साथियों, बाबासाहेब का सामाजिक-आर्थिक न्याय का सपना अधूरा का अधूरा ही रह गया। हम सब हर साल जयंती मनाते हैं और कहते हैं, बाबा तेरा मिशन अधूरा हम सब मिलकर करेंगे पूरा। पर सत्तर सालों तक नहीं पूरा हुआ। बहुत लोगों को तो पता ही नहीं वो अधूरा सपना क्या है?
बाबासाहेब ने वयस्क मताधिकार देकर हमें वह हथियार दे दिया है जिससे हम चाहें तो सामाजिक आर्थिक न्याय पा सकते हैं। मगर सत्तर साल से हम समाजिक और आर्थिक न्याय की मांग कर रहे हैं। और वह नहीं मिल रहा है। जबकि इस देश में हमारा प्रचंड बहुमत है। वयस्क मताधिकार की वजह से हम इस देश के भाग्य विधाता हैं। हमारे वोट से सरकारें बनती और बिगड़ती हैं। हमसे सरकारें शक्ति हासिल करती हैं और हम सरकारों को शक्तिमान बनाने वाले समाजिक आर्थिक न्याय पाने के लिए तरसते रहते हैं। सामाजिक,आर्थिक न्याय का मतलब है सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति,एक मूल्य। यही बाबासाहेब का मिशन भी है। यह तभी हो सकता है जब न तो कोई जमींदार हो न कोई भूमिहीन । अगर ऐसा हुआ तो हर व्यक्ति आर्थिक रूप से बराबर होगा और हर बच्चा जो जन्म लेगा वह भी बराबर होगा। कोई नहीं कह सकता कि मैं जमींदार हूं और कोई नहीं कह सकता कि मैं भूमिहीन हूं। बाबासाहेब और जवाहर लाल नेहरू इस पक्ष में थे कि जमींदारी उन्मूलन हो जाय। न कोई जमींदार हो न कोई भूमिहीन। पर वे ऐसा नहीं कर सके। क्योंकि संविधान सभा के अधिकांश सदस्य जमींदार थे या जमींदारों के प्रभाव में थे,और वे नहीं चाहते थे कि ऐसा हो जिससे हमारी जमींदारी चली जाय। उसी तरह आज की संसद जमींदारों भू-माफियाओं पूंजीपतियों के दबाव में है। जो राजनेता पहले भूमिहीन था। आज सांसद विधायक मंत्री कलक्टर कप्तान बड़ा ठेकेदार बनते ही वह भी जमीन खरीद कर जमींदार और पूंजीपति हो गया। वह अब कभी नहीं चाहेगा कि जमींदारी उन्मूलन हो। चाहे वह हमारे ही समाज का क्यों न हो। कह सकते हैं कि जमींदारी उन्मूलन की हमारी मांग में ही दरार पैदा हो गई और सामाजिक आर्थिक न्याय की मांग मृतप्राय हो गई। जमींदारी उन्मूलन की मांग धीमी हो गई। इसी तरह सामाजिक न्याय का मतलब समाज के क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य। यह तभी संभव होगा जब अंतर्जातीय विवाह को कानूनी रूप दिया जायेगा। न दिया जाय तो कोई बात नहीं। कम से कम मंदिरों का पुजारी बनने के लिए हर हिन्दू योग्य समझा जाय चाहे वह किसी भी जाति का हो। जैसे मुस्लिम और क्रिश्चियन समुदाय में है। कोई भी क्रिश्चियन पुरोहित बन सकता है और कोई भी मुस्लिम मौलवी बन सकता है। यदि ऐसा हो जाता है तो सामाजिक क्षेत्र में भी एक व्यक्ति एक मूल्य स्थापित हो सकता है। बाबासाहेब ऐसी ही व्यवस्था चाहते थे। परन्तु नहीं करा सके। क्योंकि जिनका हिन्दू समाज पर नियंत्रण था वे ऐसा नहीं चाहते थे। लेकिन यदि सामाजिक न्याय से बंचित हिन्दू समाज ऐसा चाहे तो बिल्कुल हो सकता है। यह कोई असंभव कार्य नहीं है। लेकिन इसके लिए उस समाज को जो सामाजिक और आर्थिक न्याय से बंचित है,आगे आना होगा और उस तरह का जनमानस तैयार करना होगा। सरकार और समाज पर ऐसा करने के लिए दबाव बनाना होगा। पर दुर्भाग्य ये है कि सामाजिक और आर्थिक न्याय से बंचित लोग,सामाजिक और आर्थिक न्याय तो चाहते हैं पर उसके लिए आगे नहीं आना चाहते हैं। क्योंकि उनमें से जो कुछ आर्थिक रूप से मजबूत हो गये हैं वे इसकी जरूरत ही नहीं समझते। जो जातियां अपने को कुछ जातियों से ऊंचा समझती है और कुछ से नीचा समझती हैं वे न तो सामाजिक न्याय पाना चाहती है न दूसरों को देने के पक्ष में है। फिर कैसे सामाजिक आर्थिक न्याय का एजेंडा लागू हो पायेगा? सामाजिक आर्थिक न्याय की मांग करने वालों की अपनी राजनीतिक पार्टियां भी हैं। कम से कम उन्हें तो इस दिशा में आगे आना चाहिए। बिहार उत्तर प्रदेश में तो बीसों साल इन्होंने ने ही शासन किया। अन्य प्रांतों में भी शासन कर रही हैं। फिर भी ये कहते हैं,हमको सामाजिक और आर्थिक न्याय चाहिए। किससे मांग रहे हो भाई? तुम खुद राज कर रहे हो और कह रहे हो हमको सामाजिक,आर्थिक न्याय चाहिए। यह कुछ अजीब नहीं लग रहा है? कौन नहीं दे रहा है भाई? सरकार ही न देगी कि कोई और देगा? और सरकार आपकी जाति की है। आप खुद सरकार हैं। सरकार नहीं दे पा रही है तो क्यों नहीं दे पा रही है। अड़चनें कहां कहां हैं? यह जानना और उसका हल ढुंढना भी हमें ही है।
संविधान की उद्देशिका में संविधान का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। भारत की जनता की ओर से भारत के चुने गये प्रतिनिधियों ने संकल्प लिया कि हम भारत के नागरिकों को समता, स्वतंत्रता,बंधुता और न्याय पर आधारित समाज का निर्माण करेंगे। यही संविधान का उद्देश्य भी है। उद्देशिका के ये शब्द "हम भारत के लोग" भारत की जनता की सर्वोच्च संप्रभुता की ओर इशारा करते हैं। उद्देशिका यह भी बताती है कि संविधान के अधीन सभी प्राधिकारों का श्रोत "हम भारत के लोग" हैं। अर्थात हमीं हैं। विधानमंडलों के सदस्य हमीं से शक्ति अर्जित करते हैं। ऐसा नहीं है कि सरकारों ने सामाजिक और आर्थिक न्याय देने की कोशिश नहीं की। कोशिश की। परन्तु ऐसा करने में अड़चनें कहां कहां खड़ी हुई? जिसके कारण सामाजिक और आर्थिक न्याय का एजेंडा पूरा नहीं हो सका। उसे जानना जरूरी है। उन अड़चनों को दूर कर दिजिए तो कुछ हद तक सामाजिक और आर्थिक न्याय का रास्ता साफ हो जाएगा।
संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि देश की अर्थव्यवस्था पूंजीवादी होगी या समाजवादी होगी। परन्तु अनुच्छेद 36 से लेकर अनुच्छेद 51 तक "राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत" में सामाजिक और आर्थिक न्याय देने के लिए सरकारों को निर्देश दिए गये हैं,वे सारे अनुच्छेद इस बात की ओर इशारा करते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था समाजवादी होनी चाहिए। तभी समाज को समाजिक और आर्थिक न्याय मिल सकेगा। पर देश की संपत्ति कुछ जमींदारों और राजाओं के पास है और अनुच्छेद 31में संपत्ति को मूल अधिकारों में डाला गया है। यदि संपत्ति मूल अधिकार है तो कोई कैसे उनकी जमीन लेकर गरीबों को बांटेगा? ऐसा करने से क्या वे अदालतों का दरवाजा नहीं खटखटाने लगेंगे और क्या सामाजिक आर्थिक न्याय देने में अवरोध नहीं पैदा करने लगेंगे। बिल्कुल करने लगेंगे। इसीलिए नेहरू और बाबासाहेब संपत्ति को मौलिक अधिकार बनाने के पक्ष में नहीं थे। बाबासाहेब ने खुद कहा है कि संपत्ति को मूल अधिकार बनाने में ड्राफ्टिंग कमेटी का कोई रोल नहीं है। उसी तरह नेहरू भी अमीरी में जरूर पले बढ़े थे पर वह समाजवादी अर्थव्यवस्था के पक्षधर थे। इस बात को कांग्रेस कार्यसमिति के सभी लोग जानते थे। इसीलिए कांग्रेस कार्यसमिति के 15 सदस्यों में से एक भी सदस्य जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहता था। क्योंकि नेहरू जमींदारी प्रथा के खिलफ थे। बाबासाहेब ने डा मुल्कराज आनंद के साथ एक वार्ता में स्वीकार भी किया है कि नेहरू ने संपत्ति को मूल अधिकार न बनाने के लिए बहुत संघर्ष किया। यदि राजाओं नवाबों और जमींदारों को यह आभास पहले हो गया होता कि आजादी के बाद हमारा राज-पाट समाप्त हो जायेगा। हमारी जमींदारी चली जायेगी तो वे कभी ऐसी आजादी के लिए संघर्ष में आगे नहीं आते। कांग्रेस कार्यसमिति के सारे सदस्य जमींदार थे। इससे भी उन्हें विश्वास था कि इनके रहते राजाओं का राज नहीं खत्म होगा और जमींदारों की जमींदारी नहीं खत्म होगी। बाद में उन्हें पता चला कि नेहरू के प्रधानमंत्री बनने से अपनी जमींदारी जाने का खतरा है। बाबासाहेब भी चाहते थे कि न तो कोई जमींदार हो न कोई टेनेंट। यदि ऐसा होता तो आर्थिक रूप से सब बराबर हो जाते। आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य का एजेंडा उसी समय प्राप्त हो जाता। आज कोई जन्म से जमींदार नहीं होता। न जन्म से कोई भूमिहीन होता। फिर आरक्षण की भी कोई आवश्यकता नहीं होती। लेकिन संविधान सभा में इस विचार के केवल दो ही लोग थे। इसलिए इस तरह की व्यवस्था संविधान में नहीं डलवा सके। लेकिन राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत में जनता के आर्थिक न्याय के लिए ढेर सारे अनुच्छेद डलवा दिये।
आजादी के बाद इन्हीं निर्देशों के तहत जब कुछ राज्य सरकारों ने भूमिहीनों को जमीन देने के लिए तथा सार्वजनिक कार्यक्रमों हेतु जमीन का अधिग्रहण करना,सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था करना शुरू किया तो सारे जमींदार और सामाजिक रूप से संपन्न लोग न्यायालयों में मुकदमा दर्ज करने लगे। इस तरह सामाजिक आर्थिक न्याय देने की सरकार की मंशा कानूनी दांव-पेंच का शिकार होने लगी। जिसका अंदेशा बाबासाहेब और नेहरू को पहले भी था। यदि सरकार आपके लिए कुछ कर रही है तो यह जानना भी आपका कर्तव्य है कि सरकार क्या कर रही है और क्या नहीं कर रही है। नहीं कर रही है तो क्यों नहीं कर रही है? रूकावट कहां है? यह जानना जरूरी है। क्योंकि आप ही जनता जनार्दन हैं। आपकी जानकारी के लिए ही कुछ उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं:-
आजादी के बाद सन् 1950 में बिहार सरकार ने सार्वजनिक हितों के लिए और भूमिहिनों को भूमि देने के लिए भूमि सुधार कानून बनाकर जमीन का अधिग्रहण किया था। जिन जमींदारों की जमीन सरकार ने अधिग्रहण किया था वे संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 226 के तहत पटना हाईकोर्ट में रिट दाखिल किये। बिहार के एक जमींदार कामेश्वर सिंह ने पटना उच्च न्यायालय में मुकदमा दाखिल किया और कहा कि मुआवजे देने के लिए सरकार ने जमींदारों का वर्गीकरण भेदभाव पूर्ण तरीके से क्या है। अनुच्छेद 14 कहता है कि कानून के समक्ष सब बराबर हैं तो फिर सरकार जमींदारों की जमीन का वर्गीकरण करने में भेदभाव क्यों कर रही है? क्यों किसी को अधिक किसी को कम मुआवजा दे रही है? सबको बराबर मुआवजा क्यों नहीं दे रही है? पटना हाईकोर्ट ने भी इसे अनुच्छेद 14 का उल्लघंन माना और सरकार के भूमि सुधार कानून को खारिज कर दिया। इन न्यायिक फैसलों से सरकार आशंकित हो गई कि ऐसे तो संपूर्ण कृषि कार्यक्रम खतरे में पड़ जायेंगे। अनुच्छेद 12 से लेकर अनुच्छेद 35 तक मौलिक अधिकार की धारायें हैं। उनका कहना था कि सरकार के इस आदेश से उनके मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है। पंडित नेहरू और बाबासाहेब जानते थे कि जब हम भूमिहीनों को भूमि देने के लिए और अन्य सार्वजनिक विकास कार्यों के लिए जमीन का अधिग्रहण करेंगे तो ये जमींदार रोड़ा पैदा करेंगे। और ऐसी समस्याएं आयेंगी। पर वो भी लाचार थे। और वो समस्याएं अब आ ही गईं। सरकार ने सोचा,यदि सभी जमींदार इसी तरह हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते रहेंगे तो फिर सरकारी कार्यों के लिए और भूमिहीनों को भूमि का आबंटन करने के लिए जमीन कहां से लायेंगे? कैसे होगी देश की तरक्की? कैसे होगा गरीबों निर्बलों का उत्थान? कैसे उन्हें आर्थिक सामाजिक न्याय मिलेगा?
दूसरा उदाहरण सामाजिक न्याय के उद्देश्य से शिक्षण संस्थानों में प्रवेश को लेकर है। केस तमिलनाडु का है। वहां की सरकार ने सामाजिक और आर्थिक न्याय से बंचित लोगों को शिक्षण एवं व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में प्रवेश दिलाने के लिए 16 जून 1950 को एक अध्यादेश जारी किया था। जो 16 जून 1950 से प्रभावित था। जिसमें निर्देश दिया गया था कि 14 छात्रों के सेट यानी ग्रुप में प्रवेश के लिए निम्न प्रक्रिया अपनाई जाय :-
6 गैर-ब्राह्मण
2 पिछड़ा हिन्दू
2 हरिजन (उस समय हरिजन कहा जाता था।)
2 ब्राह्मण
1 मुसलमान
1 क्रिश्चियन।
कुल 14 हुए।
इस अध्यादेश के कारण उच्च वर्ग से आने वाली महिला छात्रा चंपकम दोराइराजन का अधिक नंबर होते हुए भी मेडिकल में प्रवेश नहीं हो पाया,और सी आर श्रीनिवासन नामक छात्र का अधिक नंबर होते हुए भी इंजिनियरिंग में प्रवेश नहीं हो पाया।
दोनों ने संविधान के अनुच्छेद 15,29 और 226 के तहत मद्रास हाईकोर्ट में रिट दाखिल किया कि हमारे साथ अमुक जाति का होने के कारण भेदभाव किया गया है जिससे अधिक नंबर पाते हुए भी हमें मेडिकल और इंजीनियरिंग में प्रवेश नहीं मिला। अनुच्छेद 15 में प्रावधान है कि लिंग,जाति, जन्मस्थान और धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जायेगा। अनुच्छेद 29(2) में प्रावधान है कि सरकार से वित्त पोषित संस्थानों में प्रवेश के लिए किसी के साथ जाति, जन्मस्थान,लिंग और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा। यदि ऐसा होता है तो अनुच्छेद 226 के तहत कोई भी व्यक्ति उच्च न्यायालय में और अनुच्छेद 32 के तहत उच्चतम न्यायालय में वाद दाखिल कर सकता है। ये सभी धारायें जातीय भेदभाव के शिकार लोगों की सुरक्षा के लिए बनाये गयी थीं। क्योंकि उनके साथ छोटी जाति का होने के कारण भेदभाव होता था। इस सुरक्षात्मक उपाय का प्रयोग ये दोनों व्यक्ति अपने लिए कर रहे हैं और कह रहे हैं कि हमारे साथ जाति के आधार पर भेदभाव किया जा रहा है। इस तरह इसका उपयोग उच्च जातियों में पैदा हुए लोग ही जातीय भेदभाव के शिकार लोगों के खिलाफ कर रहे हैं। 27 जुलाई 1950 को मद्रास हाईकोर्ट ने इनके पक्ष में फैसला दिया और सरकार के अध्यादेश को निरस्त कर दिया। उच्च न्यायालय के इस निर्णय के खिलाफ मद्रास सरकार सुप्रीम कोर्ट गई। सुप्रीम कोर्ट ने 9 अप्रैल 1951 को सरकार की अपील खारिज कर दी। इसी के खिलाफ पेरियार रामास्वामी नायकर ने मद्रास में जनआंदोलन किया था। इसका मतलब यह है कि न्यायालयों के निर्णयों के खिलाफ जनांदोलन हो सकता है।
ये दोनों मामले अनुसूचित जातियों जनजातियों और कमजोर वर्ग के लोगों को संविधान के अनुच्छेद 46 के तहत न्याय देने के सरकार के कदम के उदाहरण हैं। आर्थिक और सामाजिक न्याय देने के इन दोनों मामलों से केन्द्र सरकार को बड़ी चिंता हुई। तब बाबासाहेब आंबेडकर कानून मंत्री थे। उन्हें भी चिंता हुई कि जिनकी सुरक्षा के लिए हम संविधान में प्रावधान बनाये थे उसका उपयोग उन्हीं के खिलाफ हो रहा है। उनके साथ जातीय भेदभाव हो रहा था। ऐसा उनके साथ न हो,इसलिए ये सुरक्षा के उपाय डाले गये थे। पर इनका उपयोग उन्हीं के खिलाफ हो रहा है? उन्हें कमजोर वर्गों और अनुसूचित जातियों के लिए सरकार के कदम में न्यायपालिका की दखलंदाजी से बड़ी चिंता हुई। नेहरू ने बाबासाहेब से इन सबका समाधान पूछा। बाबासाहेब ने कहा, न्यायपालिका को मौलिक अधिकार की धाराओं को अनुच्छेद 46 के साथ जोड़कर अपना फैसला देना चाहिए था। मगर ऐसा नहीं किया तो इसका एकमात्र विकल्प संविधान संशोधन ही है। और कोई उपाय नहीं।
तब नेहरू जी की सरकार ने इन दोनों मामलों को लेकर 1951 में एक बड़ा संविधान संशोधन लाया।
संविधान के अनुच्छेद 15 में नया क्लाज 15(4) जोड़ा। इसमें ये प्रावधान किया कि:-
"इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29(2) की कोई बात अनुसूचित जातियों,जनजातियों एवं सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों के विकास के लिए बनाये गये किसी प्रावधान को रोकेगी नहीं। इस तरह अब 15(4) में डाला गया सुरक्षा कवच भी अनुसूचित जातियों जनजातियों और समाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों के कल्याण का मौलिक अधिकार हो गया।
अनुच्छेद 31 में नया क्लाज 31(क) जोड़ा एवं 31(ख) जोड़ा। 31(ख) में नवीं अनुसूची बनाई गई और लिखवा दिया गया कि अगर नवीं अनुसूची में डाला गया कोई प्रावधान मूल अधिकारों का हनन भी करता है तो उसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
इस प्रकार आरक्षण को समाप्त न करने और जमींदारी समाप्त करने यानी भूमि सुधार का रास्ता साफ हो गया। भूमि सुधार कानून के अंतर्गत जमींदारी प्रथा उन्मूलन, भूमि अधिग्रहण आदि आते हैं। इतना संशोधन करने के बाद अब ये हुआ कि एक तो जमींदारों की जमींदारी गई। उसका बहुत ज्यादा जमीन सरकार द्वारा अधिगृहीत कर लिया गया। और वे लोग कोर्ट भी नहीं जा सकते थे। क्योंकि पहले संविधान संशोधन में ये साफ साफ लिख दिया गया था कि इसको किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। लेकिन आश्चर्य यह है कि इसके बावजूद जमींदारों द्वारा चुनौती दी गई। इस तरह सामाजिक और आर्थिक न्याय देने में सबसे बड़े बाधक जमींदार और पूंजीपति ही हैं। चाहे वे एससी-एसटी ओबीसी के हों या सामान्य वर्ग के। देखें नीचे उदाहरण में।
तीसरा मामला है शंकरी प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ सन् 1951 का वाद। जब इस पहले संविधान संशोधन से बहुत से जमींदारों की जमीनें सरकार द्वारा अधिगृहीत की जाने लगी तो बिहार के एक जमींदार शंकरी प्रसाद सिंह देव ने इस पहले संविधान संशोधन को संविधान के अनुच्छेद 13(2) का हवाला देते हुए चुनौती दी कि ये संशोधन मूल अधिकारों का हनन करता है और यह पहला संविधान संशोधन ही गलत है। सरकार ने अनुच्छेद 368 का प्रयोग करके मूल अधिकारों में संशोधन किया है। अनुच्छेद 13(2) में प्रावधान है कि मूल अधिकारों को कम करने वाली कोई भी विधि उतने मात्रा तक शून्य हो जायेगी जितने मात्रा तक वह मूल अधिकारों का हनन करती है। इसलिए अनुच्छेद 368 के तहत किये गये संशोधन को असंवैधानिक माना जाना चाहिए। ये वाद शंकरी प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ के नाम से विख्यात है। सुप्रीम कोर्ट ने शंकरी प्रसाद सिंह देव के आर्गुमेंट को खारिज करते हुए कहा कि अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 368 दोनों अलग-अलग चीजें हैं। और दोनों को एक-दूसरे से रिलेट करना ठीक नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद को मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की शक्ति है। क्योंकि अनुच्छेद 13(2) में विधि शब्द का जिक्र है। संविधान संशोधन शब्द का नहीं। विधि साधारण बहुमत से बनाई जाती है और संविधान संशोधन की प्रक्रिया अलग होती है। उसके लिए संसद में दो तिहाई बहुमत चाहिए। यह निर्णय भारत सरकार के पक्ष में आया। इस तरह पहले संविधान संशोधन से जमींदारी उन्मूलन का एक रास्ता खुल गया। धीरे-धीरे सभी राज्यों ने अपने अपने राज्य में अपने अपने हिसाब से भूमि सुधार कानून बनाया और इस प्रक्रिया को जारी रखा।
लेकिन रूकावट यहीं नहीं रूकी। इसी से संबंधित एक चौथा वाद 1964 में राजस्थान राज्य से आया। सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य। सज्जन सिंह राजस्थान के जमींदार थे। राजस्थान सरकार ने भी भूमि सुधार कानून बनाकर उसे संसद के 17वें संविधान संशोधन द्वारा पारित कराकर भूमि अधिग्रहण किया था। इसके खिलाफ सज्जन सिंह ने भी उच्चतम न्यायालय में रिट दाखिल की। सज्जन सिंह ने भी उसी मामले को उठाया जिसे शंकरी प्रसाद सिंह देव ने उठाया था। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 13(2) के आधार पर कोई भी हमारी जमीन छिन नहीं सकता। सुप्रीम कोर्ट ने सज्जन सिंह के मामले में भी वही फैसला सुनाया जो शंकरी प्रसाद के मामले में सुनाया था। यानी अनुच्छेद 13(2) का कोई संबंध अनुच्छेद 368 से नहीं है। यहां एक बात याद रखने की है कि संपत्ति का अधिकार अब भी मूल अधिकार का हिस्सा था। नेहरू सरकार ने पहले संविधान संशोधन द्वारा उसकी शक्तियों को कम जरूर कर दिया था। लेकिन इसे अनुच्छेद 31 से हटाया नहीं था। बाद में सन् 1978 में मोरारजी देसाई की सरकार ने 44 वें संविधान संशोधन द्वारा इसे मूल अधिकार से हटाकर 300क में जोड़कर इसे मात्र एक कानूनी अधिकार बना दिया ।
इसके बाद 1967 में पांचवां मामला आया गोलक नाथ बनाम पंजाब राज्य का। गोलक नाथ पंजाब के जमींदार थे। उनकी भी जमीन पंजाब सरकार द्धारा अधिगृहीत की गयी थीं। गोलक नाथ ने भी उसी मुद्दे को उठाया जिसे शंकरी प्रसाद और सज्जन सिंह ने उठाया था। यह समझने की बात है कि जब पहले संविधान संशोधन से यह बात साफ हो गई कि नवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों की किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। तो बार बार न्यायालय क्यों ऐसे मामलों को विचारार्थ स्वीकार कर रहे हैं? इस बार उन्होंने 17वें संविधान संशोधन को गलत ठहराया। इस तरह इस प्रकरण में एक नया ट्वीस्ट आया। इस बार सुप्रीम कोर्ट का फैसला चौंकाने वाला था। 11जजों की बेंच ने 6-5 के बहुमत से फैसला सुनाया और पहले के सारे फैसलों को पलट दिया। अर्थात पांच जज संशोधन के पक्ष में थे और छः जज संशोधन के विरुद्ध थे। इस तरह एक के बहुमत से पहले के सारे फैसलों को पलट दिया गया। देखिए,इस बार माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 13(2) अनुच्छेद 368 से मुक्त नहीं है और संसद 368 का उपयोग करके मूल अधिकारों में कटौती नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने आगे ये भी कहा कि अब तक जो भी कानून इस संबंध में बन चुके हैं उनको तो वापस नहीं किया जा सकता लेकिन अब से ये कानून अवैध है और इसका इस्तेमाल अब और नहीं किया जा सकता। इस निर्णय ने तो आर्थिक न्याय देने की सरकार की मंशा पर ही पानी फेर दिया। जनता का कोई मौलिक अधिकार नहीं। सारा मौलिक अधिकार कुछ जमींदारों और पूंजीपतियों का ही है। आप कैसे सामाजिक और आर्थिक न्याय पा सकते हैं। आप यह बात नोट कर लें कि संविधान के प्राधिकार का श्रोत भारत के लोग हैं और सामाजिक और आर्थिक न्याय से बंचित लोगों का इस देश में प्रचंड बहुमत है। उनके साथ न्यायपालिका अन्याय कर रही है। अर्थात जनता से अधिकार प्राप्त करके बनी संसद की शक्ति पर न्यायपालिका रोक लगा रही है। क्योंकि उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में ऊंचे अमीर घरानों के और जमींदार घरानों से संबंधित न्यायाधीश लोग बैठे हैं। इसे देश की सामाजिक और आर्थिक न्याय से बंचित जनता को नोट करना चाहिए और इसे जनता में चर्चा का विषय बनाना चाहिए। जिस तरह पेरियार रामास्वामी नायकर ने मद्रास में जनआंदोलन किया था उसी तरह इन फैसलों के खिलाफ देश भर में कम से कम जनचर्चा तो होना ही चाहिए।
यह फैसला 1967 में आया। तब इंदिरा जी की सरकार थी। 11जनवरी 1966 को लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद 24 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं थीं। अर्थात जब गोलकनाथ का फैसला आया तब इंदिरा जी की सरकार थी। पर वह काफी कमजोर स्थिति में थी। 1967 के चुनाव में फिर इंदिरा जी की सरकार बनी। पर मोरारजी देसाई से मतभेद के कारण कांग्रेस 1969 में दो गुटों में विभाजित हो गई। वे समाजवादियों और साम्यवादियों से समर्थन लेकर दो साल सरकार चलाईं। उसी वर्ष जुलाई 1969 में उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। राजाओं का प्रीवी पर्स समाप्त करने की शुरुआत तो वह 1967 में ही कर चुकी थीं। पर बात नहीं बन पा रही थी। राजा प्रीवी पर्स छोड़ने को तैयार नहीं थे। जैसे आज जमींदार अपनी जमींदारी छोड़ने को तैयार नहीं। तब इंदिरा जी ने 1970 में लोक सभा से विधेयक पारित कराया, लेकिन राज्य सभा में एक मत से वह गिर गया और फिर पारित न हो सका। फिर 6 सितंबर 1970 को राष्ट्रपति गिरि के द्वारा जारी एक अध्यादेश द्वारा समाप्त किया । इस प्रीवी पर्स के मामले को भी लेकर राजा महाराजा उच्चतम न्यायालय पहुंचे। उच्चतम न्यायालय ने इस अध्यादेश को निरस्त कर दिया। श्रीमती इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर दिया और 1971 में आम चुनाव कराया। इस चुनाव में इंदिरा जी भारी बहुमत से चुनकर सत्ता में आईं। अब इंदिरा सरकार के सामने गोलकनाथ के वाद में माननीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला,बैंकों के राष्ट्रीयकरण के विरुद्ध माननीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला और प्रवी पर्स के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला,तीनों को पलटने का काम था। आप देख सकते हैं कि सामाजिक और आर्थिक न्याय से बंचित लोगों को सामाजिक और आर्थिक न्याय देने की सरकार की हर राह में जमींदारों पूंजीपतियों के साथ साथ अब न्यायपालिका भी अवरोध बनकर खड़ी है। तीनों का गठजोड़ गरीब और सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए कितना अहितकर है। उसने जनता द्वारा गठित संसद की संशोधन की शक्ति पर ही अंकुश लगा दिया। कैसे आपको सामाजिक-आर्थिक न्याय मिलेगा।? जब जनता के हित में उठाये गये हर कदम के सामने जमींदार पूंजीपति और न्यायपालिका अवरोध बनकर खड़ी हो जायेंगी? इंदिरा सरकार ने तीनों चुनौतियो से एक साथ निपटा। 24 वें संविधान संशोधन से गोलकनाथ के वाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटा। अनुच्छेद 31ग में यह जोड़वा दिया कि उसके तहत बनाए गए किसी नीति को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। अनुच्छेद 13 में उप क्लाज (4) जोड़ा। उसमें लिखवा दिया कि अनुच्छेद 13 की कोई बात अनुच्छेद 368 द्वारा किये गये किसी भी संशोधन को लागू नहीं होगी और 368 में यह लिखवा दिया कि संविधान में किसी भी बात के होते हुए भी संसद संविधान के किसी भी भाग का संशोधन कर सकती है। 25वें संविधान संशोधन द्वारा बैंको के राष्ट्रीयकरण के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटा और 26 वें संविधान संशोधन द्वारा प्रीवी पर्स के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटा। इस तरह जनता की दी गई शक्ति का इंदिरा जी जनता के हित में प्रयोग किया। इससे मानो संसद और न्यायपालिका में शक्तिमान कौन,की जंग छिड़ गई। जनता द्वारा गठित संसद जिसमें एससी-एसटी ओबीसी का प्रचंड बहुमत है,वो सर्वोच्च है या सरकार द्वारा चुनी गई न्यायपालिका जिसमें उच्च वर्ग का वर्चस्व है,वो सर्वोच्च है। आप विचार करें। आगे देखिए,क्या हुआ?
संसद द्वारा किये गये इन संशोधनों को केशवानंद भारती के वाद में चुनौती दी गई। केशवानंद भारती बनाम भारत संघ का वाद बहुत ही प्रसिद्ध वाद है। यह मामला भी भूमि अधिग्रहण से ही संबन्धित है। केशवानंद भारती केरल में एक धार्मिक संस्थान यानी मठ के संचालक थे। उनकी भी जमीन केरल सरकार द्वारा भूमि सुधार संशोधित अधिनियम 1969 के तहत अधिग्रहण कर ली गई थी। इस संशोधन को 29 वें संविधान संशोधन 1972 द्वारा 9 वीं अनुसूची में डाल दिया गया था। उन्होंने भी अपनी जमीन बचाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत उच्चतम न्यायालय में रिट दाखिल किया । उन्होंने अनुच्छेद 14,19(i)(f), अनुच्छेद 25,26, और 31 के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकारों की न्यायालय से रक्षा की मांग की। इसके साथ ही उन्होंने 24वें,25 वें संविधान संशोधन को भी इस मामले में शामिल किया और कहा कि इस संशोधन के माध्यम से हमारे मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है। खासकर अनुच्छेद 19(i)(f) के तहत मिलने वाली संपत्ति का अधिकार। इस तरह केशवानंद भारती ने गोलकनाथ के वादे में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को शून्य करने वाले संसद के संशोधन को ही चुनौती दें दी।
अब न्यायपालिका के सामने दो प्रश्न थे। पहला,क्या अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन की संसद की शक्ति असीमित है? दूसरा,क्या 24वां एवं 25वां संविधान संशोधन वैध है? यह वाद सुप्रीमकोर्ट के 13 जजों की बेंच के समक्ष था जो अब तक की सबसे बड़ी बेंच थी। 24 अप्रैल 1973 को 7-6 के बहुमत से न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया। न्यायालय ने कहा 24वां एवं 25वां संविधान संशोधन पूरी तरह सही है। लेकिन 24वें संविधान संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 31(ग) में जो संशोधन किया गया था उसके दूसरे भाग में जिसमें ये बताया गया था कि उसके तहत बनाये गये नीति को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। वह असंवैधानिक है। न्यायालय ने कहा कि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल विशेषता है। इसे छिना नहीं जा सकता। संसद संविधान के किसी भी भाग का संशोधन कर सकती है चाहे वह मूल अधिकार ही क्यों न हो। संसद को यह हमेशा याद रखना होगा कि संशोधन की शक्ति फिर से संविधान लिखने की शक्ति नहीं है। तब सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की मूल संरचना व्यवस्था को आगे रखा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ साफ कहा कि संसद 368 के तहत संविधान में हर तरह का संशोधन कर सकती है। पर संविधान के मूल ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती। क्या मूल ढांचा होगा? क्या नहीं होगा? उच्चतम न्यायालय समय समय पर बताता रहेगा। इस तरह संविधान की मूल संरचना अस्तित्व में आई। संविधान में कहीं भी मूल संरचना या मूल ढांचा जैसा कोई शब्द नहीं है। इसे उच्चतम न्यायालय ने अपनी तरफ से जोड़ा है। जबकि उच्चतम न्यायालय को संविधान संशोधन का अधिकार संविधान ने नहीं दिया है। यह अधिकार संसद को है। इस फैसले में उच्चतम न्यायालय ने उद्देशिका को मूल ढांचा बताया और कहा कि अब उसमें न तो कोई शब्द बिना अदालत के आदेश के जोड़ा जा सकेगा न उससे कोई शब्द हटाया जा सकेगा। यह भी देखने वाली बात है कि जिसे बेरूबाड़ी केस में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यह संविधान का भाग नहीं है। अब माननीय न्यायालय ने उसे संविधान का मूल ढांचा बताया। इस तरह संविधान की मूल संरचना अस्तित्व में आई। इसने माननीय सुप्रीम कोर्ट को अपार शक्तियां दी। यानी अपार शक्तियां पाने के लिए उद्देशिका को संविधान का मूल ढांचा बताया। अब हर कानून बनाने से पहले संसद को एकबार सोचना पड़ेगा कि कहीं संविधान की मूल संरचना को ठेस तो नहीं पहुंचा है। इस तरह विधि की सम्यक प्रक्रिया के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट को जो शक्तियां पहले से प्राप्त हुई थीं। उससे अधिक शक्तियां संविधान की मूल संरचना के अन्तर्गत कानूनों की समीक्षा करने की शक्ति से प्राप्त हो गईं। जो संविधान के अन्य अनुच्छेदों से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है। यह एक तरह से संसद की संविधान संशोधन की शक्ति पर अंकुश है। अर्थात उद्देशिका को संविधान का मूल ढांचा बताने के पीछे यही कारण है। अब तक न्यायालय की नजर में जो उद्देशिका संविधान का भाग नहीं थी। अब से संविधान का भाग हो गई। संसद की संविधान संशोधन की शक्तियों के बारे में बाबासाहेब क्या कहते हैं:-
"जो संविधान से असंतुष्ट हैं उन्हें बस दो तिहाई बहुमत हासिल करना होगा। यदि वे वयस्क मत के आधार पर निर्वाचित संसद में दो तिहाई बहुमत भी नहीं प्राप्त कर सकते तो यह समझा जाना चाहिए कि संविधान के प्रति असंतोष में जनता उनके साथ नहीं है।" (डीडी बासुकी पुस्तक भारत का संविधान एक परिचय पृ.162 एवं सीएडी दिनांक 25.111949,पृ.225-26)।
आप देख सकते हैं,संविधान ने संविधान संशोधन का अधिकार सिर्फ संसद को दिया है। जिस तरह इंग्लैंड के संविधान के अधीन इंग्लैंड की संसद सर्वोच्च है उसी तरह भारत के संविधान के अधीन भारत की संसद भी सर्वोच्च है। इंग्लैंड के न्यायालय संसद के किसी भी अधिनियम को किसी भी आधार पर शून्य घोषित नहीं कर सकते। इंग्लैंड के न्यायाधीशों ने संसद विरूद्ध अपील न्यायलय के रूप में बैठने से इन्कार कर दिया। इसके उलट भारत के न्यायाधीश संसद के विरुद्ध अपील न्यायलय के रूप में बैठने के लिए भारत के ही संविधान में ही रास्ता खोज लिया।
संविधान संशोधन के विषय में नेहरू जी के विचार देखें,नेहरू जी इस विषय में क्या कहते हैं:
"हम इस संविधान को इतना कठोर नहीं बना सकते कि परिवर्तित दशाओं में इसे अनुकूलित न किया जा सके। जब संपूर्ण विश्व परिवर्तन से गुजर रहा है और हम एक तीव्र गति से होने वाले संक्रमण का अनुभव कर रहे हैं तो हम जो आज कर रहे हैं वह कल के लिए अनुपयुक्त हो सकता है।" ( डा. डीडी बसु की पुस्तक भारत का संविधान एक परिचय पृ.37 एवं सीएडी दिनांक 8.11.1948 पृ.322-23)।
इसका मतलब नेहरू जी भी परिवर्तित दशाओं में संविधान को अनुकूलित करने पक्ष में हैं। जो संसद ही कर सकती है। आप विचार कर सकते हैं,इस देश में लोकतंत्र है। लोकतंत्र से बनी संसद पर अंकुश लगाना क्या संवैधानिक है? क्या ऐसी शक्ति संविधान ने सुप्रीम कोर्ट को दिया है? इस विषय में डा डीडी बसु क्या कहते हैं। देखें :-
"यह ठीक है कि हमारे संविधान में कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं है जिससे न्यायालयों को विधियों को अविधिमान्य करने की शक्ति दी गई हो। किंतु संविधान ने राज्य के प्रत्येक अंग पर कुछ निश्चित मर्यादाएं लगाई हैं और उन मर्यादाओं का उल्लंघन करने से विधि शून्य हो जायेगी। यह न्यायालय विनिश्चच करेगा कि कोई संवैधानिक मर्यादा का उलंघन हुआ है कि नहीं।" (डा.डीडी बसु पृ.306)।
अब पंडित जवाहरलाल नेहरू का वक्तव्य देखें:-
"संसद की प्रभुत्व संपन्न इच्छा के ऊपर कोई उच्चतम न्यायालय, कोई न्यायपालिका अपना निर्णय नहीं लाद सकती। क्योंकि संसद की इच्छा समस्त जन की इच्छा है। वह इस प्रभुत्व संपन्न इच्छा को रोक सकती है यदि वह गलत राह पर है किन्तु अंतिम विश्लेषण में जब समाज के भविष्य का प्रश्न है तब न्यायपालिका कार्य में बाधा नहीं पहुंचा सकती। ….. अंततोगत्वा तथ्य तो यह है कि विधानमंडल ही सर्वोच्च है और सामाजिक सुधार के मामलों में न्यायपालिका को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।"
(डा.डीडी बसु की पुस्तक-भारत का संविधान एक परिचय पृ.41)
अब बताइए यह कौन तय करेगा कि गलत दिशा में है कि सही दिशा में है? स्वाभाविक है कि न्यायालय ही तय करेगा। अब न्यायपालिका में जज किस विचार के हैं उस पर निर्भर करेगा। कुछ आरक्षण के विरोधी हो सकते हैं। कुछ आरक्षण के समर्थक हो सकते हैं। उसी तरह का उनका निर्णय भी होगा। गोलकनाथ के वाद में 11 जजों की खंडपीठ में पांच जज संविधान संशोधन की संसद की असीम शक्ति के पक्ष में हैं। छ: जज विरोध में हैं। उसी तरह केशवानंद भारती के वाद में 13 जजों की खंडपीठ में 6 जज संशोधन के पक्ष में हैं और 7 जज संशोधन को गलत मान रहे हैं। दोनों वादों में बहुमत का फैसला लागू हुआ।
अब यदि संविधान ने न्यायपालिका को ऐसी शक्ति नहीं दिया है तो फिर न्यायालय ने कैसे इतनी असीमित ताकत हासिल किया है? आप विचार करें। अगर संसद गलती करेगी तो जनता दुबारा उसे संसद से बेदखल कर देगी। उसको सजा देना तो जनता का अधिकार है। जो हर पांच वर्ष में आता है। और जिस दूसरी संसद को जनता चुन करके भेजेगी वह उसमें फिर संशोधन कर देगी। अर्थात संसद की गलती का सुधार संसद ही कर सकती है। जैसे इंदिरा जी द्वारा बयालीसवें संविधान संशोधन के ढेर सारे संशोधनों का जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार ने तैंतालीसवें संशोधन में लोप कर दिया।
यह निर्णय 24 अप्रैल 1973 का है। अब बताइए,आपको आर्थिक, सामाजिक न्याय कैसे मिलेगा। केशवानंद भारती मठ का संचालक है। सैकड़ों एकड़ जमीन का मालिक है। ऐसे लोगों की जमीन अधिग्रहित नहीं होगी तो सरकार कहां से जमीन लाकर गरीबों को देगी और सामाजिक आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य कैसे स्थापित करेगी? उस समय इंदिरा गांधी की सरकार थी। उन्होंने इस निर्णय को शून्य करने के लिए 1976 में संसद में बयालीसवां संविधान संशोधन लाया। यह बड़ा संविधान संशोधन था। एक तरह से मिनी संविधान ही था। इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 368 में उप क्लाज (4) एवं (5) जोड़ा। उपक्लाज (4) में लिखवा दिया कि संसद की विधाई शक्ति पर किसी भी प्रकार कोई निर्बंधन नहीं रहेगा और (5) में लिखवा दिया कि 368 के तहत किये गये किसी भी संशोधन को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
आगे इन दोनों संशोधनों को उच्चतम न्यायालय ने मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ 1980 के वाद में असंवैधानिक घोषित कर दिया। 1980में इंदिरा जी की सरकार आप गयी थी। वे फिर संशोधन लाकर इसे शून्य करना चाहतीं थीं। पर नहीं कर सकीं। और 1984 में उनकी हत्या कर दी गई।
मुझे डिटेल में ये सब इसलिए लिखना पड़ रहा है कि सरकार जनता के हित में जनता को सामाजिक आर्थिक न्याय देने की दिशा में काम कर रही है। और कुछ जमींदार तथा कुछ पूंजीपति न्यायालय का सहारा लेकर सरकार के सामाजिक आर्थिक न्याय देने की मंशा में कैसे रूकावट पैदा कर रहे हैं? इसलिए कि संविधान के अनुच्छेद 31 में जो मूल अधिकार की धारा है, संपत्ति रखने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया गया है। यह संविधान सभा में जमींदारों और पूंजीपतियों के दखल के कारण किया गया था। अब गरीब जनता के हित में सरकार कुछ करना चाहती है तो सरकार के ऐसे हर कार्य में रूकावट कैसे पैदा की जा रही है, जनता जाने कि पुराने जमींदार तथा उसके ही बीच के नये जमींदार,जो उसकी जाति के हैं,सामाजिक आर्थिक न्याय देने के सरकार के कार्य में कैसे रूकावट पैदा कर रहे हैं? अब जब उच्चतम न्यायालय ने कह दिया कि सरकार मौलिक अधिकारों का भी संशोधन कर सकती है। तो अब समाजिक आर्थिक न्याय देने में अवरोध कहां है? आगे मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ के वाद में देखिए।
मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ का वाद 1980। मिनर्वा मिल्स महाराष्ट्र की एक टेक्सटाइल कंपनी थी। जो कपड़े का व्यापार करती थी। उसके मालिक ने कंपनी को बिमार घोषित कर दिया और उसके मजदूरों का वेतन रोक दिया। उनकी छंटनी कर दिया। यह कहते हुए कि कंपनी का उत्पादन कम हो रहा है। अगस्त 1970 में भारत सरकार ने इन्डस्ट्रीज रेगूलेशन ऐक्ट 1951 के अंतर्गत मिल में कम उत्पादन के विषय में जांच करने का आदेश दिया। 19 अक्टूबर 1971 को सरकार ने धारा 18-क के तहत कंपनी के अधिग्रहण का आदेश दिया। आधार यह दिया गया कि कंपनी के मामले जनहित के खिलाफ हैं और इस प्रकार कंपनी राष्ट्रीयकृत घोषित कर दी गई। अब बताइए, सरकार ने तो जनहित में अच्छा ही किया। लेकिन कंपनी के मालिक फिर उसी मूल अधिकार की धारा 31 और 32 के तहत उच्चतम न्यायालय में वाद दाखिल किये। यह वाद पांच जजों 1.वाईवी चंद्रचूड़ 2.पीएन भगवती 3.एसी गुप्ता 4.एनएल उन्तवालिया 5. पीएस कैलाशम के सामने पेश हुआ। केशवानंद का वाद 13 जजों की खंडपीठ के समक्ष था। इसमें वादी ने फरियाद की।
संविधान का 42 वां संविधान संशोधन भाग 3 तथा भाग 4 के बीच की अनुरूपता को नष्ट करता है। क्योंकि संशोधन में मूल अधिकारों को राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अधीन लाने का प्रयास किया गया है। वह लोकतंत्र को नष्ट एवं सरकार को निरंकुश बनाने वाला है।
एक विचित्र सोच कि राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को क्रियान्विति के लिए मूल अधिकारों की बलि दिया जाना आवश्यक है।
आपातकाल की उद्घोषणा पर मूल अधिकार केवल आपातकाल के दौरान ही निलंबित रहते हैं। लेकिन 42 वें संविधान संशोधन द्वारा राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के मूल अधिकारों पर प्राथमिकता दे दिए जाने से ऐसा लगता है कि मानो यह व्यवस्था सदैव के लिए लागू हो गई है। अर्थात आपात की स्थाई घोषणा की गई है,और मूल अधिकार सदैव के लिए निलंबित हो गये हैं।
उत्तरदाता द्वारा यानी सरकार द्वारा जबाव में यह कहा गया:-
368 के द्वारा संसद को संविधान में संशोधन की विपुल शक्तियां प्राप्त हैं।
किसी विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को क्रियान्वित किया जाना संविधान के बुनियादी ढांचे को नष्ट करना नहीं,वस्तुत: यह लोकहित में है।
368 मूल अधिकारों को छिनने वाला नहीं। क्योंकि इसका आधार सामाजिक आर्थिक और राजनितिक न्याय है।
तथाकथित संशोधन से न्यायालय की पुनर्विचार की शक्तियां प्रभावित नहीं होती हैं।
निर्णय :- सुनवाई मुख्य न्यायाधीश वाई वी चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में हुई। निर्णय मुख न्यायाधीश द्वारा घोषित किया गया।
न्यायालय ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन करने की संसद की शक्ति असीमित नहीं है। संसद द्वारा संविधान में कोई भी संशोधन नहीं हो सकता जिससे संविधान का आधारभूत ढांचा ही नष्ट हो जाय या संविधान निराकृत हो जाय।
42 वें संशोधन द्वारा जोड़े गए उपक्लाज (4) एवं (5) को न्यायालय ने असंवैधानिक माना। उसने कहा,हमारा संविधान शक्ति पृथक्करण के संदर्भ में नियंत्रण एवं सन्तुलन के सिद्धांत पर आधारित है। यदि न्यायालय की पुनर्विचार की शक्तियों को समाप्त कर दिया जायेगा तो सरकार में निरंकुशता पैदा हो जायेगी।और नागरिकों के मूल अधिकार अर्थहीन हो जायेंगे। न्यायालय ने यह भी कहा कि संसद द्वारा संविधान में ऐसा कोई संशोधन नहीं किया जा सकता जिससे संविधान की सर्वोच्चता को आंच आये। मूल अधिकारों को राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अधीन नहीं किया जा सकता। क्योंकि वे दोनों एक-दूसरे के अनुपूरक एवं अनुरूप है। इस वाद में न्यायालय ने तीन सिद्धांत प्रतिपादित किया।
1.संसद द्वारा संविधान में ऐसा कोई संशोधन नहीं किया जा सकता जिससे संविधान का मूल ढांचा ही नष्ट हो जाय।
2. संविधान के आधारभूत ढांचे को नष्ट करने वाले संशोधन पर न्यायालय द्वारा पुनर्विचार किया जा सकता है।
3. मूल अधिकारों पर राज्य के नीति निर्देशक
तत्वों को इस प्रकार पुर्विकता प्रदान नहीं की जा सकती जिससे मूल अधिकारों का महत्व ही समाप्त हो जाय एवं संविधान के मूल ढांचे पर प्रतिकुल प्रभाव पड़े।
साथियों,इसमें देखने वाली बात यह है कि यह
पांच जजों की खंडपीठ का फैसला है। उसमें भी एक जज पीएन भगवती असहमत दिख रहें हैं। फैसला 1980 का है। और 1978 में संपत्ति का अधिकार मूल अधिकार से हटाकर अनुच्छेद 300(क) में डाल कर एक कानूनी अधिकार बना दिया गया था। अब वह मूल अधिकार नहीं है। फिर भी उच्चतम न्यायालय यह कह रहा है कि मूल अधिकारों पर राज्य के नीति निर्देशक तत्व भारी नहीं हैं। यदि भारी नहीं हैं तो क्या एक व्यक्ति पूरी जनता पर भारी है। क्या एक व्यक्ति का हित ढेर सारे लोगों के हित से अर्थात जनता के हित से ऊपर है? क्या व्यक्ति के ये मूल अधिकार जनता के हित में बाधक नहीं हो रहे हैं? फिर जनता का राज जनता के द्वारा जनता के लिए कैसे हुआ? देखिए, संपत्ति का अधिकार मूल अधिकार से हटा दिया गया है फिर भी जमींदार और पूंजीपति न्यायपालिका की शरण में जा रहे हैं और न्यायपालिका याचिका स्वीकार कर रही है। दूसरी बात 13 जजों की खंडपीठ का बहुमत फैसला जो यह कह रहा है कि संसद मूल अधिकारों का भी संशोधन कर सकती है। पांच जजों की खंडपीठ कह रही है कि मूल अधिकारों पर राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को इस प्रकार की पुर्विकता प्रदान नहीं की जा सकती जिससे मूल अधिकारों का महत्व ही समाप्त हो जायं।
इसके बाद बावन राव बनाम भारत संघ का वाद 1981 में आया। महाराष्ट्र सरकार ने एग्रीकल्चर लैंड सिलिंग ऐक्ट 1962 पारित किया था। जिसमें एग्रीकल्चर सिलिंग को कम किया था और स्पेयर जमीन गरीबों को बांटने की योजना बनाई थी। इसे संसद से संविधान संशोधन द्वारा पारित कराकर नवीं अनुसूची में डाला गया था। इस संशोधन के खिलाफ बावन राव ने बंबई हाईकोर्ट में वाद दाखिल किया। बंबई हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। फिर हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे खारिज कर दिया। पर इस वाद में यह स्पष्ट कर दिया था कि आधार भूत लक्षण का सिद्धांत 24 अप्रैल 1973 को अर्थात केशवानंद भारती के वाद के निर्णय को सुनाये जाने की तिथि के बाद पारित होने वाले सभी संविधान संशोधन अधिनियमों पर लागू होगा।
इसकेे बाद वाद आया आई आर कोइल्हो का मामला। आई आर कोयल्हो बनाम तमिल नाडु 2007 । यह भी एक ऐसा मामला है जिसमें यह कहा गया कि एक तरफ तो संसद कहती है की नवीं अनुसूची में डालें गये कानूनों को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। दूसरी तरफ कोर्ट कहती है कि नवीं अनुसूची में डालें गये कानूनों की समीक्षा हो सकती है। यह कैसा विरोधाभास है? इस मामले में नौ जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मत फैसला सुनाते हुए कहा कि 24 अप्रैल 1973 को या उसके बाद संविधान में किये गये सभी संशोधन जिनमें विभिन्न कानूनों को शामिल करके नवीं अनुसूची में डाला गया है,की समीक्षा हो सकती है। यदि संविधान के भाग तीन में किसी भी अधिकार का उल्लंघन करने वाला कानून 24अप्रैल 1973 के बाद नवीं अनुसूची में डाला गया है तो ऐसा उल्लंघन उस आधार पर चुनौती देने के लिए खुला रहेगा। जो मूल अधिकार या संविधान के मूल ढांचे को विनष्ट या क्षतिग्रस्त कर देता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि 1951 के बाद भी नवीं अनुसूची में डालें गये कानूनों की समीक्षा कर सकता है यदि वे मूल अधिकारों को या संविधान के मूल ढांचे को विनिष्ट करते हों। कुल मिलाकर कर आई आर कोयल्हो मामले के निर्णय के बाद यह साफ हो गया कि 24अप्रैल 1973 के बाद या पहले नवीं अनुसूची में डाला गया कोई भी कानून कोर्ट की जांच के अधीन है। इतना महत्वपूर्ण है आईआर कोयल्हो का वाद।
हम जनता जनार्दन हैं। विचार करिये कि सरकार हमारी आर्थिक गैरबराबरी कैसे दूर करेगी जब कदम कदम पर जमींदार,पूंजीपति और न्यायपालिका का हस्तक्षेप होगा। हमारे ही बीच का गरीब राजनेता बनकर जमींदार और पूंजीपति हो जायेगा । हम तो समझेंगे कि वह हमारी बिरादरी का एक आदमी अमीर या जमींदार हो गया तो सबकी आंख में खटकता है। पर हमें यह समझना चाहिए कि अब वह गरीब नहीं रह गया। उसकी श्रेणी अमीरों की हो गई। वह हमारी आवाज उठाने की जगह अपनी संपत्ति बचाने में लग जायेगा। हमारी आवाज उठाने वाला कोई नहीं रहेगा। कोई जमींदार अपनी जमीन निकलने नहीं देगा तो हम भूमिहीनों को भूमि कैसे मिलेगी और कैसे आर्थिक बराबरी का संविधान का लक्ष्य हासिल होगा? हम तो गरीब के गरीब और राजाओं जमींदारों पूंजीपतियों की प्रजा ही रह जायेंगे। जैसे आजादी के पहले थे और आज भी हैं। कुछ लोग कहते हैं कि 100 साल पूर्व की स्थिति अब नहीं आने वाली। आप बताइए। सत्तर सालों में क्या से क्या हो गया। जो राजा थे। अब साधारण आदमी हो गये। उनका राज बिलट गया। जमींदार थे। उनकी जमींदारी चली गई। हम जमींदारों की जमीन में बसे थे। आज अपनी जमीन में बसे हैं। हम भूमिहीन थे। आज हममें से कुछ जमीन के मालिक हैं। इतना परिवर्तन सत्तर सालों में हुआ। आगे सत्तर सालों में क्या होगा? जिनके पास आज पांच बीघा जमीन है। पांच बच्चों में बिभाजित होकर एक एक बीघा रह जायेगी। फिर एक बीघा जमीन पांच बच्चों में बिभाजित होकर दो दो मंडा रह जायेगी। दो मंडा जमीन पांच बच्चों में बिभाजित होकर फिर भूमिहीन हो जायेंगे। तो सत्तर सालों बाद आप फिर से पुरानी जगह पहुंच जायेंगे। उन बच्चों की स्थिति कैसी रहेगी उसे देखने के लिए आप हम जिंदा नहीं रहेंगे। पर आज अनुमान तो लगा ही सकते हैं।
मेरी बात एक अधिकारी से हो रही थी जो अनुसूचित जाति से थे। उन्होंने मेरे से कहा कि आप कह रहे हैं कि जमीन राष्ट्र की संपत्ति घोषित हो जाय। अब बताइए हमने इतनी मेहनत से जमीन खरीदा था। उसे कैसे छोड़ दें? मैंने कहा, वैसे ही जैसे राजाओं,जमींदारों ने अपना राजपाट अपनी जमींदारी छोड़ दिया। वे नहीं छोड़ते तो आप कैसे जमीन वाले होते? आज भी उनकी प्रजा होते। सारी जमीन उनकी होती। तो यह तो थी उनकी बात। ऐसे बहुत से लोग हमसे टकराते हैं।
आज सरकारें पांच किलो अनाज,एक मकान देकर खुश कर दे रही हैं। तो क्या पांच किलो अनाज से हमारी और हमारे औलादों की शिक्षा व्यवस्था और तरक्की हो जायेगी? हमारी आने वाली पीढ़ियां भी हमको गाली देंगी। लोग तालीम देते हैं कि सिकन्दर जब मरा तो उसकी हथेली खुली थी। सबको खाली हाथ ही जाना है। ठीक है खाली हाथ जाना है। पर क्या अपनी औलादों को गुलामी में छोड़कर जाना है? सारे जमींदार और पूंजीपति क्यों नहीं अपनी दौलत लूटा दे रहे हैं? सब अपनी औलादों के लिए कुछ करते हैं। हम अपनी औलादों के लिए क्यों नहीं सवाल उठाते हैं कि हमनें सबकी गरीबी दूर करने के लिए आपको राजा बनाया तो आप अपनी ही गरीबी दूर करने लगे। अपने समुदाय की गरीबी दूर करने लगे। जबकि आपको राज्य की पूरी जनता की गरीबी दूर करना चाहिए। हम क्यों पुनः आपको राजा बनायें? मैं आपनों के विचारार्थ यह पोस्ट लिख रहा हूं। ये तो रहा आर्थिक मामाला।
अब सामाजिक मामले की बात करें।
पहला मामला तमिलनाडु सरकार द्वारा चंपकम दोराइराजन और आर श्रीनिवासन के केस में 1950 में आया। जिसके विषय में हम पहले ही बता चुके हैं।
दूसरा मामला बला जी बनाम कर्नाटक राज्य 1960 में आया। क्या था मामला? कर्नाटक सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को समाजिक न्याय देने के लिए 26 जुलाई 1958 को आदेश जारी किया। जिसमें ब्राह्मणों को छोड़कर सभी जातियों को सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर पिछड़ा माना और उन्हें 75% आरक्षण का आदेश जारी किया। इसके बाद भी कई आदेश जारी हुए और वे रद्द कर दिए गए। इसके बाद एक समिति डाक्टर आर नागन्नागौड़ा की अध्यक्षता में 1960 में बनाई गई। समिति ने ओबीसी की संख्या 50% माना और उनको दो भाग अति पिछड़ा 22% और पिछड़ा 28% में बिभाजित कर आरक्षण देने की संस्तुति की। उसका तर्क था कि अधिक पिछड़े वर्ग के लोग अपने में प्रतियोगिता करेंगे और कम पिछड़े अपने में प्रतियोगिता करेंगे। इससे अधिक पिछड़ों का हक कम पिछड़े नहीं खा पायेंगे। रिपोर्ट सरकार को अच्छी लगी और उसने 28 जुलाई 1962 में एक अध्यादेश जारी कर अति पिछड़ों को 22% आरक्षण और पिछड़ों को 28% आरक्षण दिया। इस तरह ओबीसी का आरक्षण 50%, एससी का 15% और एसटी का 3% कुल मिलाकर आरक्षण 68% हो गया। 32% सामान्य वर्ग के लिए बचा। पिछड़ों को सामाजिक न्याय देने की सरकार की योजना बहुत अच्छी थी। पर जो इनका पूरा हक खा रहे थे और इनको सामाजिक न्याय नहीं देना चाहते थे उनको अच्छी नहीं लगी। उनको सरकार का यह कदम ग़लत लगा। 23 छात्रों ने जिनका प्रवेश मेडिकल और इंजीनियरिंग में नहीं हो पाया वे संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल किये। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया और 50% की बार लगा दिया कि इससे अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता।
तीसरा मामला इन्दिरा साहनी केस के नाम से मशहूर है। वीपी सिंह की सरकार ने 1989 में मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत ओबीसी को 27% आरक्षण का अध्यादेश जारी किया जिसे लेकर पूरे देश में विद्रोह खड़ा हो गया। इंदिरा साहनी नामक महिला एडवोकेट ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने 16 नवंबर 1992 को फैसला दिया। जिसमें 27% आरक्षण को तो वैध माना पर उसमें क्रीमीलेयर लगा दिया। दूसरे ये कहा कि इनको पदोन्नति में आरक्षण नहीं मिलेगा। अगर पदोन्नति में आरक्षण किसी को मिल रहा है तो वह पांच वर्ष पश्चात समाप्त किया जाता है। अर्थात एससी-एसटी को पदोन्नति में आरक्षण मिल रहा था,उस पर पांच साल बाद रोक लगा दिया। केन्द्र सरकार ने 77वां संविधान संशोधन कर उस पर से रोक हटाया।
तमिलनाडु की सरकार ने 1993 में अपने राज्य में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को 69% आरक्षण दिया और उसे 1994 में संसद से पारित कराकर संविधान की नवीं अनुसूची में डलवा दिया।
1993 तक उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 124(2) और 217(1) के अनुसार केन्द्र सरकार करती थी। उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिए राज्यों के मुख्यमंत्रियों से परामर्श लेकर राज्यों के राज्यपाल केंद्र सरकार को नाम भेज देते थे। राष्ट्रपति केन्द्र सरकार की सलाह पर उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते थे। इससे यह होता था कि जनता सरकार को चुनती थी और सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति करती थी ताकि बिना किसी भेदभाव के न्याय के लिए जनता के हर समुदाय का प्रतिनिधित्व न्यायपालिका में हो सके। पर 1993 में उच्चतम न्यायालय ने इस प्रक्रिया को ही समाप्त कर दिया। क्योंकि 1989 के बाद से पिछड़े वर्ग के लोगों की भी प्रांतों में सरकारें बनने लगीं। उच्चतम न्यायालय में बैठे उच्च वर्ग के वकीलों एवं न्यायाधीशों को आशंका हुई कि इस तरह से तो उच्च और उच्चतम न्यायालय में पिछड़े वर्ग के न्यायाधीशों की भरमार हो जायेगा। इस पर रोक कैसे लगे। इसलिए 1993 में सुप्रीमकोर्ट एडवोकेट्स आन रेकार्ड एसोसिएशन के अधिवक्ताओं ने सुप्रीमकोर्ट में याचिका डाली कि सरकारों के हस्तक्षेप से न्यायपालिका की स्वतंत्रता बाधित हो रही है । इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की अहम् भूमिका होनी चाहिए और राष्ट्रपति की बाध्यता होने चाहिए कि वह न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की सलाह मानें। मुख्य न्यायाधीश एम एन वेयंकटचल्लैया की अध्यक्षता में नौ जजों के खंडपीठ के सामने इस पर सुनवाई हुई। 1993 में उसने फ़ैसला दिया कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश की सलाह मानने के लिए बाध्य है। और इस प्रकार सरकार से न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार छिन कर अपने हाथ में ले लिया। दो वरिष्ठ जजों की कोलेजियम बनाया। बाद में जब राष्ट्रपति ने पुनर्विचार के लिए भेजा तो दो से बढ़ाकर चार वरिष्ठतम जजों का कोलेजियम बना दिया। ताकि किसी भी प्रांतों में या केंद्र में पिछड़े वर्गों की सरकार बने तो वह उच्च और उच्चतम न्यायालय में पिछड़े वर्ग के न्यायाधीशों की नियुक्ति न कर सके।
आप देख सकते हैं,उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में एससी-एसटी ओबीसी के न्यायाधीशों की संख्या नगण्य है। तो कैसे पिछड़ों को सामाजिक आर्थिक न्याय मिलेगा? लेख बहुत लंबा हो चुका है। इसे यहीं समाप्त करता हूं।
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