बौद्ध धर्म के प्रचारको को एक बात जरूर ध्यान में रखने की आवश्यकता है बुद्ध ने अपने उपासको को, ना ही भिक्खुओ को कभी बौद्ध कहा है, न ही बुद्धिष्ट कहा है; परन्तु बाद में अतीत के, व वर्तमान के बुद्ध उपासकों को "विश्व", बौद्ध व बुद्धिष्ट कहने लग गया है। इसने विश्व में एक श्रेष्ठ समाज का स्वरूप ले लिया है।
इसी प्रकार बुद्ध के मार्ग पर चलने की प्राथमिकता हो, न कि बौद्ध कहलाने की। बुद्ध के मार्ग पर चलने वाले को स्वत: ही बौद्ध कहा जाने लगेगा। घड़ी का पैंडुलम धार्मिकता की ओर हो, न कि बौद्ध कहलाने की ओर हो। व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण आचार- विचार से होता है, न कि नामकरण से। अभी तक का बौद्धों का सारा जोर बौद्ध होने पर रहा है, धार्मिकता पर नहीं रहा। यह दृष्टिगत चूक है।
गोयनका जी का व ओशो जी का जोर धर्म के मार्ग पर रहा है, न कि धर्म (धर्म परिवर्तन) पर... यही एक अंतर है।
*लोग कहते हैं कि यदि जातियां खत्म करनी है तो बौद्ध बन जाओ इस पर मेरा सवाल होता है कि सर्टिफिकेट वाले बौद्ध या पूजा-पाठ वाले बौद्ध?*
*यदि बौद्ध बनकर भी शादियाँ अपनी ही जाति मे ही करनी है तो फिर जातियाँ कैसे खत्म होगी ? जबकि बौद्धो मे जातियाँ होती ही नही है*
*आखिर हम धम्म की व्यावहारिकता को स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार क्यों नहीं है?*
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