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Thursday, 5 July 2012

आरक्षण की आवश्यकता क्यों ?

13 दिशम्बर  1946 को तात्काली प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने संविधान निर्माण के लिए आठ सूत्रीय उधेश्य संकल्प संविधान सभा के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत किया.  इस संकल्प पत्र में प्रत्येक नागरिक को सामाजिक , आर्थिक न्याय देने के लिए देश की अर्थ व्यवस्था क्या होगी? तथा देश के उद्योगों एव जमीं का क्या होगा? , कोई उल्लेख नहीं था .इस महत्व पूर्ण बिंदु को उधेश्य संकल्प में क्यों नहीं शामिल किया गया ? यह भी एक विचारनीय सवाल   है . उस समय ५६५ राजाओ ने राष्ट्रहित में अपनी रियासत का परित्याग किया और साधारण मनुष्य बनकर रहना स्वीकार किया . इस देश के उद्योगपतियों  और जमींदारो को भी राष्ट्र हित में अपने उद्योग और जमीं का परित्याग करना और साधारण आदमी बनकर रहना स्वीकार करना चाहिए था , परन्तु इन्होने ऐसा नहीं किया और इन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य भी नहीं किया गया .उधेश्य संन्क्लाप  में ई महत्व पूर्ण मुद्दे शामिल न करके इन उद्योगपतियों के उद्योग और जमींदारो की जमीं की सुरक्षा  की गयी .यही से आजाद भारत में आरक्षण की संकलपना का सूत्रपात होता है .क्योकि इस देश की ९५% भूमि ,शत-प्रतिशत उद्योग और नौकरिया उच्च वर्ग के पास है . पिछड़ा वर्ग के पास मात्र ५% जमीं है उद्योग और जमीं न के बराबर है .यदि  आरक्षण की संकलपना न होती  तो  शत प्रतिशत नौकरिया भी उच्च वर्ग के पास ही  होती . जमीं अयोग्यता के अधर पर और नौकरिया योग्यता के अधर पर . आज आरक्षण के प्राविधान के बावजूद भी उच्च वर्ग के पास ८०% नौकरिया है

2 comments:

  1. Dr. sahab apne bilkul thik likha hai agar reservation khatam karna hai to sabko ek line pe lao , property , lands and other resources ka distribution proper way mei kro.

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  2. ए. परियाकरुप्पन मामले में स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने ही कहा था कि आरक्षण किसी के निहित स्वार्थ के लिए नहीं होना चाहिए। शोषित कर्मचारी संघ मामले में भी न्यायालय ने कहा था कि आरक्षण नीति की सफलता की कसौटी यही होगी कि कितनी जल्दी आरक्षण की आवश्यकता को समाप्त किया जा सकता है। "सेवायोजन, शिक्षा, विधायी संस्थाओं में लागू आरक्षण नीति की हर पांच वर्ष में एक बार समीक्षा की जानी चाहिए।" वसंत कुमार मामले में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड ने सुझाव दिया था। लेकिन आज स्थिति यह है कि यदि आप केवल इतना ही पूछ लें कि आरक्षण कब खत्म होगा, तो तुरंत आपको दलित-विरोधी की उपाधि से लाद दिया जाएगा।



    क्या केवल कुछ उपजातियां ही अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए आरक्षित सीटोंपदों पर कब्जा जमा रही हैं? क्या जातियों को पिछडे वर्ग की सूची में इसलिए शामिल किया जा रहा है कि वे सचमुच पिछड़ी और वंचित हैं? या इसलिए कि उनकी शक्ति और प्रभावशीलता को देखते हुए राजनेताओं को ऐसा करना पड़ रहा है? सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यपालिका को निर्देश दिया था कि वह बराबर नजर रखें कि आरक्षण का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है। यह पैंतीस वर्ष पहले की बात है, लेकिन आज भी यदि आप पूछें कि "सामान्य श्रेणी की कितने प्रतिशत सीटें उन जातियों को मिल रही हैं, जिनके लिए पहले ही आरक्षण की व्यवस्था की गई?" तो उत्तर नहीं मिलेगा। बल्कि एक आरोप और मढ़ दिया जाएगा, "यह सबकुछ पूरी आरक्षण नीति को संदेह के घेरे में डालने और इस प्रकार पिछड़े वर्गों द्वारा अंतहीन संघर्ष के बाद प्राप्त किए थोड़े-बहुत लाभों को भी हथिया लेने के एक षडयंत्र का हिस्सा है।"



    इस प्रकार हम लगातार निम् से निम्तर स्तर पर उतरते जा रहे हैं। सरकारी कार्य-प्रणाली का कुशलता स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है, जिसका अन्य वर्ग के लोगों के साथ-साथ इन पिछड़े एवं वंचित वर्ग के लोगों पर भी पड़ रहा है। सार्वजनिक बहस का स्तर और पैमाना भी गिरता चला जा रहा है और ये स्थितियां जिस प्रकार अपरिहार्य बन गई हैं, उसी प्रकार इनका परिणाम भी परिहार्य है, जो निम्लिखित रूपों में हमारे सामने है -

    * विधायिकाओं को सुविधा और आवश्यकता के अनुसार संचालित करनेवाले व्यक्ति की प्रकृति और प्रवृत्ति के रूप में।



    * शिक्षण संस्थानों और सिविल सेवाओं में गिरते कुशलता-गुणवत्ता स्तर के रूप में।



    * मतदान प्रणाली और विधायिकाओं के साथ-साथ सेवाओं का भी जाति के आधार पर विभाजन के रूप में।



    * कुशलता-उत्कृष्टता पर एक संगठित हमले के रूप में।



    ऑर्टेगा गैसेट की बात सच साबित होती है;

    पैमाने हटा दिए गए हैं; औसत दर्जा ही मानक पैमाना बन गया है। अभद्रता ही प्रमाणिकता बन गई है; अभित्रास (धमकी) ही दलील बन गई है; हमला प्रमाण....। इस रास्ते में- जैसा पं. नेहरू ने दशकों पहले ही कह दिया था - बेवकूफी ही नहीं, आपदा भी है।



    (पूर्व केंद्रीय मंत्री और जाने माने पत्रकार अरुण शौरी की प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक आरक्षण का दंश से साभार।)

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