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Friday, 11 February 2022

मुद्दा विहीन चुनाव

आज भारत के पांच राज्यों में चुनाव का बिगुल बजा हुआ है। जनता को अपने मन माफिक सरकार चुनना है। भारत के संविधान में व्यवस्था है कि हर पांच वर्ष बाद चुनाव होगा और जनता अपने मन माफिक सरकार का चुनाव करेगी। भारत का संविधान ब्रिटिश हुकूमत द्वारा कराये गये सन् १९४६ के चुनाव द्वारा भारत के साढ़े तेरह पर्सेंट जनता द्वारा चुने गए संविधान सभा के सदस्यों ने बनाया है। क्योंकि उस समय इतने ही लोगों को वोट का अधिकार था। जब संविधान बना तो संविधान सभा ने देश के सभी २१ वर्ष के लोगों को वोट का अधिकार दिया। बाद में राजीव गांधी ने २१ वर्ष की उम्र को घटाकर १८ वर्ष कर दिया। अब हर १८ वर्ष का व्यक्ति के पास वोट करने का अधिकार है। संविधान सभा के सदस्यों ने कहा कि हम संविधान में ऐसी व्यवस्था बनाये हुए हैं कि जनता जब चाहे संविधान में संशोधन कर सकती है या पूरे संविधान को बदलकर अपने लायक संविधान बना सकती है। यदि वह ऐसा करना चाहती है तो बस इसके लिए उसे संसद में जनता द्वारा चुने गए सांसदों का दो तिहाई बहुमत चाहिए। हमने साढ़े तेरह पर्सेंट जनता के बनाये हुए संविधान को आगे आने वाली पीढ़ियों पर थोपा नहीं है। बल्कि इस बात के लिए व्यवस्था भी बना दिया है कि वे जब चाहे उसे बदल भी सकते हैं। संशोधित भी कर सकते हैं। अपने अनुकूल बना भी सकते हैं।
              संविधान सभा ने संविधान बनाया तो संविधान के कुछ लक्ष्य निर्धारित किए और संविधान की उद्देशिका में संविधान के प्रथम पृष्ठ पर लिख दिया कि संविधान को इन लक्ष्यों को प्राप्त करना है और इसका दायित्व जनता को सौंपा कि वह देखे कि इसमें से कितना प्राप्त हुआ? कितना बाकी है और जो बाकी है वह कब तक प्राप्त हो जायेगा। वह सरकारों के लिए टारगेट निर्धारित करे। क्या जनता इन सब बातों को जानती है कि उसके ऊपर संविधान सभा ने इतना बड़ा दायित्व सौंपा है? जनता तो निपट निरक्षर भैंस बराबर है। जनता का जो पढ़ा-लिखा तबका है,क्या उसे यह सब मालूम है। मैं समझता हूं,उसे भी नहीं मालूम। मालूम होना चाहिए। इसीलिए यह पोस्ट लिख रहा हूं।
      पहला लक्ष्य है समता। समता में सामाजिक समानता, आर्थिक समानता और राजनीतिक समानता प्राप्त करने का लक्ष्य। क्या जनता को इसका ज्ञान है कि हमें संविधान ने यह लक्ष्य दिया है प्राप्त करने के लिए? क्या वह ये तीनों तरह की समानता प्राप्त कर ली है? क्या जनता की सामाजिक असमानता समाप्त हो गई है? क्या आर्थिक असमानता समाप्त हो गई है? क्या राजनैतिक असमानता समाप्त हो गई है? नहीं तो कब तक समाप्त हो जायेगी। 
         दूसरा लक्ष्य है, स्वतंत्रता। स्वतंत्रता में खुद इस बात को महसूस करना कि वह स्वतंत्र है। किसी का गुलाम या नौकर नहीं है। क्या गरीब जनता पूंजीपतियों जमींदारों की गुलाम नहीं है? क्या इसे स्वतंत्रता कहेंगे? सरकारी नौकर का अर्थ है शासन का एक अंग। सरकारी विभाग जनता द्वारा चुनी गई सरकार खुद समाप्त कर रही है। क्या जनता को नहीं पता कि पूंजीपतियों और जमींदारों का गुलाम बने रहना स्वतंत्रता नहीं है? क्या जनता को यह मालूम है कि संविधान ने हमारे लिए ये लक्ष्य निर्धारित किया है और हमें प्राप्त करना है? 
           तीसरा लक्ष्य है,बन्धुता,आपसी भाईचारा बनाए रखना। क्या जनता को यह पता है कि संविधान ने हमारे लिए यह लक्ष्य निर्धारित किया है? 
             चौथा लक्ष्य है,न्याय। न्याय में सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय और राजनीतिक न्याय। क्या जनता को यह मालूम है कि संविधान ने हमारे लिए यह लक्ष्य निर्धारित किया है और क्या उसे ये तीनों तरह के न्याय मिल चुके हैं?
                यह तो संविधान का उद्देश्य हो गया। संविधान ने संविधान के भाग तीन में जो अनुच्छेद १२ से लेकर अनुच्छेद ३५ तक है,में कुछ मौलिक अधिकार भी दिया है और भाग तीन के अनुच्छेद १३(२) में कहा है कि राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बनायेगा जो इस भाग में दिए गए मौलिक अधिकारों को छिनता हो या कम करता हो। यदि ऐसा कोई कानून बनाता है तो, जितनी मात्रा तक वह छिनेगा या कम करेगा उतनी मात्रा तक शून्य समझा जायेगा। 
              "द स्टेट शैल नाट मेक एनी ला व्हीच टेक्स अवे ओर एब्रिजेज द राइट्स कन्फर्म बाई दिस पार्टी ऐंड एनी ला मेड इन कन्ट्रावेन्शन आफ दिस क्लाज शैल , टू द एक्सटेंट आफ द कन्ट्रावेंशन,भी एवाएड।"
                लेकिन यह अनुच्छेद यह नहीं कहता कि इस भाग में दिये गये मौलिक अधिकारों का संशोधन नहीं हो सकता। कानून विधानमंडलों में साधारण बहुमत से बनाये जाते हैं। संशोधन के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत के साथ संविधान संशोधन की प्रक्रिया भी निर्धारित है। संविधान ने संविधान संशोधन का अधिकार संविधान के अनुच्छेद ३६८ में संसद को दिया है। राज्यों के विधानसभाओं को नहीं दिया है। 
              यदि संविधान के अनुच्छेद १३ का उप क्लाज (२) मौलिक अधिकार है तो संविधान के अनुच्छेद १६ का उप क्लाज (४) मौलिक अधिकार क्यों नहीं है? उच्चतम न्यायालय कहता है कि १६(४) में आरक्षण की बात मौलिक अधिकार नहीं है। १६(४) कहता है कि-
              "नथिंग इन दिस आर्टिकल शैल प्रिवेन्ट द स्टेट फ्रोम मेकिंग एनी प्रोविजन फोर द रिजर्वेशन आफ एप्वाइंटमेंट्स ओर पोस्ट्स इन फेवर आफ एनी बैकवर्ड क्लास आफ सिटिजन्स व्हीच,इन द ओपिनियन आफ द स्टेट,इज नाट एडेक्वेटली रिप्रेजेंटेड इन द सर्विसेज अन्डर स्टेट।" 
         ‌‌यदि यह क्लाज आरक्षण में आने वाले मौलिक अधिकार के  अवरोधों को समाप्त करता है। उनसे इसकी  रक्षा करता है तो इसका मतलब यह है कि यह भी मौलिक अधिकार है। फिर उच्चतम न्यायालय क्यों कहता है कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है? क्या जनता में यह सवाल नहीं जाना चाहिए और अपने सांसदों से नहीं पूछना चाहिए कि वे संसद में इस पर सवाल क्यों नहीं उठाते? आरक्षित वर्ग से चुन कर जाने वाले प्रतिनिधियों द्वारा ये सवाल क्यों नहीं उठाये जाते कि आरक्षण के विरोधी ही न्यायाधीश उच्च और उच्चतम न्यायालय में क्यों भरे पड़े हैं? ? 
                  दूसरी बात, संविधान में व्यक्ति के मौलिक अधिकार के साथ साथ राज्य के कुछ नीति निर्देशक सिद्धांत भी दिये गये हैं। ये नीति निर्देशक सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद ३६ से लेकर अनुच्छेद ५१ तक हैं और ये अनुच्छेद संविधान की समाजवादी अर्थव्यवस्था की बात करते हैं। तभी संविधान के उद्देश्यों को पूरा किया जा सकता है। अन्यथा नहीं। इन अनुच्छेदों के अन्तर्गत संसद के द्वारा जो नीतियां निर्धारित की जाती हैं वे किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकतीं। क्योंकि ये सब जनता के हित में संसद में पारित करके संसद द्वारा बनाई जाती हैं। और ये डीपीएसपी के क्लाज संविधान में जनता के हित के लिए ही बनाये गये हैं। संविधान कहता है कि 
          "यह जनता कि शासन जनता के द्वारा जनता के लिए है।" 
     व्यक्ति और जनता में अंतर है। अनुच्छेद १२ से लेकर अनुच्छेद ३५ तक के अनुच्छेद व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की बात करते हैं। परन्तु अनुच्छेद ३६ से लेकर अनुच्छेद ५१ तक के अनुच्छेद जनता के हितों की बात करते हैं। जो मौलिक अधिकार हैं वे व्यक्ति के मौलिक अधिकार हैं। और जो डीपीएसपी (डायरेक्टिव प्रिंसिपल आफ स्टेट पोलिसी) है,वह जनता के हित की बात करता है। तो व्यक्ति महत्वपूर्ण है कि जनता महत्वपूर्ण है? समुद्र के आगे एक बूंद की क्या कीमत? यदि देश के समस्त संसाधनों पर कुछ व्यक्तियों के ही अधिकार हैं तो क्या मौलिक अधिकार के आड़ में उनके पास बरकरार रहना चाहिए या जनता के हित में उसका सदुपयोग होना चाहिए। अगर जनता के हित में एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों का हित बाधक है तो राज्य के लिए किसका हित महत्वपूर्ण होना चाहिए। किसके हित की रक्षा करनी चाहिए। अग्रणी वर्ग के व्यक्तियों का हित और कमजोर वर्ग के व्यक्तियों का हित, में से राज्यों को किसके हित को अधिक महत्व देना चाहिए? यदि अग्रणी वर्ग के व्यक्तियों के हित कमजोर वर्ग के व्यक्तियों के हित में बाधक हैं तो क्या राज्य का काम उस बाधा को बरकरार रखकर कमजोर व्यक्तियों को हमेशा के लिए कमजोर बनाया रखना चाहिए या बाधा को हटाकर कमजोर वर्ग को आगे बढ़ने का अवसर देना चाहिए? क्या करना चाहिए? उच्चतम न्यायालय कहता है कि व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना न्यायालय का कर्तव्य है। फिर जनता का हित कैसे होगा। जनता के हितों की रक्षा करना किसका कर्तव्य है। क्या उच्चतम न्यायालय का कर्तव्य नहीं है कि वह कमजोर वर्ग के हितों की भी रक्षा करे? व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में संपत्ति का अधिकार सबसे बड़ा बाधा है। किसी के पास सैकड़ों हजारों एकड़ भूमि है। किसी के पास एक धुर जमीन नहीं है। किसी के पास अरबों की संपत्ति है। किसी के पास एक पैसा भी नहीं है। इतनी असमानता क्यों? क्या ये सब मुद्दा नहीं होना चाहिए? क्या गरीबी मुद्दा नहीं होना चाहिए? क्या लोग भूमिहिन हैं,ये मुद्दा नहीं होना चाहिए? आज उत्तर प्रदेश के साथ पांच राज्यों की जनता सरकार चुनने जा रही है। लेकिन जनता में मुद्दा क्या है? ये जो बातें मैंने कहा है उनमें से एक भी मुद्दा नहीं है। तो क्या मुद्दा है?
              बेरोज़गारी मुद्दा है। महंगाई मुद्दा है। मेरी जाति की सरकार बन जाय,ये मुद्दा है। जातियों की आपनी श्रेष्ठता बरकरार रहे,ये मुद्दा है। कुछ जातियां तो यहां तक कहती हैं कि हम अपनी जाति की पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी को वोट करेंगे तो लोग विश्वास ही नहीं करेंगे। यहां तक मुरर्खता भरी पड़ी है। और ये अपने को जागरूक भी कहते हैं। इनके लिए जाति का भला हो,ये मुद्दा है। एक वर्ग को नीच समझना, मुद्दा नहीं है। वर्गीय चेतना पैदा हो,ये मुद्दा नहीं है। जातीय चेतना पैदा हो,ये मुद्दा है। और कोई मुद्दा ही नहीं है। ये मुद्दे जब से देश आजाद हुआ तब से लेकर आज तक स्थाई रूप से हैं और आगे भी अनंत काल तक रहेंगे। न बेरोजगारी समाप्त होगी न महंगाई समाप्त होगी। न जातीय श्रेष्ठता समाप्त होगी। न निम्न वर्ग में वर्गीय चेतना पैदा होगी।  कुछ संपन्न लोगों के लिए चाहे वे किसी जाति या वर्ग के हों,मंदिर मस्जिद मुद्दा है। महापुरूषों के नाम पर फलां चीज बने,ये मुद्दा है। उसी में सबकों उलझाये हुए हैं। जनता भी उसी में उलझकर मस्त है।

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