के साथ करेंगे।

‌जिस तरह अस्पृश्यों की शक्ति को ब्रिटिशों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए गांधीजी ने अंबेडकर के खिलाफ जगजीवनराम को खड़ा किया था। उसी तरह इस अधिवेशन में मुस्लिमों की शक्ति को ब्रिटिशों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए गांधीजी ने जिन्ना के खिलाफ अली बंधुओं को खड़ा किया था। अगर अंबेडकर न होते तो शायद गांधीजी को जगजीवनराम की जरूरत न पड़ती और जिन्ना न होते तो अली बंधुओं की जरूरत न पड़ती। जिन्ना 1925 की मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट का अपमान अभी भुले नहीं थे कि गांधीजी ने दूसरा अपमान अली बंधुओं को उनके खिलाफ खड़ा करके कर दिया।‌ जो जिन्ना मुसलमानों की एकता की भूमिका में थे वो जिन्ना अब मुसलमानों का स्वतंत्र राष्ट्र खड़ा करने की भूमिका में आ गये। जिन्ना का तेजोभंग राष्ट्रीयत्व का तेजो भंग हो गया। वहीं से पाकिस्तान के गठन का आरंभ हुआ।‌ यदि जिन्ना के खिलाफ गांधी जी अली बंधुओं को खड़ा न करते तो शायद पाकिस्तान बनने की नौबत ही नहीं आती। जिन्ना पाकिस्तान के पक्ष में न आते तो "सारे जहां से अच्छा हिन्दोसतां हमारा" गीत लिखने वाले मुहम्मद इकबाल द्वारा उठाई गयी मुस्लिम राष्ट्र की मांग और 1933 में रहमत अली द्वारा तृतीय गोलमेज सम्मेलन में उठाई गई पाकिस्तान की मांग ढीली पड़ जाती। जिस तरह जीन्ना के अहम् को ठेस लगी उस तरह डाक्टर अंबेडकर के अहम् को ठेस नहीं लगी। उनका तो बार बार रोज अपमान हो रहा था। पर देश और अस्पृश्यों की खातिर वह अपमान प्रूफ हो गये थे। उन्होंने 1939 में विश्व युद्ध में भाग लेने के विरोध में,बंबई विधानसभा में,अन्य प्रांतीय सरकारों की तरह, बंबई विधानसभा के त्याग पत्र विषय पर,बहस के दौरान कहा भी था कि "देश को यह जान लेना चाहिए कि जब देश हित और मेरा हित टकारायेगा (जैसे जिन्ना का हित ठकराया) तो मैं देश को प्राथमिकता दूंगा।‌ पर जहां देश हित और अस्पृश्यों का हित टकरायेगा वहां मैं अस्पृश्यों के हित के साथ खड़ा होऊंगा।" बाबासाहेब ने 1926 में निराश और परेशान होकर एक बार जेजुरी (दक्षिण भारत) की एक जनसभा में यह जरूर कहा था कि अस्पृश्यों को अपने लिए अलग स्वतंत्र प्रदेश की मांग करनी चाहिए। पर बाद में इस विचार को हमेशा के लिए छोड़ दिया। चाहते तो वह भी जिन्ना की तरह अस्पृश्यों के लिए अलग राष्ट्र की मांग कर सकते थे। पर नहीं किया। यदि कर लिए होते तो आज उनकी मुर्तियां नहीं तोड़ी जातीं न अस्पृश्यों को अस्पृश्य समझा जाता। उनका अपना एक स्वतंत्र राष्ट्र होता। पर उन्हें अखंड भारत और उनके लोगों से अगाध मुहब्बत थी। जिसका खामियाजा आज अस्पृश्यों को अस्पृश्यता झेल कर भुगतना पड़ रहा है। बाबासाहेब को भी आजीवन अछूत ही समझा गया। मरने के बाद भी उनका अपमान जारी है। हालांकि कुछ वजहों से उस वक्त उन्होंने पाकिस्तान का समर्थन किया था। वर्ष 1940 के अंत में डा अंबेडकर का प्रमुख ग्रंथ थाट्स आन पाकिस्तान प्रकाशित हुआ। जिसमें इसका जिक्र है।

अप्रैल 1941 के शुरुआती महीनों में डा अम्बेडकर ने अंग्रेजी हुकूमत कायम करने में अस्पृश्यों की भूमिका का बखान करते हुए गवर्नर जनरल से अनुरोध किया था कि वे द्वितीय विश्व युद्ध की आवश्यकताओं को देखते हुए अस्पृश्यों को सेना में भर्ती का आदेश जारी करें।

जुलाई 1941 में गवर्नर जनरल ने अपनी कार्यकारिणी समिति में आठ नये सदस्य शामिल किए। उसके साथ ही विश्व युद्ध को देखते हुए एक सुरक्षा सलाहकार समिति भी नियुक्त की। जिसमें अंबेडकर का नाम था। डा अम्बेडकर ने गवर्नर जनरल की कार्य समिति में नाम न होने पर विरोध जताया था। वीर सावरकर ने जरूर तार द्वारा गवर्नर जनरल से अनुरोध किया था कि डा अंबेडकर को कार्य समिति में लिया जाय।

अक्टूबर 1941 में ब्रिटिश सरकार ने अंबेडकर के अनुरोध को स्वीकार करते हुए महार रेजीमेंट का गठन किया था। लेकिन अभी चमार रेजीमेंट नहीं बनी थी। ब्रिटिश सरकार विश्व युद्ध में हार रही थी। अमेरिका और चीन का दबाव था कि ब्रिटेन भारत की राजनीतिक समस्या जल्दी हल करे। इसलिए ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1942 के तीसरे सप्ताह सर स्टैफोर्ड क्रीप्स को भारत की राजनीतिक समस्या का हल करने के लिए भारत भेजा।‌ क्रीप्स योजना का निचोड़ यह था कि :-

1.युद्ध समाप्त होते ही संविधान समिति बुलाई जाएगी।

2. वह समिति भारत के रियासतदारों के सहयोग से राज्य संविधान बनाये।

3. किंतु हिन्दी राज्य संघ में शामिल होने या बाहर रहने का अधिकार प्रांतों को दिया जाय।

4.अंत में संविधान समिति ब्रिटिश सरकार के साथ संधि करे।

इस योजना का सबने विरोध किया। इसमें अल्पसंख्यकों की तो कोई बात ही नहीं की गई थी। ऐसा लगता है भारत में कोई अल्पसंख्यक है ही नहीं। सर क्रीप्स ने सभी राजनीतिक नेताओं से अलग-अलग बात की। डा अंबेडकर से पूछा। आप तो मजदूरों के नेता हैं।‌ यदि अस्पृश्यों के नेता हैं तो आपका बल कितना है? ऐसे सवाल पूछने का मतलब यह था कि कांग्रेस ने पहले ही सर स्टैफोर्ड क्रीप्स को सूचित कर दिया था कि डाक्टर अंबेडकर अस्पृश्यों के नेता नहीं हैं। मजदूरों के नेता हैं। अस्पृश्यों की नेता तो कांग्रेस है। कांग्रेस पूरे भारत के अस्पृश्यों का प्रतिनिधित्व करती है। सारे अस्पृश्य उसके साथ हैं। अंबेडकर के खिलाफ जगजीवनराम को खड़ा करने का यही मकसद था। क्रीप्स के इन सवालों ने डाक्टर अंबेडकर को सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि अब हमें अपनी भूमिका बदलनी चाहिए। इस तरह डा अम्बेडकर को अपनी भूमिका बदलनी पड़ी। उन्होंने 18-19 जुलाई 1942 को नागपुर में अस्पृश्यों की एक बैठक बुलाई। इस बैठक में स्वतंत्र मजदूर दल को भंग किया और शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की स्थापना की। तब से उनको अपने को अस्पृश्यों के हितों तक ही सीमित रखने की बाध्यता बन गई। क्योंकि पता नहीं कांग्रेस कब कौन सी चाल चल दे? फिर तो मेरे जीवन का मकसद ही अधूरा रह जायेगा। न अस्पृश्यों का हित कर पायेंगे न मजदूरों किसानों का ही हित कर पायेंगे। इसके बाद बहुत से धर्म परिवर्तित संगठन के लोगों ने अपनी लड़ाई लड़ने के लिए बाबा साहब से निवेदन किया। पर वह केवल उनके साथ अपनी सहानुभूति ही दिखा सके। अगर उनकी लड़ाई अस्पृश्यों की लड़ाई के साथ लड़ते तो उनकी लड़ाई के साथ अस्पृश्यों की लड़ाई पीछे छूट जाती। क्योंकि उन्हीं के लोगों में से कांग्रेस द्वारा कुछ विरोध करने वाले भी खड़े कर दिये जाते जैसे अस्पृश्यों में जगजीवनराम को खड़ा कर दिए।‌ किसानों के नेता पटेल थे ही। वह तो ओबीसी के भी नेता थे। पटेल कांग्रेस के सर्वेसर्वा भी थे। उनके हिलाने से ही कांग्रेस का पत्ता हिलता था। आज ओबीसी में आने वाले मोदी बीजेपी के सर्वेसर्वा हैं।‌ आजादी से लेकर आज तक तो ओबीसी का ही शासन रहा। जैसे आज भी है। अगर ओबीसी का शासन हो और ओबीसी गुलामी का जीवन जी रहा हो तो ओबीसी के ऐसे शासन से ओबीसी का क्या मतलब? यूपी में अस्पृश्यों की भी कई बार सरकार बनी। पर वहां अस्पृश्यता आज भी कायम है। अस्पृश्यों के शासन में अस्पृश्यता कायम रहे। क्या ऐसे शासन को ठीक शासन कहेंगे? गरीबी का अपमान चल सकता है। पर अस्पृश्यता का अपमान नहीं चल सकता। पर खुशी खुशी चल रहा है। पटेल के रहते कैसे डाक्टर अंबेडकर किसानों मजदूरों और अन्य पिछड़ों के नेता हो सकते थे? इस तरह मजदूरों की लड़ाई हाथ में लेने से बाबासाहेब जिन अछूतों की लड़ाई को अपने जीवन का मकसद बना लिए थे। उनकी लड़ाई भी कमजोर पड़ जाती। इसलिए अस्पृश्यों को छोड़कर बाकी समुदायों की लड़ाई का जिम्मा आगे नहीं उठाया।

एक जुलाई 1942 को गांधीजी ने अमेरिका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि वे भारत को आजाद करने के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनायें। इधर 20 जुलाई 1942 को गवर्नर जनरल ने डॉक्टर अंबेडकर को अपनी कार्यकारिणी में मजदूर मंत्री बनाया। यह बात गांधीजी को बर्दाश्त नहीं हुई और उन्होंने 8 अगस्त 1942 को "अंग्रेजों भारत छोड़ो" आंदोलन छेड़ दिया।

बाबासाहेब के अनुरोध पर एक मार्च 1943 को गवर्नर जनरल ने चमार रेजीमेंट के गठन का आदेश दिया।

ब्रिटिश सरकार ने लार्ड लिनलिथगो को 30 सितंबर 1943 को वापस बुला लिया और एक अक्टूबर 1943 को उनकी जगह लार्ड वेवल को भारत भेजा। सर स्टैफोर्ड क्रिप्स की योजना में अस्पृश्यों को कोई अधिकार नहीं था। इस बात की चर्चा कर अंबेडकर ने लार्ड वेवल को भी अपने पक्ष में झुका लिया। 1944 में कलकत्ता की एक मिटिंग में बाबासाहेब ने कहा कि गवर्नर जनरल ने एक अच्छी बात कहा है,उन्होंने गांधी जी से कहा है कि भारत में सत्ता हस्तांतरण से पहले हिन्दुओं, मुसलमानों और अस्पृश्यों में समझौता होना चाहिए।

मार्च 1945 में गवर्नर जनरल लार्ड वेवल एक योजना लेकर विचार विनिमय के लिए ब्रिटेन गये। जब वापस लौटे तो भारतीयों ने भी अपनी अपनी योजनाएं उनको सौंपी।

इस बीच चमार रेजीमेन्ट ब्रिटिश सेना से बगावत कर आजाद हिन्द फौज में शामिल हो गई थी और आजाद हिन्द फौज से मिलकर अंग्रेजों की सेना से युद्ध करने लगी। बाबासाहेब आंबेडकर के अनुरोध पर गवर्नर जनरल ने उसका गठन किया था और अंग्रेजी सेना से ही आजादी की लड़ाई लड़ने लगी। जिसने भर्ती किया। उसी से जंग। इसे क्या कहेंगे? बाबासाहेब डाक्टर आंबेडकर को यह जानकर कैसा लगा होगा? बहुत खुश हुए होंगे क्या? अंग्रेजी सेना के सामने आजाद हिन्द फौज और चमार रेजीमेंट ने सरेंडर कर दिया। सभी सैनिकों को जुलाई 1945 में भारत लाया गया। और भारत के विभिन्न युद्ध बंदी शिविरों में बंद कर दिया गया। आप सोचिए,चमार रेजीमेंट की इस करतूत से ब्रिटिश सरकार खुश होगी कि नाराज होगी? चमार रेजीमेंट को आजादी चाहिए। हिन्दुओं से नहीं ब्रिटेन से चाहिए। अंग्रेजों ने कहा,ठीक है,ले लो आजादी। यहीं से,अस्पृश्यों से अंग्रेजों का मोहभंग होता है और अंत तक रहा।‌ इसके बाद डाक्टर आंबेडकर की कोई बात अंग्रेजों ने नहीं सुनी। फिर कैसे कह सकते हैं कि अंग्रेजों ने यह शर्त रखी थी कि जो संविधान अंबेडकर की सहमति से बनकर आयेगा,उसे ही हम मानेंगे?

जुलाई 1945 में ब्रिटेन में आम चुनाव हुए। हुजूर दल हार गया। मजदूर दल सत्तारूढ़ हुआ। भारत की राजनीतिक समस्या का हल होता न देख अगस्त 1945 के अंत में विचार विनिमय के लिए गवर्नर जनरल फिर ब्रिटेन गये। सितंबर 1945 के मध्य भारत वापस आकर उन्होंने आम चुनाव की घोषणा कर दी।

जो गवर्नर जनरल 1944 में गांधी जी से यह कह रहे थे कि सत्ता हस्तांतरण के पहले हिन्दुओं,मुस्लिमों और अस्पृश्यों के बीच समझौता होना चाहिए। वह गवर्नर जनरल सितंबर 1945 में उससे साफ मुकर गये। देखिए समय कैसे पलटा खा रहा है। इस जहां में अस्पृश्यों के लिए ब्रिटिश हुकूमत के अलावा दूसरा कोई सहारा नहीं था। वह सहारा भी चमार रेजीमेन्ट की बगावत से टूट गया। ब्रिटिश सरकार नाराज हो गई। इस वजह से उसने अस्पृश्यों की मांगों से किनारा कर लिया। जिसकी वजह से आज बाबासाहेब अंबेडकर को ये दिन देखने को मिल रहे थे। पर बाबासाहेब तो जानते ही थे। हमारे लोग कितने सीधे होते हैं। किसी के लालच और बहकावे में जल्दी आ जाते हैं। वरना हजारों साल से गुलाम थोड़े रहते। जुलाई 1945 के आम चुनाव में मजदूर दल की सरकार बनी। इसी ने 1932 में अस्पृश्यों के लिए कम्यूनल एवार्ड दिया था। आज जब देश आजाद हो रहा है तो फिर वही पार्टी सरकार में है। यह एक अजीब संयोग है। पर इस बार उसके तेवर चढ़े हुए हैं। उसके अंदर अस्पृश्यों के प्रति रहम नाम की कोई चीज नहीं। नफरत का भाव भरा है। उसकी दृष्टि में,ये इसी के पात्र हैं। जो जिसका पात्र है उसको वह मिलना चाहिए। चमार रेजीमेंट ने बगावत करके ब्रिटिश सरकार को सोचने पर मजबूर कर दिया कि इनको हिन्दुओं से आजादी नहीं चाहिए। ब्रिटेन से आजादी चाहिए। तो जब ब्रिटेन से आजादी चाहिए तो जाओ आजाद हो जाओ। उसने गवर्नर जनरल को हुक्म दिया। आम चुनाव की घोषणा कर दो। जो पार्टी सत्ता में आयेगी उसी से भारत की आजादी की बात करेंगे। चमार रेजीमेंट पर मुकदमा चला। वह 1946 में बर्खास्त कर दी गई। बड़ी मुश्किल से बाबासाहेब के अनुरोध पर उसका गठन हुआ था। बड़ी बहादुरी से उसने लड़ा भी था। जापान की ताकतवर सेना से लड़ने की ताकत सिर्फ चमार रेजीमेंट में थी। यह अंग्रेजों ने माना था। इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने 1944 में उसे "बैटल आफ कोहिमा" के एवार्ड से नवाजा भी था,पर उसकी एक गलती ने बाबासाहेब डाक्टर अंबेडकर के जीवन भर की मेहनत पर पानी फेर दिया। अस्पृश्यों का भविष्य अंधकार में डाल दिया। ब्रिटिश हुकूमत इतनी नाराज हो गई कि उसने अस्पृश्यों को तीसरा पक्ष मानने से ही इनकार कर दिया। ब्रिटिश हुकूमत ने इनकी हिन्दुओं से आजादी के लिए अपनी ही सत्ता दांव पर लगा दिया था। न हम अस्पृश्यों के लिए कुछ करते न हमारी सत्ता को कोई चुनौती मिलती और हमीं से आजाद होना चाहते हैं। तो जाओ आजाद हो जाओ। अब न डाक्टर अंबेडकर चुनकर आयेंगे न इनसे अस्पृश्यों की आजादी के विषय में कोई वार्ता होगी। हमारे लोग कहते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने यह चेतावनी दिया था कि हम उसी संविधान को मानेंगे जो अंबेडकर को मान्य होगा। इतने के बावजूद भी आप ब्रिटिश सरकार से उम्मीद करते हैं कि वह ऐसा कह सकती है? मगर हर प्रबुद्ध यही कहता है कि उसने ऐसा ही अल्टीमेटम दिया था। इस बगावत की सजा ब्रिटेन ने तो दिया ही,चमार रेजीमेंट को बर्खास्त करके और अस्पृश्यों को तीसरा पक्ष न मानकर। आजाद भारत ने भी दिया। चमार रेजीमेंट आज तक बहाल नहीं हुई। अस्पृश्यों की समस्या आज भी जस की तस। यदि हम तीसरे पक्ष के रूप में रहते तो आज हमारे पास भी बहुत कुछ होता। तब जमींदारी नहीं रही होती और हम भूमिहीन नहीं रहे होते। सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य की स्थापना का आधा काम उसी समय पूरा हो गया होता। बाबासाहेब ने भी नाराजगी की वजह से कभी चमार रेजीमेंट की बहाली का मुद्दा नहीं उठाया। जबकि वे केंद्रीय मंत्री परिषद में थे। जगजीवनराम के उठाने का तो कोई सवाल ही नहीं बनता। वो तो वही बोलेंगे जो गांधीजी बोलने के लिए कहेंगे।

जो भी हो। सारी पार्टियां चुनाव में उतरीं। बाबासाहेब और उनकी पार्टी के लिए यह चुनाव जीवन मरण का प्रश्न था। क्योंकि इन्हीं सदस्यों को संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव करना था। चुनाव के दौरान ब्रिटिश सांसदों का एक दस सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल भारत आया। वह चार हफ्ते तक भारत में रहा। पूरे भारत का दौरा किया। भारतीय नेताओं से वार्ता किया। अंबेडकर से उनकी नब्बे मिनट तक वार्ता हुई। उसने अपनी रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को सौंपी।‌ 10 मार्च को चुनाव हुए। बाबासाहेब की पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। बाबासाहेब खुद चुनाव हार गये। उनकी पार्टी से मद्रास से एक व्यक्ति चुनाव जीता था और बंगाल से योगेन्द्र नाथ मंडल चुनाव जीते थे। बाबासाहेब से योगेन्द्र नाथ मंडल की मुलाकात 1943 में बंबई में हुई थी जब योगेन्द्र नाथ मंडल मुस्लिम लिग की 1937 की सरकार में मंत्री थे और भारत के सहकारिता विभाग के मंत्रियों की बैठक में भाग लेने बंबई गये थे। उस समय बाबासाहेब गनर्नर जनरल की कार्यकारिणी में मजदूर मंत्री थे। बंबई के सेंट्रल रेलवे स्टेशन के सूट में बाबासाहेब ठहरे हुए थे। वहीं योगेन्द्र नाथ मंडल बाबासाहेब से मिले। तब से योगेन्द्र नाथ मंडल एससी फेडरेशन की नेशनल कार्यसमिति के सदस्य थे।

बाबासाहेब के लिए यह विकट समय था। इसी बीच 15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने अपनी घोषणा द्वारा भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के अधिकार को स्वीकार कर लिया और कहा कि अब हम भारत को आजाद कर देंगे। भारत राष्ट्र कुल में रहे या फुटकर उससे निकल जाय। यह उस पर निर्भर है। आगे उसने यह भी कहा कि अब हम अस्पृश्यों को भारत की आजादी में रोड़ा बनने नहीं देंगे। यह चमार रेजीमेंट की बगावत का नतीजा था। प्रधानमंत्री ने आगे की कार्यवाहियों के लिए सर स्टैफोर्ड क्रीप्स,एबी एलेकजेंडर और तत्कालीन भारत मंत्री पेथिक लारेंस इन तीन मंत्रियों का प्रतिनिधि मंडल भारत भेजा। इस उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने सभी भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श किया। चुनाव के प्रतिकुल फैसले से अंबेडकर की स्थिति दयनीय हो गई थी। उनका दम घुट गया था। प्रतिनिधि मंडल के सामने उन्होंने अपनी मांगे रखी। केंद्रीय एवं प्रांतीय विधानसभाओं में प्रर्याप्त प्रतिनिधित्व, सरकारी नौकरियों में आरक्षित स्थान इत्यादि,दिया जाय और इन्हें संविधान में भी डाला जाय। 16 मई को कैबिनेट मिशन ने अपना निर्णय सुनाया। पहले तो अंबेडकर की सभी मांगों को सिरे से खारिज कर दिया और तीन बातें और कहीं।

1.प्रांतों से युक्त एक संघ होगा।

2.संविधान बनाने का अधिकार होगा और

3.अस्थाई सरकार की नियुक्ति होगी।"

बाबासाहेब ने दिल्ली छोड़ दिया। बंबई पहुंचे। देश में अफरातफरी का माहौल था। वहां उनका भारत प्रिंटिंग प्रेस जला दिया गया। उन्हें भी जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। बाबासाहेब जरा भी विचलित नहीं हुए । उन्होंने अपने लोगों का आवाहन किया कि जान की बाजी लगकर प्रयास करो। अगर आजाद भारत पुनः अतीत कालीन परंपरा की ओर मुड़ गया तो पुनः आपको सरकारी नौकरियों और समाज से उखाड़ दिया जायेगा।

जुलाई 1946 में संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव हुआ बाबासाहेब के लिए समस्या थी । कैसे संविधान सभा में पहुंचेंगे? बहुत निराश थे। कोई मार्ग सूझ नहीं रहा था। पर एक आशा की किरण दिखी। वे कलकत्ता गये। वहां जाकर योरोपीय सदस्यों से इस उम्मीद से मिले कि शायद वे अपने तरफ से मुझे संविधान सभा में भेज दें। पर उन्होंने साफ मना कर दिया। कहा कि हमने संविधान सभा के चुनाव का बहिष्कार कर रखा है। इसलिए इसमें हम आपकी मदद नहीं कर सकते। उधर पटेल ने घोषणा कर रखी थी कि हमने अंबेडकर के लिए खिड़की दरवाजे तो क्या रोशनदान तक बंद कर रखे हैं। वह संविधान सभा में जा नहीं सकते। तब बाबासाहेब ने योगेन्द्र नाथ मंडल से कहा कि आशा कि एक किरण थी। वह भी समाप्त हो गई। अब मेरे संविधान सभा में जाने की कोई संभावना नहीं दिख रही है। तब योगेन्द्र नाथ मंडल ने उन्हें ढाढ़स बंधाया। कहा,आप निराश न हों। हम पूरा प्रयास करेंगे आपको संविधान सभा में भेजने के लिए। जब बाबासाहेब कलकत्ता से दिल्ली आ गये तो इतने निराश थे कि फिर उन्होंने दिल्ली से योगेन्द्र नाथ मंडल को पत्र लिखा कि मेरे संविधान सभा में जाने की कोई संभावना नहीं है। इसलिए अपना प्रयास छोड़ दो। लेकिन योगेन्द्र नाथ मंडल ने पत्र द्वारा सूचित किया कि आप निराश न हों। हम अंत तक प्रयास करेंगे।‌ योगेन्द्र नाथ मंडल और शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के कार्यकर्ताओं ने जी तोड़ मेहनत की। उनके खिलाफ शरत चंद्र बोस खड़े थे। योगेन्द्र नाथ मंडल और एससी के कार्यकर्ताओं की मेहनत रंग लाई और बाबासाहेब सर्वाधिक मतों से चुनकर संविधान सभा में पहुंचे।

अब बाबासाहेब गवर्नर जनरल की अंतरिम मंत्री परिषद के लिए प्रयास शुरू किये। प्रधानमंत्री को निवेदन किया। परंतु जब अंतरिम मंत्री परिषद के सदस्यों के नाम 24 अगस्त 1946 को घोषित हुए तो उसमें बाबासाहेब का नाम नहीं था। जगजीवनराम का नाम था। निराशा उनका साथ नहीं छोड़ रही थी। ऐसा लगता है,ब्रिटिश सरकार ने भी अपने सारे दरवाजे उनके लिए बंद कर दिए थे। जैसे संविधान सभा में जाने के सारे दरवाजे पटेल ने बंद कर दिए थे। फिर भी वह अंतीम प्रयास के लिए 15 अक्टूबर 1946 को लन्दन गये। वहां पहुंचने पर एक पत्रकार के पूछने पर कि 2 अक्टूबर को योगेन्द्र नाथ मंडल को मुस्लिम लीग की ओर से मंत्री परिषद में शामिल किया गया है। इस पर आपके क्या मत हैं। तो इसके जबाब में उन्होंने खुशी जाहिर किया। आगे कहा कि ब्रिटिश सरकार ने अस्पृश्य वर्ग के साथ विश्वासघात किया है। भारत में गृहकलह शुरू हो गया है। भारत में 1935 के कानून के आधार पर राजकाज शुरू कर दस वर्ष बाद अखंड भारत का राज्य भारत के दलों को सौंप दिया जाय। ऐसा सुझाव दिया। लंदन में प्रधानमंत्री एटली और भारत मंत्री दोनों से चर्चा की। पूर्व भारत मंत्री लार्ड टेंपली हुड से मिले। सैमुअल होर से मिले। ब्रिटिश लोक सभा के सदस्यों की बैठक आयोजित की। उनके सामने अपनी बात रखी। पर कोई आश्वासन नहीं मिला। ब्रिटिश सरकार की अस्पृश्यों से नाराजगी अब भी कायम थी। बस इतना कहा कि परिवर्तित वातावरण में संविधान समिति के लिए अगर कुछ हो सके तो किया जाय। इस तरह निरुत्साही और निराश मन:स्थिति में उनको भारत लौटना पड़ा।

             9 दिसंबर 1946 को सच्चिदानंद सिन्हा की अध्यक्षता में संविधान सभा की पहली बैठक हुई। डा राजेंद्र प्रसाद को स्थाई अध्यक्ष चुना गया। इसके बाद बैठक समाप्त हो गई। अगली बैठक 13 दिसम्बर 1946 को हुई। इस बैठक का मुस्लिम लीग ने बहिष्कार किया था। इसी बैठक में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आठ विन्दुओं का एक उद्देश्य संकल्प प्रस्तुत किया था।‌ एम आर जयकर ने इस पर एक संशोधन पेश किया। इनके इस संशोधन प्रस्ताव पर पूरी संविधान सभा खफा हो गई। सदस्यों ने यह कहकर उनकी निन्दा की कि जयकर हमेशा शुभ काम में टांग अड़ाते हैं। सदस्यों की निंदा से तंग आकर जयकर ने संविधान सभा से स्तीफा दे दिया। उद्देश्य संकल्प पर बोलने के लिए जब डा राजेन्द्र प्रसाद ने बाबासाहेब अंबेडकर को आमंत्रित किया तो पूरी संविधान सभा में एक अजीब सा माहौल उत्पन्न हो गया। सबकी नजरें बाबासाहेब पर टिक गईं। कुछ सदस्यों को लगा कि अंबेडकर,जयकर का समर्थन कर अपनी इज्जत गंवा बैठेंगे। क्योंकि कांग्रेस श्रेष्ठियों कि खिलाफ बोलना,अपने लौकिक जीवन की इतिश्री करना है। कुछ कांग्रेस के सदस्य अपने कट्टर दुश्मन को पानी पिलाने के लिए आतुर थे। कुछ बीच बीच में हुटिंग करके उनको हतोत्साहित करने को आतुर थे। बाबासाहेब डाक्टर अंबेडकर जब खड़े हुए तो एक नजर घुमाकर सभी सदस्यों की तरफ देखा। और अपना भाषण शुरू किया-

"पंडित नेहरू जी के उद्देश्य संकल्प का पहला भाग जिसमें संविधान का उद्देश्य व्यक्त किया गया है निर्विवाद है। हालांकि आज जिन पर अन्याय हो रहा है,उनका निराकरण कैसे हो,नहीं बता रहा है। फिर भी वाद ग्रस्त नहीं है। आज हम आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से विभाजित हैं। हमने विरोधी छावनियां बना रखी हैं। और मैं भी युद्ध की छावनी बना रही एक जमात का नेता हूं। लेकिन परिस्थिति और समय के आते ही हमारी एकता में कोई भी बात रूकावट नहीं डाल सकेगी। यद्यपि जातियां और पंथ अनेक हैं। फिर भी हम एक राष्ट्र बनेंगे। मुस्लिम लीग विभाजन पर अड़ी हुई है। पर जब उनके भी दिलों पर प्रकाश पड़ेगा तो उन्हें लगेगा कि अखंड भारत सबके लिए हितकारी है। कांग्रेस सदस्य सुलह करने का एकबार फिर प्रयास करें। राष्ट्र का भविष्य तय करते समय नेता,व्यक्ति या राजनीतिक दल की प्रतिष्ठा को महत्व नहीं देना चाहिए। उन्होंने तीन हल सुझाया।

1.एक दल हमेशा के लिए एक दल में समा जाय। 2.संधि के बारे में विचार विमर्श कर संधि करे।

3.तीसरा तरीका युद्ध का।

युद्ध का विकल्प ठीक नहीं होता। उन्होंने कहा,सत्ता देना एक बार आसान है। अक्लमंदी देना मुश्किल है। अपने साथ देश के सभी वर्गों को ले जाने का और और अंत में एकता का मार्ग स्वीकार करने की हममें ताकत और अक्लमंदी है,यह हमें अपने व्यवहार से प्रत्यक्ष में लाना चाहिए। ............।"

बाबासाहेब अंबेडकर का भाषण इतना आस्थापूर्ण था कि उसका संविधान समिति पर बड़ा असर पड़ा। कांग्रेस सदस्यों ने बीच-बीच में तालियों की गड़गड़ाहट से उनका समर्थन किया। जो हाथ उन्हें मारने के लिए उठ रहे थे वे हाथ तालियां बजा कर उनका

अभिनंदन

करने लगे। यह बाबासाहेब के लोमहर्षक जीवन का एक संस्मरणीय समर प्रसंग का दिन था। आज पूरे भारत ने उन्हें ठीक से सुना और समझा।

21 मार्च 1947 को गवर्नर जनरल लार्ड वेवल की जगह माउंटबेटन गवर्नर जनरल बनकर आये। भारत का संविधान कैसा हो? इस पर विचार हेतु बाबासाहेब ने संविधान सभा के सदस्यों को देने के लिए मार्च 1947 में एक ज्ञापन लिखा। वह स्टेट्स एवं माइनारिटी के नाम से बाद में प्रकाशित हुआ।‌ उसमें उन्होंने एक बात यह भी लिखा था कि मैं अस्पृश्यों के लिए सेपरेट एलेक्टोरेट की अपनी मांग पर आज भी कायम हूं। उधर भारत पाक विभाजन की प्रक्रिया जोरों पर थी। ऐसा माना जाता है कि माउंटबेटन ने भी जिन्ना को समझाया कि वह पाकिस्तान की रट छोड़कर अखंड भारत का रास्ता साफ कर दें। पर वह जिद्दी स्वभाव के व्यक्ति थे। टस से मस नहीं हुए। गांधीजी ने भी 5 अप्रैल 1947 को माउंटबेटन को पत्र लिखा कि वह जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने के लिए सहमत हैं। उन्हें प्रधानमंत्री बनायें। पर जिन्ना उस पर भी राजी नहीं हुए। उन्हें भय था कि आज तो हम प्रधानमंत्री बन जायेंगे पर कल बहुसंख्यक हिन्दू हमें वोट नहीं देंगे और हमारे लोग हमेशा के लिए बहुसंख्यक हिन्दुओं के अधीन हो जायेंगे। इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री बनने का आफर स्वीकार नहीं किया। तो ऐसी स्थिति में बंटवारा तो तय था। यह सच है कि अगर कांग्रेस बंटवारा स्वीकार न करती तो शायद पाकिस्तान नहीं बनता। पर झगड़ा तो बरकरार ही रहता। फिर आजादी का क्या होता? अंग्रेजी हुकूमत भी भारत छोड़ने का मूड बना चुकी थी। सभी नेता लड़ते लड़ते थक चुके थे। बुढ्ढे हो चले थे। इन परिस्थितियों के बीच लार्ड माउंटबेटन ने कांग्रेस के नेताओं को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वे भारत पाक दो राष्ट्र के सिद्धांत को मान लें। इस तरह दो जून को कांग्रेस कार्यसमिति ने गांधी जी की उपस्थिति में भारत पाक विभाजन का प्रस्ताव पारित कर लार्ड माउंटबेटन को सूचित किया। तीन जून को ब्रिटिश सरकार से विचार-विमर्श कर माउंटबेटन ने अपनी नई योजना की घोषणा की। उस योजना के अंतर्गत

1. दो राज्य शासनतंत्र

2. दो संविधान समितियों की नियुक्ति

3.सील्हट(सिलेट) और सीमा प्रांत में सर्व मत लेना। उस निर्णय के मुताबिक था कि वहां के लोग पाकिस्तान में रहना चाहते हैं या भारत में सम्मिलित होना चाहते हैं। यह विकल्प था।

भारत पाक बंटवारे से एक नई समस्या उत्पन्न हो गई। जिस क्षेत्र से बाबासाहेब और योगेन्द्र नाथ मंडल संविधान सभा में पहुंचे थे वह क्षेत्र खुलना,जैस्सोर और फरीदपुर,बरिशाल और उसके साथ दो और क्षेत्र चिटगांव ट्राइबल हिल एरिया और सिलहट (सिलेट) पाकिस्तान में चला गया। क्योंकि वहां के लोगों ने योगेन्द्र नाथ मंडल के प्रभाव में आने के कारण अपना विकल्प पाकिस्तान में शामिल होने के लिए दिया था। इसे बाबासाहेब चाहते हुए भी नहीं रोक पाये। इस तरह संविधान सभा की जो सदस्यता योगेन्द्र नाथ मंडल के प्रयास से मिली थी। वह उन्हीं के कारण समाप्त भी हो गई। अब योगेन्द्र नाथ मंडल भी बाबा साहेब अंबेडकर का साथ छोड़कर जिन्ना के साथ हो लिए थे। उधर अंग्रेजों की भृकुटी तनी। इधर योगेन्द्र नाथ मंडल का साथ छूटा। बुरा वक्त आता है तो ऐसा ही होता है। योगेन्द्र नाथ मंडल 1939-40 में कांग्रेस में जाना चाहते थे। पर कांग्रेस के लोगों की उपेक्षा से वे 1940 में जिन्ना के साथ हो लिए। जिन्ना ने पाकिस्तान का भौगोलिक क्षेत्र बढ़ाने के लिए उनका खूब उपयोग किया। गांधीजी ने कभी नहीं सोचा होगा कि एक योगेन्द्र नाथ मंडल के जाने से बंगाल का इतना बड़ा भू भाग भारत से निकल जायेगा।लोग कहते हैं कि कांग्रेस ने जानबूझकर बाबासाहेब की सदस्यता रद्द करने के लिए वह क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिया। यह सच्च नहीं लगता। 1946 में दो प्रांतों में मुस्लिम लीग के ज्यादा सदस्य जीते थे। पंजाब और बंगाल। इन्हीं का विभाजन होना था। अगर योगेन्द्र नाथ मंडल नहीं चाहते तो वह क्षेत्र पाकिस्तान में शामिल नहीं होता। क्योंकि वहां के वासिंदो के लिए योगेन्द्र नाथ मंडल मसीहा थे। योगेन्द्र नाथ मंडल को जिन्ना ने ऐसी घूंट पिला दी थी कि वे उनके होकर रह गये थे। जैसा योगेन्द्र नाथ मंडल ने चाहा,वैसा वहां के लोगों ने किया। जो एक गलत कदम था। नेताओं की अंधभक्ति समाज को अंधकार में धकेल देती है। खुलना,जैस्सोर, फरीदपुर ,बरिशाल,चीटगांव ट्राइबल हिल्स एरिया और सिलहट (सिलेट) के लोगों के साथ ऐसा ही हुआ। खुलना,जैसोर का पाकिस्तान में जाना, बाबासाहेब के लिए चिंता का विषय बन गया। अब वो क्या करें? संविधान सभा में जाने का अब कोई मार्ग नहीं बचा। योगेन्द्र नाथ मंडल की इस ऐतिहासिक गलती की सजा पूरे देश भर के अस्पृश्यों को मिलने वाली थी। अपने समाज की मुक्ति के लिए बाबासाहेब का पूरा त्याग, बलिदान और तपस्या मिट्टी में मिलने वाला था। पाकिस्तान चुनने की सजा,बाद में योगेन्द्र नाथ मंडल और वहां के लोगों को भी मिली। अक्टूबर 1950 को बड़े बेआबरू होकर वापस लौटे। और गुमनाम जिंदगी जीते हुए 5 अक्टूबर 1968 को उनकी मृत्यु हुई। शर्म के मारे योगेन्द्र नाथ मंडल बाबासाहेब से कभी नहीं मिले। इस तरह एक ऐतिहासिक गलती चमार रेजीमेंट ने की। दूसरी ऐतिहासिक गलती योगेन्द्र नाथ मंडल ने की।‌

‌‌। धनंजय कीर ने लिखा है,तिलक कालीन हिन्दुओं ने बंगाल का बंटवारा रद्द किया किन्तु गांधी कालीन हिन्दुओं ने शरण में जाकर बंगाल के बंटवारे की याचना की। (धनंजय कीर की पुस्तक "डा. बाबासाहेब अंबेडकर जीवन चरित" पृ.375) इसका मतलब तो यह है कि जानबूझकर वह क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिया गया। ताकि बाबासाहेब की संविधान सभा की सदस्यता समाप्त हो जाय। लेकिन ऐसा प्रतीत तो नहीं होता। अगर योगेन्द्र नाथ मंडल का क्षेत्र उनकी मरजी के विरुद्ध कांग्रेस द्वारा जबर्दस्ती पाकिस्तान को दिया गया होता तो जरूर योगेन्द्र नाथ मंडल का विरोध कहीं न कहीं दिखाई देता। पर ऐसा कहीं नहीं दिखता। वह तो खुद उतावले थे पाकिस्तान में शामिल होने के लिए। उन्होंने फतवा निकाला था कि पाकिस्तान के अस्पृश्य लोग जिन्ना को अपने संरक्षण कर्ता के रूप में मानें। (धनंजय कीर की पुस्तक पृष्ठ-379)। योगेन्द्र नाथ मंडल जब पाकिस्तान छोड़कर भारत आये तो शर्म के मारे कभी बाबासाहेब से नहीं मिले। क्यों नहीं मिले? जबकि बाबासाहेब से मिलने के लिए 1947 से 1956 तक नौ वर्ष का समय था। बाबासाहेब के इतने खास व्यक्ति का इतने समय तक न मिलना वह भी उसके गर्दिश के क्षणों में कुछ न कुछ सवाल तो खड़ा करता ही है कि वह क्षेत्र किसके वजह से पाकिस्तान में गया। निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वह क्षेत्र योगेन्द्र नाथ मंडल की वजह से पाकिस्तान में गया। कांग्रेस ने वह क्षेत्र बाबासाहेब की सदस्यता रद्द करने के लिए नहीं दिया था। हां,कांग्रेस जाने से रोक नहीं पाई। या रोकना नहीं चाहा। या रोकने का प्रयास नहीं किया। या खुशी खुशी जाने दिया। यह कह सकते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने चेतावनी दिया था कि हम उसी संविधान को मान्यता देंगे जो डा अम्बेडकर की सहमति से बन कर आयेगा। लेकिन ऐसे स्टेटमेंट तो 1939 में लार्ड लिनलिथगो ने दिया था। कहा था,कोई भी राजनीतिक सुधार हिन्दू मुस्लिम और अल्पसंख्यकों की सहमति से ही होगा। उसी ने डाक्टर अंबेडकर को 1942 में अपनी कौंसिल में मजदूर मंत्री बनाया था। लार्ड वेवल ने भी 1944 में गांधीजी से कहा था कि सत्ता हस्तांतरण से पूर्व हिन्दुओं मुसलमानों और अस्पृश्यों में समझौता होना चाहिए। पर 1945 में वह मुकर गये थे। इसकी वजह नहीं जानना चाहिए कि क्यों मुकर गये? प्रधानमंत्री एटली ने भी ,1946 में ही साफ कह दिया था कि हम अस्पृश्यों को भारत की आजादी में रोड़ा बनने नहीं देंगे। फिर कहां से ये बात आ गई कि अंग्रेजों ने ये कहा था कि हम उसी संविधान को मान्यता देंगे जो अंबेडकर की सहमति से बनकर आयेगा? यह किसने कहा? कब कहा? धनंजय कीर ने भी अपनी किताब में इस तरह का कोई स्टेटमेंट नहीं छापा है जिसमें अंग्रेजों ने कहा हो कि हम उसी संविधान को मान्यता देंगे जो अंबेडकर की सहमति से बनकर आयेगा। जबकि धनंजय कीर द्वारा लिखी बाबासाहेब की जीवनी उनके जीवन काल 1954 में ही प्रकाशित हो चुकी थी। धनंजय कीर ने कुछ बिन्दुओं पर स्पष्टीकरण के लिए बाबासाहेब से चर्चा भी किया था। बाबासाहेब को वह पुस्तक नानक चंद रत्तू ने दिखाया भी था। इसलिए यह कहना कि अंग्रेजों ने इनको बाध्य कर दिया था कि हम उसी संविधान को मानेंगे,जो अंबेडकर को मान्य होगा,इसलिए संविधान सभा में बाबासाहेब को लाये, कहीं से भी प्रमाणित नहीं होता। यदि ऐसा होता तो बाबासाहेब जमींदारी उन्मूलन पर अड़ जाते। न जमीदारी रहती न जमींदार रहते न भूमिहीन रहते।‌ सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य का आधा काम उसी समय पूरा हो गया होता। तो आज इतना अत्याचार नहीं होता। लोग अत्याचार का जबाब अत्याचार से देने में सक्षम रहते। कुछ लोग कहते हैं कि बाबा साहेब जैसा विद्वान संविधान बनाने वाला कोई दूसरा था नहीं। जैसे लगता है इसका पता इनको 1947 में लगा। बाबासाहेब की सारी डिग्रियां तो 1924 से पहले की हैं। हर क्षेत्र, इतिहास शास्त्र, समाजशास्त्र,अर्थशास्त्र,कानूनशास्त्र, मानवशास्त्र,धर्मशास्त्र सारे शास्त्रों की मास्टर और डाक्टर डिग्रियां लेकर समर भूमि में उतरे थे। वैसे भी इनको ऐसे संविधान की जरूरत ही नहीं थी जैसा बाबासाहेब बनाना चाहते थे। इनको तो मनुस्मृति जैसा संविधान चाहिए था।‌ फिर बाबासाहेब की ऐसी विद्वता उनके किस काम की?,,

तो फिर क्या मजबूरी हो सकती है संविधान सभा में लाने की?

उत्तर यह है कि भारत पाक बंटवारे से गांधीजी एकदम विचलित हो गये थे। उन्हें यह भय सताने लगा था कि कहीं अंबेडकर को अलग थलग करने से देश का दूसरा विभाजन न हो जाय। जैसा जिन्ना को करने से पाकिस्तान बना और योगेन्द्र नाथ मंडल की उपेक्षा से खुलना,जैस्सोर, फरीदपुर, बरिसाल, चिटगांव ट्राइबल एरिया,सिलहट(सिलेट) पाकिस्तान में चला गया,पृथक निर्वाचन का मुद्दा जिसे अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल में ले जाने से आजादी खतरे में पड़ सकती थी,बाबासाहेब ने अक्टूबर 1946 में जब ब्रिटेन गये थे तो उन्होंने सुझाव दिया था कि 1935 के कानून के आधार पर राज-काज चलाया जाय और दस वर्ष बाद सभी दलों को भारत सौंप दिया जाय,बाबासाहेब का संविधान सभा में दिया गया आस्थापूर्ण भाषण,जिसमें बाबासाहेब ने कहा कि युद्ध की छावनियां बना रही एक जमात का मैं भी नेता हूं। इससे कांग्रेसियों का विचार परिवर्तन हुआ और गांधीजी डा अंबेडकर की शर्तों को मानने,उनको संविधान सभा में लाने,उन्हें मंत्री बनाने और संविधान बनाने का सारा जिम्मा उनको सौंपने के लिए तैयार हो गये। इस प्रकार बाबासाहेब की "विद्वता समाज के लिए किया गया उनका संघर्ष,उनकी त्याग तपस्या,देश भक्ति, देश के एक ओर बंटवारे का भय" ने रंग लाया और जिन लोगों ने बाबा साहेब को संविधान सभा में न आने देने के लिए सारे दरवाजे बंद कर रखे थे,वे सारे दरवाजे खोल दिये। और एम आर जयकर के स्तीफे से छ: महीने से खाली पड़ी सीट से,निर्विरोध जिताकर संविधान सभा में लाये। उन्हें कानून मंत्री बनाये। ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन बनाये। यह भारत के इतिहास की एक महत्वपूर्ण एवम् चमत्कारिक घटना है। जिसे हल्के में लेना ठीक नहीं,बस यह कहकर की संविधान बनाने वाला बाबासाहेब के अलावा कोई दूसरा था ही नहीं।

बाबासाहेब संविधान सभा में सिर्फ अस्पृश्यों के लिए ही नहीं जाना चाहते थे। भारत की पूरी जनता विशेषकर सारे शोषितों के लिए, मानवता पसंद लोगों के लिए जाना चाहते थे और गये। कैसे गये? आपने ऊपर पढ़ा ही है। वहां जाकर उन्होंने संविधान में सारे प्रावधान डालकर जिन्हें वह डालना चाहते थे,अपना काम पूरा कर दिया। देश की बागडोर वयस्क मताधिकार के माध्यम से देश की जनता के हाथ में सौंप दिया। उसके हाथ में अपनी और अपने परिवार की तकदीर लिखने की कलम थमा दिया। कुछ प्रावधान मजबूरी में न भी डाल सके। पर वयस्क मताधिकार से जनता को भारत का और भारत के संविधान का मालिक बना दिया। वह उसका पालन कराए ,चाहे न कराए,चाहे पूरा संविधान ही बदल दे। उसकी मर्जी। पर अब से जनता का शासन,जनता के द्वारा,जनता के लिए हो गया। जयभीम।

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  1. बहुजनों के साथ सामाजिक अन्याय आज से ३२७५ वर्ष पूर्व शुरू हुआ। तब ये अनार्य, दास दस्यु,दैत्य,दानव राक्षस के नाम से जाने जाते थे। बुद्ध के समय शूद्र के नाम से जाने जाने लगे। इन्हीं शूद्रों को बुद्ध ने बहुजन नाम दिया था। क्योंकि इनकी संख्या बहुत ज्यादा थी। इन्हीं को बाबासाहेब अंबेडकर ने भारत के संविधान में पिछड़ा वर्ग कहा। अल्पजन जो तब भी आर्य,द्विज ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कहे जाते थे, आज भी कहे जा रहे हैं। तब भी अल्प संख्या में थे। आज भी अल्प संख्या में हैं। पर शूद्रों के साथ इनका सामाजिक अन्याय आज भी जारी है। प्राचीन काल में भी राज इन शूद्रों का था। फिर भी अपने ही राज में इनके साथ सामाजिक अन्याय होता था। जैसे आज केंद्र में नरेन्द्र मोदी जी की सरकार है जो ओबीसी के हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में बीस वर्षों तक एससी-एसटी ओबीसी की सरकार रही। इसी तरह देश के हर प्रांतों में ओबीसी की सरकारें हैं। फिर भी सामाजिक अन्याय हो रहा है। प्राचीन काल में बुद्ध के समकालीन राजा बिंबिसार से भारत का इतिहास प्रारंभ होता है। तब से गुप्त काल तक एक से एक महा प्रतापी राजा हुए। नंद बंश में महापद्मनंद, मौर्य बंश में सम्राट अशोक और गुप्त बंश में रामगुप्त, समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य जैसे पराक्रमी शू्द् समाज से राजा हुए। पर शू्द्र समाज के साथ सामाजिक अन्याय उसी तरह जारी रहा जिस तरह आज मोदी के राज में जारी है। हम सम्राट अशोक के शासनकाल को अच्छा मानते हैं पर विमलचंद पांडेय ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि उनके शासन काल में शूद्रों को तक्षशिला विश्वविद्यालय में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। आज लोकतंत्र में जनता का शासन जनता के द्वारा जनता के लिए है। पर मोदी राज में मेडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में पिछड़े समाज के लोगों को प्रवेश नहीं मिल रहा है। संविधान के थोड़ा सा पालन से कुछ हद तक सामाजिक न्याय प्राप्त हो रहा था । पर आज अपने राज में बहुजन समाज सामाजिक न्याय से दूर होता जा रहा है। महंगी शिक्षा होने से शिक्षा से दूर नौकरियां समाप्त होने से नौकरियों से दूर होता जा रहा है। इसका मूल कारण यह है कि सत्ता भले ओबीसी के हाथ में रही पर उसका नियंत्रण हमेशा अल्प जन समाज के हाथ रहा। आज भी है। बहुजन समाज सत्ता तो चाहता है। उसको मिल भी जाती है पर नियंत्रित अल्पजन से होता है। यही उसकी दुर्दशा का मूल कारण है।

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