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| डॉ जी सिंह कश्यप |
ऐसा लग रहा है इस देश में लोकतंत्र अब केवल कहने मात्र के लिये रह गया है । असल में केवल ब्राह्मण तंत्र ही रह गया है जो पहले भी था । मुगलिया सल्तनत में कानून की दो किताबें थी । एक कुरान और दूसरी मनुस्मृति । मुस्लिमों को न्याय कुरान के अनुसार और गैरमुस्लिमों यानी हिन्दुओं को न्याय मनुस्मृति के अनुसार दिया जाता था । मुस्लिमों का प्रधान न्यायाधीश काजी और हिन्दुओं का प्रधान न्यायाधीश ब्राह्मण होता था । वादशाह सर्वोच्च न्यायाधीश था । यदि 1857 की क्रांति सफल हो गयी होती और अंग्रेज भारत छोड़ दिये होते तो आज भी वही कानून और न्यायतंत्र लागू रहता । हम जहां जिस स्थिति में तब थे उसी स्थिति में आज भी होते । अच्छा हुआ जो वैसा नहीं हुआ । भारत 1947 में आजाद हुआ और देश में नया संविधान लागू हुआ जिसके शिल्पी डा. भीमराव अंबेडकर थे । हालांकि यह संविधान उनके मन माफिक नहीं है फिर भी कामचलाऊ बना । यदि ईमानदारी से इसका पालन किया जाता । यदि ईमानदारी से पालन न किया जाय तो यह सिर्फ दिखाने मात्र के लिये हाथी का दिखाने वाला दांत है । इसके लिये भी हम ही जिम्मेदार हैं । भारत का संविधान इस तरह का है कि कोई भी संवैधानिक संस्था निरंकुश या तानाशाह नहीं हो सकती । संविधान ने सबकी अपनी अपनी सीमाएं बांध रखी है । कोई भी अपनी सीमा लांघ नहीं सकता यदि भारत के संविधान का पालन करता है तो । नहीं करता है तो उसके लिये कोई सीमा नहीं । कोई कानून नहीं । भारत में लोकतंत्र है । इसलिये जनता सर्वोच्च है । इसके बाद संसद सर्वोच्च है । जब देश आजाद हुआ तो संविधान बनाने का काम भारत के सुप्रीम कोर्ट को नहीं दिया गया । जबकि सुप्रीम कोर्ट मौजूद था । संविधान बनाने का काम जनता के चुने हुये प्रतिनिधियों को दिया गया । संविधान में अगर कोई संशोधन भी हो तो इसका अधिकार भी जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को ही दिया गया । परंतु सुप्रीम कोर्ट को नहीं दिया गया । सुप्रीम कोर्ट को क्यों नहीं दिया गया ? क्योंकि भारत में लोकतंत्र है अर्थात जनता का राज,जनता के द्वारा,जनता के लिये । संविधान में जब न्यायाधीशों की नियुक्ति की बात आई कि कौन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति करेगा ? तो इसके लिये संविधान में अनुच्छेद 124 लाया गया और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये अनु. 217 लाया गया । ब्रिटिश हुकूमत में उच्च और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रांत के गवर्नरों के रिकमंडेशन से गवर्नर जनरल करते थे । जब देश आजाद हुआ तो 4 नवंबर 1947 को गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने भारत के चीफ जस्टिस की सहमति से प्रक्रिया के संशोधन का ग्यापन जारी किया । जिसमें गवर्नर और गवर्नर जनरल सब संवैधानिक प्रधान हो गये और प्रांतों में उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये रिकमंडेशन का अधिकार प्रांतों के मुख्यमंत्रियों को और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये केन्द्र में रिकमंडेशन का अधिकार केन्द्रीय मंत्री परिषद को सौंपा गया । उस समय सभी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने त्याग पत्र दे दिया था । यह कहते हुये कि इससे न्यायपालिका का राजनीतिकरण होगा । इनका कहना था कि उच्च और उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति में उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश की सहमति अनिवार्य होनी चाहिए । संविधान सभा ने इस तरह के सभी आरोपों एवं अनुरोधों को खारिज कर दिया था । सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये अनु. 124(2) और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये 217(2) का प्रावधान किया गया । इसमें कंसल्टेशन की जगह कंसेंट रखने के लिये बी पोखम्मा ने दो संशोधन लाये । संविधान सभा ने दोनों संशोधनों को खारिज कर दिया । अब जब दोनों संशोधनों को संविधान सभा ने खारिज कर दिया तो सुप्रीम कोर्ट कैसे उन संशोधनों को पुनः संविधान में स्थापित कर सकता है ? जबकि संविधान संशोधन का अधिकार संसद ने सुप्रीम कोर्ट को नहीं दिया है । सुप्रीम कोर्ट ने अनु. 124(2) और 217(1) दोनों को निरस्त कर कोलेजियम सिस्टम लागू किया है । जो पूरी तरह असंवैधानिक है । सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यों किया ? इसलिये कि यदि प्रांतों और केन्द्र में एससी एसटी और ओबीसी के लोगों की सरकारें बन जायेंगी तो ये सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में एससी एसटी तथा ओबीसी के न्यायाधीशों की नियुक्ति कर देंगे और इस तरह से न्यायपालिका मेंब्राह्मणों का वर्चस्व समाप्त हो जायेगा ।
इस तरह आज जनता का शासन जनता के द्वारा जनता के लिये नहीं है बल्कि ब्राह्मणों का शासन ब्राह्मणों के द्वारा ब्राह्मणों के लिये हो गया है । आखिर क्या कारण है कि सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में एससी एसटी ओबीसी के न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं हो रही है ? आरक्षण की मनमानी व्याख्या हो रही है ? संविधान के अनु. 335 में एससी एसटी के लिये नौकरियों में आरक्षण तथा अनु.340 में एसइबीसी (ओबीसी) के लिये नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था है । इस आरक्षण को मौलिक अधिकार वाले अनु. 15 और अनु. 16 रोक न दें इसलिये इन क्लाजों में उपक्लाज 15(4) 1951में और उपक्लाज 16(4) संविधान बनाते समय ही जोड़ा गया था । आरक्षण के इन प्रावधानों को मौलिक अधिकार के साथ जोड़ने से ये दोनों अधिकार अब मौलिक अधिकार बन शगये हैं । अनु. 16(4) क्या कहता है ? Nothing in this article shall prevent the state for making any provision for the reservation of appointment and post for any backward class of citizens for which in the openion of state is not adequately represented in services under state. अब इसमें स्टेट के अंतर्गत संविधान के अनु.12 के अनुसार केंद्र भी आता है । अब सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है और राज्यों की राय पर है । चाहे वे जारी रखें या न रखें । सुप्रीम कोर्ट ने 1950 में शिक्षा में आरक्षण को लेकर तमिलनाडु सरकार के शासनादेश के खिलाफ एक वाद में जो चंपकम दोराइराजन के नाम से जाना जाता है,एससी एसटी ओबीसी के शिक्षा में आरक्षण के खिलाफ फैसला दे दिया जिसके कारण पहला संविधान संशोधन 1951 में कर अनु.15 में (4) जोड़ा गया । कर्नाटक सरकार के शासनादेश के खिलाफ एक वाद में जो बालाजी के वाद के नाम से जाना जाता है आरक्षण के खिलाफ फैसला देकर 50% का बार लगा दिया । आरक्षणकी गलत व्याख्या कर हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति मे आरक्षण लागू नहीं होने दिया । मिनर्वामिल्स बनाम भारत संघ के वाद में संसद की कानून बनाने की शक्ति पर ही रोक लगा दिया । अब संसद वही कानून बना सकती है जिसे सुप्रीम कोर्ट चाहेगा । अगर sc,st,obc के हित में कानून बना तो सुप्रीम कोर्ट उस कानून को ही रद्द कर देगा । इसीलिये उसने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में एक भी न्यायाधीश नियुक्त नहीं होने दिया । अगर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में एससी एसटी ओबीसी के न्यायाधीश होते तो निश्चित ही इस तरह के आरक्षण विरोधी फैसले न होते । सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है,यह कहकर पूरे आरक्षण को समाप्त करने के लिये हरी झंडी दे दिया है । अब राज्य सरकारें आरक्षण जारी रखती हैं कि नहीं रखती हैं । उनपर निर्भर है । एससी एसटी ओबीसी खुद अपना आरक्षण खत्म कराना चाहता है तो इसका क्या इलाज है ? कोई माया के पीछे है । कोई अखिलेश के पीछे है । कौई नीतीश कोई ,कोई लालू ,कोई पासवान कोई अठावले,कोई ठाकरे के पीछे है और इस तरह ये सारे आरक्षण विरोधियों के पीछे हैं । हमें तो ऐसी सरकार बनानी चाहिए जो आरक्षण विरोधियों के पिछे चलने वाली न हो । कैसे बनेगी ? इस समाज का प्रबुद्ध वर्ग विचार करे । सरकार जो भी बने वह वह पिछड़े समाज के नियंत्रण में चले। ऐसा प्रबुद्ध वर्ग तैयार करना हमारा कर्तव्य है । क्योंकि पिछड़े समाज का देश में प्रचंड बहुमत है और वही पिछड़ा हुआ है । जब पिछड़ा समाज आगे बढ़ेगा तभी देश आगे बढ़ेगा अन्यथा देश भी पिछड़ा ही रह जायेगा ।
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बहुत सुंदर लेख व चिंतन , समाज को जागरूक करने के लिए I
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